खेती-किसानी को अक्सर घाटे का सौदा माना जाता है और यही वजह है कि बड़ी संख्या में लोग गांवों से शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। लेकिन, दक्षिण भारत के एक किसान ने इस धारणा को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। कर्नाटक के मांड्या जिले के श्रीरंगपट्टनम तालुक स्थित पलाहल्ली गांव के रहने वाले वेंकटेश ने अपनी महज पांच एकड़ जमीन को एक अंतरराष्ट्रीय आकर्षण का केंद्र बना दिया है। आमतौर पर किसान फसल उगाते हैं और उसे मंडियों में बेचकर मुनाफा कमाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वेंकटेश ने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना है। उन्होंने अपनी जमीन को एक शानदार एग्री-टूरिज्म (कृषि-पर्यटन) और ट्रेनिंग सेंटर में तब्दील कर दिया है। आज दुनिया भर से लोग उनके इस छोटे से गांव में सिर्फ घूमने नहीं, बल्कि खेतों में उतरकर असली किसानी सीखने आते हैं, जिससे वेंकटेश हर साल करीब 10 लाख रुपये की शानदार कमाई कर रहे हैं।
विदेशी मेहमानों के लिए किसानी का प्रशिक्षण
पलाहल्ली गांव के इस खेत का नजारा भारत के किसी भी आम खेत से बिल्कुल अलग है। यहां पहुंचने पर आपको कई विदेशी नागरिक खेतों में पसीना बहाते हुए नजर आएंगे। आयरलैंड, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, हंगरी और जिम्बाब्वे जैसे तमाम देशों से आए युवा यहां की मिट्टी में उतरकर धान की रोपाई करते हैं। कुछ लोग जैविक खाद तैयार करने के काम में जुटे रहते हैं, तो कुछ कड़ी धूप में फसल की कटाई कर रहे होते हैं। ये लोग किसी शानदार रिजॉर्ट में छुट्टियां बिताने नहीं आते, बल्कि 10 से 15 दिनों तक एक सच्चे भारतीय किसान की जिंदगी जीने आते हैं। खेतों में काम करते हुए इन विदेशी मेहमानों की मेहनत देखकर कई बार तो ऐसा लगता है कि वे स्थानीय मजदूरों से भी ज्यादा लगन से काम कर रहे हैं।
देश के कई राज्यों से भी आते हैं सीखने वाले
इस अनोखे कृषि मॉडल की लोकप्रियता सिर्फ विदेशों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से भी लोग यहां खिंचे चले आते हैं। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पंजाब समेत कई राज्यों के लोग, जो शहरों की भागदौड़ भरी जिंदगी से ऊब चुके हैं, यहां आकर खेती की बारीकियां सीखते हैं। यहां आने वाले मेहमानों को खेती सिर्फ दूर से दिखाई नहीं जाती, बल्कि उन्हें खेती के हर छोटे-बड़े काम में सीधे तौर पर शामिल किया जाता है। 10 से 15 दिन के इस प्रवास के दौरान वे खुद अपने हाथों से खेत तैयार करते हैं और फसल बोते हैं। उन्हें किताबों या वीडियो के बजाय सीधे जमीन पर उतरकर ऐसा व्यावहारिक ज्ञान मिलता है, जो जिंदगी भर उनके काम आता है।
रासायनिक खेती से जैविक की ओर अहम बदलाव
वेंकटेश की यह सफलता रातों-रात नहीं मिली है। कुछ साल पहले तक वे भी अपने इलाके के अन्य किसानों की तरह ही रासायनिक खादों और कीटनाशकों का इस्तेमाल करके पारंपरिक खेती किया करते थे। उस समय उनकी आमदनी का एकमात्र जरिया केवल फसल की पैदावार बेचना ही था। लेकिन उनकी जिंदगी में सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब उनकी मुलाकात बेंगलुरु के दो IT पेशेवरों, जे. फ्रैंकलिन और संगीता से हुई। इन दोनों ने वेंकटेश के काम करने के तरीके को देखा और उन्हें रासायनिक खेती छोड़कर पूरी तरह से जैविक खेती अपनाने की नेक सलाह दी। इसी सलाह ने उनके सोचने का नजरिया बदल दिया। वेंकटेश को यह विचार आया कि क्यों न अपने खेत को एक ऐसी जगह बनाया जाए जहां लोग जैविक खेती को साक्षात अनुभव कर सकें। आज उनके खेत पर आने वाले लोगों को जीवामृत और पंचगव्य जैसे प्राकृतिक खाद बनाने, वर्मीकम्पोस्ट तैयार करने और डेयरी फार्मिंग का सीधा प्रशिक्षण दिया जाता है।
इंटरनेट के जरिए मिली अंतरराष्ट्रीय पहचान
एक साधारण खेत के ग्लोबल एग्री-टूरिज्म सेंटर बनने के पीछे इंटरनेट की बहुत बड़ी भूमिका रही है। करीब पांच साल पहले संगीता ने एक अहम कदम उठाते हुए वेंकटेश के खेत को वूफ और वर्कअवे जैसे बड़े अंतरराष्ट्रीय प्लेटफॉर्म्स पर रजिस्टर कर दिया। ये वेबसाइट्स दुनिया भर के उन यात्रियों और वॉलंटियर्स को किसानों से जोड़ती हैं, जो काम के बदले रहने की जगह, स्थानीय संस्कृति और खेती का ज्ञान पाना चाहते हैं। इस एक कदम ने पलाहल्ली के इस छोटे से खेत को दुनिया के नक्शे पर ला खड़ा किया। आज आलम यह है कि वेंकटेश के खेत पर हर साल विदेशी पर्यटकों के लगभग 15 बैच आते हैं। हर बैच में औसतन चार लोग होते हैं, जो सीधे ईमेल के जरिए संपर्क करते हैं और अपना स्लॉट बुक करके 10 से 15 दिनों के लिए खेती सीखने चले आते हैं।
भरोसे पर टिका बिना फिक्स किराये का बिजनेस मॉडल
इस पूरे बिजनेस मॉडल की सबसे हैरान करने वाली बात इसकी कमाई का तरीका है। जहां दुनिया भर में पर्यटन के नाम पर भारी-भरकम फीस वसूली जाती है, वहीं इस खेत पर आने वाले मेहमानों के लिए रहने और खाने का कोई फिक्स किराया तय नहीं है। चाहे भारतीय हों या विदेशी, सभी मेहमानों को साधारण कमरों में ठहराया जाता है और उन्हें वही ताजी सब्जियां परोसी जाती हैं जो खेत में उगाई जाती हैं। जब मेहमानों के लौटने का वक्त आता है, तो उनसे कोई बिल नहीं मांगा जाता। वेंकटेश का कहना है कि लोग यहां से जो भी ज्ञान और अनुभव लेकर जाते हैं, उसके बदले वे अपनी इच्छा और सामर्थ्य के अनुसार जो चाहें, दे सकते हैं। बिना किसी शर्त वाले इस भरोसेमंद मॉडल ने लोगों का दिल जीत लिया है। इसी अनूठे तरीके से वेंकटेश सिर्फ एग्री-टूरिज्म के जरिए हर साल 10 लाख रुपये कमा लेते हैं, जो उनकी फसल से होने वाली कमाई से कहीं ज्यादा है।
एकीकृत खेती का बेहतरीन पारिस्थितिकी तंत्र
पर्यटन के इस सफल मॉडल के पीछे एक बहुत ही मजबूत और विविधता से भरा खेती का ढांचा है। वेंकटेश अपने पांच एकड़ के खेत में सिर्फ एक ही फसल नहीं उगाते, बल्कि उन्होंने इंटीग्रेटेड फार्मिंग (एकीकृत खेती) का शानदार तंत्र विकसित किया है। उनके खेतों में देसी धान की कई पुरानी किस्में लहलहाती हैं, जिनमें सिद्धासन्ना सबसे प्रमुख है। इसके अलावा वे रागी, ज्वार, तरह-तरह के फल, सब्जियां और पत्तेदार साग भी उगाते हैं। खेत का वातावरण पूरी तरह से आत्मनिर्भर है, जहां गाय और बकरियां भी पाली जाती हैं, मछली पालन के लिए तालाब है और केंचुए की खाद (वर्मीकम्पोस्ट) बनाने की अलग यूनिट भी लगी है। वे अपने फार्म की देसी गायों का शुद्ध दूध और घी भी बेचते हैं, जिससे उनकी आमदनी में और इजाफा होता है।
हजारों किसानों के लिए प्रेरणा और प्रशिक्षण का केंद्र
आज वेंकटेश का यह खेत केवल पर्यटकों के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि समुदाय के लिए भी एक बहुत बड़ा ट्रेनिंग सेंटर बन चुका है। राज्य के कृषि, बागवानी और डेयरी विभाग के सहयोग से यहां समय-समय पर बड़े प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन कार्यक्रमों में दूर-दूर से किसान आते हैं जिन्हें मिट्टी की सेहत सुधारने, जैविक खेती करने, डेयरी फार्मिंग को मुनाफेदार बनाने और इंटीग्रेटेड फार्मिंग के बारे में विस्तार से जानकारी दी जाती है। पारंपरिक खेती से शुरुआत करके हर साल 10 लाख रुपये कमाने वाले वेंकटेश की यह कहानी साबित करती है कि अगर किसान नए और आधुनिक तरीके अपनाए, तो उसका खेत न सिर्फ पर्यटकों के लिए एक सुकून भरी जगह बन सकता है, बल्कि कमाई का एक बहुत बड़ा साधन भी बन सकता है। उनका यह मॉडल आज हजारों किसानों को एक नई राह दिखा रहा है।




















