कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी यदि मनुष्य के भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति हो, तो हर बाधा को पार किया जा सकता है। इस बात को छत्तीसगढ़ के बिलासपुर की रहने वाली दुर्गा रानी ठाकुर ने अपनी जिंदगी के जरिए साबित कर दिखाया है। शहर के कंपनी गार्डन गेट के बाहर भेल-दबेली का एक छोटा सा स्टॉल चलाने वाली दुर्गा रानी आज न सिर्फ अपने घर का खर्च उठा रही हैं, बल्कि गंभीर रूप से बीमार अपने भाई के इलाज का पूरा खर्च भी खुद ही संभाल रही हैं। सुबह 9 बजे से लेकर रात के करीब 8:30 बजे तक लगातार काम करने वाली दुर्गा रानी का मानना है कि महिलाओं को कभी भी दूसरों पर निर्भर रहने के बजाय खुद स्वावलंबी बनने की दिशा में कदम बढ़ाना चाहिए।
भाई की बीमारी के बाद संभाली दुकान
दुर्गा रानी के इस संघर्षपूर्ण सफर के पीछे पारिवारिक जिम्मेदारियों का बड़ा हाथ है। वह बताती हैं कि यह स्टॉल पहले उनके भाई द्वारा चलाया जाता था। हालांकि, जब उनके भाई की सेहत अचानक काफी बिगड़ गई और वह काम करने में असमर्थ हो गए, तब दुर्गा रानी ने बिना एक पल गंवाए इस काम की कमान अपने हाथों में ले ली। आज वह खुद कंपनी गार्डन के बाहर बैठकर भेल-दबेली बेचती हैं और इस दुकान से होने वाली आमदनी से ही घर का चूल्हा जलाने के साथ-साथ भाई की दवाइयों का खर्च भी निकाल रही हैं।
सुबह से रात तक पसीना बहाती हैं दुर्गा रानी
उनकी रोजमर्रा की दिनचर्या बेहद व्यस्त और कड़ी मेहनत से भरी होती है। दुर्गा रानी हर दिन सुबह करीब 9 बजे दुकान पर पहुंच जाती हैं और रात के लगभग 8:30 बजे तक वहीं डटी रहती हैं। काम खत्म होने के बाद उनका भाई रात के समय ऑटो लेकर उन्हें लेने आता है और दोनों साथ घर लौटते हैं। इस काम में उनकी मां भी पूरा साथ देती हैं। भेल और दबेली के लिए जरूरी सामग्री की शुरुआती तैयारी घर पर उनकी मां द्वारा की जाती है, जिसे दुर्गा रानी दुकान पर लाकर ग्राहकों की पसंद के अनुसार तैयार करके बेचती हैं।
संडे और त्योहारों के दिनों में होती है बेहतर कमाई
दुकान की बिक्री को लेकर उनका कहना है कि सामान्य दिनों में ग्राहकों का आना-जाना लगा रहता है और कई बार रोजाना की बिक्री 1,000 से 2,000 रुपये तक हो जाती है। वहीं वीकेंड यानी रविवार के दिन कंपनी गार्डन के आसपास पर्यटकों और घूमने आने वाले लोगों की भारी भीड़ उमड़ती है, जिसके कारण रविवार की बिक्री बढ़कर 2,500 से 3,000 रुपये या उससे भी अधिक तक पहुंच जाती है। इसके अलावा, विभिन्न त्योहारों के सीजन में भी उनके स्टॉल पर ग्राहकों की संख्या में इजाफा होता है, जिससे आमदनी में भी सुधार होता है।
पीढ़ियों पुराना है परिवार का यह व्यवसाय
यह काम दुर्गा रानी के परिवार के लिए नया नहीं है, बल्कि उनका इस जगह से पुराना नाता रहा है। वह साझा करती हैं कि उनके नानी-नाना और परिवार के अन्य बुजुर्ग भी इसी स्थान पर अपनी दुकानें लगाकर अलग-अलग चीजें बेचते रहे हैं। वर्तमान में उनके परिवार में उनकी मां, उनके बीमार भाई और खुद दुर्गा रानी हैं। भाई के स्वास्थ्य खराब होने के बाद से घर की चारदीवारी से लेकर बाहर की सभी जिम्मेदारियों का बोझ अब अकेले दुर्गा रानी के कंधों पर आ गया है, जिसे वह पूरी निष्ठा के साथ निभा रही हैं।
महिलाओं के लिए प्रेरणास्त्रोत बनीं दुर्गा रानी
दुर्गा रानी का मानना है कि हमारे समाज में आज भी कई महिलाएं घरों से बाहर कदम रखने में झिझकती हैं या डरती हैं। लेकिन उनका स्पष्ट संदेश है कि यदि मन में पक्का इरादा और आत्मविश्वास हो, तो दुनिया की हर मुश्किल परिस्थिति का डटकर मुकाबला किया जा सकता है। वह कहती हैं कि यदि समाज में कोई ताने कसे या कुछ कहे भी, तो उससे घबराने की जरूरत नहीं है, बल्कि अपने लक्ष्य की ओर मजबूती से आगे बढ़ते रहना चाहिए।
दूसरों को आत्मनिर्भर बनने का संदेश
अपनी इस कहानी के जरिए दुर्गा रानी उन तमाम महिलाओं और युवतियों के लिए एक मिसाल बन चुकी हैं जो जीवन में कुछ करना चाहती हैं। उनका कहना है कि जो महिलाएं अपने पैरों पर खड़े होना चाहती हैं, उन्हें डर का त्याग करके आगे आना चाहिए। उन्होंने अपनी बहनों को संदेश देते हुए कहा, “मैं अपनी बहनों से यही विनती करूंगी कि अपने पैरों पर खुद खड़े होकर खुद कमाएं और खुद खाएं।” उनकी यह आत्मनिर्भरता और अटूट संघर्ष उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा है जो विपरीत हालात के आगे घुटने टेकने के बजाय डटकर खड़े रहते हैं।



















