अमेठी जिले की इस प्रेरणादायक कहानी में कला और संघर्ष का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यहां के एक प्रतिभावान कलाकार ने अपनी मेहनत और लगन के दम पर यह साबित कर दिया है कि विपरीत परिस्थितियों के बावजूद सफलता हासिल की जा सकती है। रामखेलार नाम के यह मूर्तिकार बीते चार दशकों से मिट्टी के जरिए अद्भुत कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं। उनके हाथों से गढ़ी गई प्रतिमाएं इतनी जीवंत होती हैं कि उन्हें देखकर ऐसा प्रतीत होता है जैसे साक्षात देवी प्रकट हो गई हों। उनकी इस कला का दायरा अब केवल उनके गृह जिले तक सीमित नहीं है, बल्कि दूर-दराज के अन्य जिलों से भी लोग उनकी बनाई मूर्तियों को अपने यहां ले जाने के लिए पहुंचते हैं।
शुरुआती दौर का संघर्ष और कला की सीख
यह यात्रा इतनी आसान नहीं थी। रामखेलार के जीवन में एक दौर ऐसा भी था जब उन्हें इस हुनर को सीखने के लिए दूसरों के दरवाजों पर जाना पड़ता था। उस समय उन्हें कड़ी मेहनत के बाद भी बहुत कम मेहनताना मिलता था। हालांकि, इन कठिनाइयों ने उनके हौसले को कमजोर करने के बजाय और मजबूत किया। उन्होंने परिस्थितियों से हार मानने के बजाय खुद का काम शुरू करने का फैसला किया। आज स्थिति यह है कि जो व्यक्ति कभी दूसरों से काम सीखने जाता था, उसके पास आज खुद नए लोग हुनर सीखने आते हैं। वर्तमान में वह एक बार में करीब 25 से 30 मूर्तियां तैयार करते हैं जिन्हें विभिन्न दुर्गा पंडालों में सजावट के लिए ले जाया जाता है।
सामग्री और निर्माण की पूरी प्रक्रिया
मिट्टी की इन मनमोहक मूर्तियों को तैयार करने के लिए कई तरह की चीजों को जुटाना पड़ता है। इस पूरी प्रक्रिया में मुख्य रूप से तालाब की मिट्टी, बांस, कपड़े, जूट, थर्मोकोल और अन्य छोटी-सामग्री का उपयोग किया जाता है। एक मूर्ति को पूरी तरह से आकार लेने और तैयार होने में लगभग तीन से चार दिन का समय लगता है। शुरुआती दिनों के कड़े संघर्ष को याद करते हुए वह बताते हैं कि आज जब उन्हें सफलता मिली है, तो उन्हें अपने इस सफर पर बेहद गर्व महसूस होता है। उनका मानना है कि यह सब भगवान की कृपा और उनकी खुद की निरंतर मेहनत का ही परिणाम है।
लागत, मुनाफा और कारोबार का गणित
इस व्यवसाय के आर्थिक पहलू पर नजर डालें तो एक मूर्ति को बनाने में अनुमानित तौर पर ढाई से तीन हजार रुपये की लागत आती है। इसके बाद बाजार में यही मूर्ति सात से आठ हजार रुपये तक आसानी से बिक जाती है। इस तरह उन्हें प्रत्येक मूर्ति पर करीब दो से ढाई गुना तक का मुनाफा मिल जाता है। आज के समय में अमेठी के अलावा विभिन्न अन्य स्थानों से भी लोग विशेष रूप से उनके पास मूर्तियां तैयार करवाने आते हैं। उनका यह हुनर न केवल उनकी आजीविका का बड़ा जरिया बन चुका है, बल्कि स्थानीय स्तर पर कला को सहेजने और आगे बढ़ाने का एक बेहतरीन माध्यम भी साबित हो रहा है।



















