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खैरथल-तिजारा की सखी समिति: 100 रुपये की छोटी बचत ने 2000 महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर, साढ़े तीन दशक से जल रही आत्मनिर्भरता की मशालसक्सेस स्टोरी
18 जून 2026, 2:46 am (87 दिन पहले)· 1

खैरथल-तिजारा की सखी समिति: 100 रुपये की छोटी बचत ने 2000 महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर, साढ़े तीन दशक से जल रही आत्मनिर्भरता की मशाल

राजस्थान के खैरथल-तिजारा जिले के किशनगढ़ बास में करीब 35 साल से चल रही सखी समिति ने 200 से ज्यादा स्वयं सहायता समूहों के जरिए लगभग 2000 ग्रामीण और मेवात क्षेत्र की महिलाओं को स्वरोजगार और बचत की राह दिखाई है। रोज की कमाई से 100 से 500 रुपये की बचत ने इन महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से आजाद कर दिया है।

राजस्थान के नए बने खैरथल-तिजारा जिले का किशनगढ़ बास इलाका इन दिनों महिला आत्मनिर्भरता की एक मिसाल बनकर उभर रहा है। यहाँ की सखी समिति बीते करीब साढ़े तीन दशक से उन महिलाओं के लिए सहारा बनी हुई है जिनके पास न पूँजी थी, न कोई ठोस आसरा। यह संस्था ग्रामीण इलाकों की महिलाओं को स्वयं सहायता समूहों (SHG) से जोड़कर उन्हें संगठित करती है और साथ ही स्वरोजगार तथा आर्थिक स्वतंत्रता का रास्ता भी खोलती है।

करीब 35 वर्षों के इस लंबे सफर में संस्था ने हजारों परिवारों को आर्थिक संकट से उबारा है। आज इसके बैनर तले 200 से अधिक स्वयं सहायता समूह सक्रिय रूप से काम कर रहे हैं और इनसे लगभग 2,000 ग्रामीण व मेवात क्षेत्र की महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं।

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एक छात्रा से शुरू हुआ 32 साल का सफर

समिति की समर्पित सदस्य सीता देवी अपनी कहानी सुनाते हुए बताती हैं कि वे जब महज 12वीं कक्षा में पढ़ रही थीं, तभी किशनगढ़ बास की इस संस्था से जुड़ गई थीं। महिलाओं के अधिकारों की लड़ाई लड़ते और उनके उत्थान में जुटे रहते हुए ही उन्होंने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। इस संस्था को सेवा देते हुए उन्हें आज पूरे 32 साल हो चुके हैं।

सीता देवी मानती हैं कि शहरों की रौनक से कोसों दूर, सुदूर गाँवों और मेवात की घनी बस्तियों में रहने वाली रूढ़िवादी सोच वाली महिलाओं को आत्मनिर्भरता का महत्व समझाना आसान काम नहीं था। यही सबसे बड़ी चुनौती थी। समिति ने सबसे पहले इन महिलाओं को सिखाया कि घर के रोज़मर्रा के खर्चों में से थोड़ी-थोड़ी रकम कैसे बचाई जाए। आज यही छोटी सी आदत एक बड़े आंदोलन में बदल चुकी है।

चूड़ी की दुकान से ब्यूटी पार्लर तक, कर्ज ने संवारी जिंदगियाँ

संस्था का काम सिर्फ कागजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जमीनी स्तर पर उतरकर सैकड़ों महिलाओं को बैंकों से आसान किश्तों पर ऋण (Loan) दिलाया गया। इसी आर्थिक मदद के दम पर मेवात की कई गरीब महिलाओं ने चूड़ी की दुकानें, किराना स्टोर, सिलाई केंद्र और ब्यूटी पार्लर जैसे अपने छोटे-छोटे रोजगार खड़े किए। नतीजा यह कि आज ये महिलाएं किसी के सामने हाथ फैलाने के बजाय पूरे सम्मान के साथ अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर रही हैं।

मदद यहीं नहीं रुकी। जब किसी गरीब परिवार पर बेटी की शादी का बोझ आ पड़ा, तब समिति ने आगे बढ़कर ऐसे लोन का इंतजाम किया जिनकी पुनर्भुगतान अवधि आसान और किश्तें बेहद लचीली थीं, ताकि माता-पिता पर कर्ज का पहाड़ न टूटे। इसके अलावा घर बैठे आटा चक्की या सिलाई मशीन जैसी छोटी मशीनें लगाने के लिए भी संस्था आर्थिक सहारा देती है।

100 रुपये की बचत और हर महीने की बैठक से मिली ताकत

समिति की कोषाध्यक्ष अनीता ने TrendKia को बताया कि उनकी संस्था का खास ध्यान उन दिहाड़ी मजदूर और गरीब महिलाओं पर है जो रोज कमाती हैं और रोज खाती हैं। ऐसी कामकाजी महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़कर उनमें बचत की मजबूत आदत डाली जा रही है।

समूह से जुड़ी महिलाएं अपनी रोजाना की आमदनी के हिसाब से हर 15 दिन या एक महीने में 100 रुपये से लेकर 500 रुपये तक की छोटी रकम गुल्लक की तरह जमा करती हैं। हर महीने एक नियमित बैठक होती है, जिसमें कर्ज लेने वाली महिलाएं अपनी मासिक किश्तें चुकाती हैं। इसके बाद यही जमा पूँजी किसी और जरूरतमंद महिला को नया कारोबार शुरू करने या पारिवारिक आपात स्थिति के लिए दे दी जाती है।

इस पारदर्शी और जमीनी व्यवस्था का सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि ग्रामीण महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया। कभी ब्याज के बोझ तले दबी रहने वाली ये महिलाएं अब अपनी शर्तों पर अपनी जिंदगी जी रही हैं।

सवाल-जवाब

सखी समिति कहाँ और कब से चल रही है?
यह संस्था राजस्थान के खैरथल-तिजारा जिले के किशनगढ़ बास इलाके में करीब 35 साल यानी साढ़े तीन दशक से चल रही है।
इस समिति से कितनी महिलाएं जुड़ी हुई हैं?
समिति के बैनर तले 200 से अधिक स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनसे लगभग 2,000 ग्रामीण और मेवात क्षेत्र की महिलाएं सीधे जुड़ी हैं।
महिलाएं कितने रुपये की बचत करती हैं?
समूह की महिलाएं अपनी रोजाना की आय के अनुसार हर 15 दिन या एक महीने में 100 रुपये से 500 रुपये तक जमा करती हैं।
इस बचत और लोन का सबसे बड़ा फायदा क्या हुआ?
इस व्यवस्था से ग्रामीण महिलाओं को साहूकारों के चंगुल से आजादी मिली और कई ने चूड़ी दुकान, किराना, सिलाई केंद्र और ब्यूटी पार्लर जैसे स्वरोजगार शुरू किए।
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