शास्त्रीय नृत्य की पारंपरिक विधा को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ीं नृत्यांगना भार्गवी ने मंचेरियल जैसे छोटे कस्बे से निकलकर दुनिया भर में विशिष्ट मुकाम हासिल किया है। कठिन साधना, निरंतर रियाज और कला के प्रति समर्पण के बल पर उन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य कुचिपुड़ी को अंतरराष्ट्रीय फलक पर नई गरिमा प्रदान की है। अपनी इस यात्रा को शैक्षिक धरातल प्रदान करते हुए भार्गवी ने हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी से कुचिपुड़ी विधा में मास्टर्स इन परफॉर्मिंग आर्ट्स की डिग्री पूर्ण की, जिससे उनकी कला को शास्त्रीय गहराई और सैद्धांतिक मजबूती मिली।
बचपन का रुझान और वैश्विक मंचों तक का सफर
नृत्य कला के प्रति भार्गवी का आकर्षण अत्यंत कम उम्र में ही दिखाई देने लगा था। वर्ष 2008 में जब वे काफी छोटी थीं, तब उन्होंने दूरदर्शन के प्रतिष्ठित नृत्य कार्यक्रम की प्रतियोगिता जीतकर अपनी असाधारण प्रतिभा प्रमाणित की। इस शुरुआती सफलता ने उनके भीतर यह दृढ़ विश्वास पैदा किया कि शास्त्रीय नृत्य ही उनके जीवन की वास्तविक दिशा और लक्ष्य है।
इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और अब तक 750 से अधिक मंचों पर अपनी कुचिपुड़ी प्रस्तुतियां दे चुकी हैं। भारत के विभिन्न हिस्सों में कला का प्रदर्शन करने के अलावा, वे अपने गुरु के साथ ऑस्ट्रेलिया के सिडनी, फ्रांस, जर्मनी, नीदरलैंड्स और आयरलैंड जैसे देशों में भारतीय शास्त्रीय नृत्य का परचम लहरा चुकी हैं। उनकी कलात्मक उत्कृष्टता और साधना का ही प्रतिफल है कि उन्हें लंदन स्थित संसद भवन में भी औपचारिक रूप से सम्मानित किया जा चुका है।
सामाजिक धारणाओं को चुनौती और नृत्य अकादमी की शुरुआत
पारंपरिक समाज में शास्त्रीय नृत्य को पूर्णकालिक करियर के रूप में अपनाना आसान नहीं था। शुरुआत में भार्गवी को कई तरह की सामाजिक टिप्पणियों और आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। अनेक लोगों का तर्क था कि औपचारिक पढ़ाई छोड़कर नृत्य में समय और आर्थिक संसाधनों का निवेश करना उचित नहीं है। हालांकि भार्गवी ने इन बातों से विचलित हुए बिना अपनी कला साधना को सर्वोच्च प्राथमिकता दी।
उनका दृढ़ दृष्टिकोण रहा कि औपचारिक शिक्षा का अपना महत्व अवश्य है, किंतु एक समर्पित कलाकार के तौर पर अर्जित आत्मसम्मान और सांस्कृतिक पहचान सर्वोपरि होती है। इसी विचार को धरातल पर उतारने और भावी पीढ़ी तक कुचिपुड़ी की समृद्ध परंपरा पहुंचाने के उद्देश्य से उन्होंने एक नृत्य संस्थान स्थापित किया। वर्तमान में उनके इस संस्थान में 100 से अधिक विद्यार्थी प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं, जिनमें भारत के विभिन्न शहरों के अलावा अमेरिका और दुबई के शिक्षार्थी भी शामिल हैं।
पारिवारिक संबल और मातृत्व के साथ कला का संतुलन
भार्गवी अपनी इस लंबी और प्रेरणादायक उपलब्धि का वास्तविक श्रेय अपने माता-पिता और अपने पति प्रेम के निरंतर सहयोग को देती हैं। विवाह के पश्चात और दो वर्ष की नन्हीं बेटी की मां होने के उत्तरदायित्वों के बीच भी उन्होंने अपनी कला यात्रा को धीमा नहीं पड़ने दिया। उनके पति प्रेम ने नृत्य संस्थान के नियमित संचालन से लेकर उनके कलात्मक सपनों को साकार करने में कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग दिया।
भार्गवी का यह सफर स्पष्ट करता है कि पारिवारिक समर्थन, सुदृढ़ इच्छाशक्ति और कठिन परिश्रम के समन्वय से महिलाएं पारिवारिक जिम्मेदारियों और मातृत्व के साथ भी अपने जुनून को जीवनभर जीवंत रख सकती हैं।



















