झुंझुनूं जिले के बड़ागांव क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले चारणवास गांव के रहने वाले सुभाषचंद्र खैरवा ने समाज के सामने इंसानियत और परोपकार की एक असाधारण मिसाल पेश की है। भारतीय नौसेना से अपनी सेवाएं पूरी करने के बाद जब वह साल 2003 में सेवानिवृत्त हुए, तो उन्होंने अपने जीवन का एक नया और बड़ा उद्देश्य तय किया। अपने निजी सुख-सुविधाओं पर पैसे खर्च करने के बजाय उन्होंने अपनी पूरी पेंशन को जरूरतमंदों और गरीबों के जीवन को बेहतर बनाने का माध्यम बना लिया। पिछले 23 सालों से लगातार वह अपने इस नेक संकल्प पर अडिग हैं और आज के समय में हर महीने करीब 65 हजार रुपये शिक्षा के प्रसार, गौसेवा, पर्यावरण बचाने के अभियानों, धार्मिक आयोजनों और अन्य जनहित से जुड़े कामों पर खर्च कर रहे हैं।
राष्ट्र सेवा से लेकर समाज सेवा तक का सफर
सुभाषचंद्र खैरवा का साफ तौर पर मानना है कि एक सैनिक के लिए देश की वर्दी और देश सेवा से रिटायरमेंट हो सकता है, लेकिन समाज सेवा का दायित्व कभी समाप्त नहीं होता है। उनके इस मजबूत इरादे के पीछे उनके शुरुआती जीवन के कड़े संघर्ष और अनुभव जुड़े हुए हैं। उनके पिता एक बहुत ही गरीब और अनपढ़ किसान थे, जिन्होंने तमाम तरह की आर्थिक तंगी और मुश्किलों का सामना करते हुए कड़ी मेहनत की और अपने बेटे को पढ़ा-लिखाकर भारतीय नौसेना तक पहुंचाया। अपने परिवार के गरीबी के उन दिनों को सुभाषचंद्र आज भी अच्छी तरह याद रखते हैं। यही वजह है कि उन्होंने मन में ठान लिया था कि वह किसी भी गरीब और प्रतिभावान बच्चे को पैसों की कमी की वजह से अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ने नहीं देंगे।
गरीब बच्चों की शिक्षा को बनाया जीवन का लक्ष्य
नौसेना से रिटायर होने के बाद उन्होंने सबसे पहले आर्थिक रूप से कमजोर और जरूरतमंद परिवारों के बच्चों की पढ़ाई का पूरा जिम्मा अपने कंधों पर उठा लिया। वह इन बच्चों की स्कूलों में समय पर फीस जमा कराते हैं और इसके साथ ही उन्हें पढ़ने के लिए किताबें, कॉपियां, जरूरी स्टेशनरी का सामान और स्कूल यूनिफॉर्म भी खुद उपलब्ध कराते हैं। उनका ऐसा सोचना है कि यदि किसी छोटे बच्चे की आंखों में पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने और आगे बढ़ने का कोई सपना है और केवल पैसों की तंगी के कारण वह सपना बीच में ही टूट जाए, तो इससे बड़ा दुखद और कुछ नहीं हो सकता है। इसी सोच के तहत वह अपनी पेंशन की राशि का एक बड़ा हिस्सा ऐसे ही होनहार और गरीब बच्चों की पढ़ाई पर खर्च करते आ रहे हैं।
परिवार का भरपूर सहयोग और गौसेवा का संकल्प
सुभाषचंद्र के इस महान सेवाभाव को आगे बढ़ाने में उनके पूरे परिवार का भी उन्हें हमेशा से पूरा साथ और समर्थन मिलता रहा है। उनकी पत्नी सरोज खैरवा एक सरकारी शिक्षिका के रूप में अपनी सेवाएं दे रही हैं, जबकि उनके बड़े बेटे दीपक खैरवा भी शिक्षक हैं। इसके अलावा उनके छोटे बेटे संदीप खैरवा और उनकी बहू कंचन चौधरी दोनों ही पेशे से डॉक्टर हैं, जो इस परिवार की सामाजिक और मानवीय सोच को और मजबूती देते हैं। गौसेवा भी सुभाषचंद्र के इन तमाम सेवा कार्यों का एक बेहद अहम हिस्सा रही है। गोवला, दोरासर और मालसर समेत आसपास के कई गांवों की गौशालाओं में गायों के चारे और अन्य जरूरी व्यवस्थाओं के लिए वह अब तक अपने पास से करीब 7.25 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं।
सार्वजनिक स्थानों पर सुविधाएं और पर्यावरण संरक्षण
अपने गांव चारणवास और बड़ागांव में पीने के साफ पानी की टंकियों का निर्माण करवाने के साथ-साथ उन्होंने गर्मियों के मौसम में बेजुबान पशु-पक्षियों के लिए पानी के परिंडे भी बंधवाए हैं। उनका मानना है कि गर्मी के इन कठिन महीनों में बेजुबान जीवों की प्यास बुझाना हम सबका नैतिक कर्तव्य है। इसके अलावा उन्होंने आम जनता की सुविधा के लिए सार्वजनिक जगहों पर भी कई काम किए हैं। बड़ागांव, चारणवास, ऊबली का बालाजी और हांसलसर जैसे विभिन्न स्थानों पर बुजुर्गों और राहगीरों के आराम से बैठने के लिए मजबूत सीमेंट की बेंचों की व्यवस्था कराई गई है, जिन पर करीब 33 हजार रुपये की लागत आई है। इसके साथ ही जिले भर में हर साल बड़े पैमाने पर पौधारोपण का कार्य और कोरोना महामारी के भयानक दौर में जरूरतमंद लोगों तक मुफ्त दवाइयां बांटने जैसे विभिन्न सामाजिक कार्यों पर वह लगभग 5.60 लाख रुपये खर्च कर चुके हैं। पिछले 23 वर्षों के लंबे अंतराल में सुभाषचंद्र खैरवा कुल मिलाकर करीब 21.75 लाख रुपये समाज के कल्याण में लगा चुके हैं। उनका कहना है कि पेंशन से खरीदी गई कोई भी सुख-सुविधा की चीज कुछ समय बाद पुरानी हो सकती है, लेकिन किसी गरीब बच्चे की शिक्षा में लगाया गया धन उसके पूरे जीवन का नक्शा बदल सकता है। उनके लिए असली पूंजी कोई बैंक बैलेंस नहीं, बल्कि किसी जरूरतमंद के चेहरे पर आने वाली सच्ची मुस्कान है।



















