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सीकर की 9वीं की छात्रा हर्लिन महला ने जयपुर में दिखाया दम, ट्राइथलॉन में जीता गोल्ड मेडलसक्सेस स्टोरी
25 अग॰ 2026, 8:59 pm (1 घंटे पहले)· 2

सीकर की 9वीं की छात्रा हर्लिन महला ने जयपुर में दिखाया दम, ट्राइथलॉन में जीता गोल्ड मेडल

सीकर जिले के फतेहपुर इलाके के अलफसर गांव की रहने वाली 9वीं कक्षा की छात्रा हर्लिन महला ने राजस्थान स्टेट जूनियर एथलेटिक्स प्रतियोगिता के ट्राइथलॉन इवेंट में गोल्ड मेडल जीतकर अपने परिवार और गांव का नाम रोशन किया है।

सीकर जिले के फतेहपुर इलाके के अलफसर गांव की रहने वाली हर्लिन महला ने बेहद कम उम्र में खेल जगत में अपनी एक विशिष्ट पहचान बना ली है। 9वीं कक्षा में पढ़ने वाली हर्लिन ने ट्राइथलॉन प्रतियोगिता में शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्ड मेडल अपने नाम किया है। उन्होंने बीकानेर की एक एथलीट को पीछे छोड़ते हुए 60 मीटर दौड़, लॉन्ग जंप और बॉल थ्रो स्पर्धाओं में यह प्रतिष्ठित पदक हासिल किया है। उनकी यह सफलता सिर्फ एक आम खिलाड़ी की जीत नहीं है, बल्कि कड़े संघर्ष और दृढ़ संकल्प की एक प्रेरणादायक कहानी है।

गांव में संसाधनों की कमी को ऐसे दी मात

हर्लिन के गृहग्राम में न तो कोई खेल का मैदान था और न ही एथलेटिक्स के लिए कोई पेशेवर कोच, लेकिन उन्होंने इन प्रतिकूल परिस्थितियों को कभी भी अपने सपनों के आड़े नहीं आने दिया। अपनी बड़ी बहन को खेल प्रतियोगिताओं में पदक जीतते देखने के बाद उनके मन में भी खेल के क्षेत्र में कुछ बड़ा करने की इच्छा जागी। इसी सपने को हकीकत में बदलने के लिए उन्होंने अपनी पूरी दिनचर्या में बदलाव किया। करीब दो साल पहले हर्लिन ने यह पक्का इरादा कर लिया कि वह एथलेटिक्स में अपना भविष्य बनाएंगी। इसके लिए उन्होंने नियमित रूप से स्कूल जाने के बजाय घर पर ही रहकर सेल्फ स्टडी करने का बड़ा निर्णय लिया।

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जयपुर में शुरू हुआ कड़ा अभ्यास

घर पर अपनी स्कूली पढ़ाई जारी रखते हुए उन्होंने खेल की दुनिया में कदम रखा। जब गांव में प्रशिक्षण के लिए कोई कोच या स्टेडियम नहीं मिला, तो उन्होंने अपने घर को छोड़कर जयपुर में रहने का फैसला किया। नियमित स्कूल जाने वाले किसी भी छात्र के लिए यह कदम उठाना आसान नहीं होता है। जयपुर पहुँचने के बाद हर्लिन ने अपनी मेहनत को और अधिक बढ़ा दिया। यहाँ उन्होंने रोजाना सुबह और शाम को लगभग तीन-तीन घंटे यानी कुल छह घंटे तक पसीना बहाया।

स्टेट लेवल पर लहराया जीत का परचम

रोजाना छह घंटे की कड़ी मेहनत और निरंतर अभ्यास के बलबूते पर धीरे-धीरे हर्लिन का आत्मविश्वास काफी बढ़ गया। उनकी इस अथक मेहनत का सुखद परिणाम राजस्थान स्टेट जूनियर एथलेटिक्स प्रतियोगिता के दौरान सामने आया। अजमेर शहर में आयोजित इस प्रतियोगिता में हर्लिन ने ट्राइथलॉन इवेंट में बेहतरीन खेल दिखाते हुए गोल्ड मेडल पर कब्जा जमाया। उन्होंने बीकानेर की खिलाड़ी को मात देकर 60 मीटर दौड़, लॉन्ग जंप और बॉल थ्रो में अपनी काबिलियत साबित की। स्टेट लेवल पर यह हर्लिन का पहला स्वर्ण पदक है और अब उनकी निगाहें राष्ट्रीय स्तर के टूर्नामेंट्स पर टिकी हुई हैं।

बड़ी बहन से मिली प्रेरणा

हर्लिन के इस खेल सफर की शुरुआत के पीछे उनकी बड़ी बहन नव्या की उपलब्धियों का भी बहुत बड़ा योगदान रहा है। नव्या कराटे की एक जानी-मानी चैंपियन रह चुकी हैं और नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं। अपनी बहन को मेडल के साथ सम्मान प्राप्त करते हुए देखकर हर्लिन के भीतर भी यह भावना प्रबल हो गई कि वह भी अपने परिवार और पूरे राजस्थान राज्य का नाम रोशन करेंगी। यही प्रेरणा आगे चलकर उनकी मेहनत और लगन की सबसे बड़ी ताकत बन गई।

माँ और परिवार का मिला मजबूत साथ

हर्लिन की इस शानदार सफलता में उनकी माता ममता का सहयोग भी बेहद सराहनीय रहा है। ममता हर मुकाबला और प्रतियोगिता के दौरान अपनी बेटी के साथ मौजूद रहती हैं और अभ्यास से लेकर प्रतियोगिता के मैदान तक उसका हौसलाफजाई करती हैं। हर्लिन बचपन से ही खेलों के प्रति गहरी रुचि रखती थीं। वह अक्सर अपनी माँ से यह सवाल करती थीं कि जब उनकी दीदी देश के लिए मेडल जीत सकती हैं, तो वह ऐसा क्यों नहीं कर सकती हैं। बेटी की आँखों में इस सपने की चमक देखकर माँ ने हर कदम पर उसका साथ देने का दृढ़ निश्चय किया।

आर्थिक चुनौतियों को पीछे छोड़ा

एक साधारण किसान परिवार से ताल्लुक रखने के बावजूद हर्लिन के परिवार ने कभी भी आर्थिक तंगी को उसके सपनों के रास्ते में रुकावट नहीं बनने दिया। उनके चाचा एडवोकेट त्रिलोक सिंह और निर्मल जाखड़ ने भी एथलेटिक्स के सफर में उसे भरपूर सहयोग प्रदान किया। माँ ममता का कहना है कि उन्हें अपनी दोनों बेटियों पर बेहद गर्व है। उनकी दूसरी बेटी भी नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीत चुकी है और फिलहाल बीकानेर में अपनी आगे की तैयारी में जुटी हुई है। आज यह परिवार अपनी बेटियों की वजह से एक खास पहचान रखता है।

राष्ट्रीय स्तर पर है अब अगली नजर

राज्य स्तर पर अपना पहला स्वर्ण पदक जीतने के बाद हर्लिन का पूरा फोकस अब राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है। उनका मुख्य सपना नेशनल और इंटरनेशनल मंचों पर पदक हासिल करके राजस्थान का नाम ऊँचा करना है। ग्रामीण इलाके की बुनियादी सुविधाओं के अभाव से शुरू हुआ यह सफर अब बुलंदियों को छूने के लिए आगे बढ़ रहा है। हर्लिन की यह प्रेरणादायक दास्तान यह साबित करती है कि यदि इरादे पक्के हों, परिवार का पूरा समर्थन मिले और मेहनत में कोई कमी न छोड़ी जाए, तो सीमित संसाधनों के बीच रहने वाली बेटियां भी बड़े मंचों पर अपनी अनूठी पहचान बना सकती हैं।

सवाल-जवाब

हर्लिन महला कौन हैं और उन्होंने कौन सा पदक जीता है?
हर्लिन महला सीकर जिले के अलफसर गांव की 9वीं कक्षा की छात्रा हैं, जिन्होंने राजस्थान स्टेट जूनियर एथलेटिक्स प्रतियोगिता के ट्राइथलॉन इवेंट में गोल्ड मेडल जीता है।
हर्लिन ने ट्राइथलॉन में किन स्पर्धाओं में जीत हासिल की है?
उन्होंने 60 मीटर दौड़, लॉन्ग जंप और बॉल थ्रो स्पर्धाओं में शानदार प्रदर्शन करते हुए यह पदक अपने नाम किया है।
हर्लिन ने अभ्यास के लिए कहाँ निवास किया था?
गांव में खेल की सुविधाएं न मिलने के कारण हर्लिन ने जयपुर जाकर रोजाना छह घंटे कड़ा अभ्यास किया था।
हर्लिन को खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा किससे मिली?
उन्हें यह प्रेरणा उनकी बड़ी बहन नव्या से मिली जो कराटे की चैंपियन रह चुकी हैं और नेशनल लेवल पर गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं।
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