झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली अनीता का जीवन आर्थिक संघर्षों से भरा हुआ था। एक दौर ऐसा भी था जब उनके पास एक रुपया तक नहीं होता था और वे दैनिक जरूरतों के लिए भी लाचार थीं। चार साल पहले जब उन्होंने स्वयं सहायता समूह का दामन थामा, तो उनके हालात पूरी तरह बदलने लगे। सरकारी सहयोग और कौशल विकास की बदौलत आज वे हर महीने 20,000 रुपये तक की आमदनी अर्जित कर रही हैं और अपने पूरे परिवार का मजबूत सहारा बन चुकी हैं।
रतन फाउंडेशन से प्रशिक्षण और कला का विकास
अनीता के मुताबिक, सरकार के रतन फाउंडेशन के माध्यम से उन्हें तरह-तरह के व्यावसायिक हुनर सीखने का अवसर मिला। इस प्रशिक्षण में उन्होंने विशेष रूप से जुट के बैग, फाइलें और कलात्मक चूड़ियां बनाना सीखा। उन्होंने मेटल की चूड़ियों के साथ-साथ पारंपरिक सोहराई पेंटिंग, मिरर वर्क और खूबसूरत मैटेलिक कलाकारी वाली चूड़ियां तैयार करने में महारत हासिल की। इसके अलावा वे पारंपरिक लाह की चूड़ियां भी अपने घर पर ही तैयार करती हैं। उनके उत्पादों की गुणवत्ता किसी भी बड़े बाजार या ब्रांडेड सामान से कम नहीं होती।
चारदीवारी से निकलकर देश भर में पहचान
शुरुआती दिनों में अनीता संकोच के कारण घर से बाहर नहीं निकलती थीं। उनके पास न तो आत्मविश्वास था और न ही उन्होंने बाहर की दुनिया देखी थी। पैसे की भारी किल्लत के बीच वे किसी अजनबी से बातचीत करने में भी झिझकती थीं। अब स्थिति पूरी तरह पलट चुकी है। वे देश के कोने-कोने में लगने वाली सरकारी प्रदर्शनियों में सक्रिय रूप से भाग लेने जाती हैं। वहां अलग-अलग राज्यों के लोगों से मिलकर उन्हें अपने हस्तनिर्मित उत्पादों की जानकारी देती हैं, जिससे उन्हें देश भ्रमण के साथ-साथ सीधे खरीदार भी मिल रहे हैं।
घर से ही मिल रहे ऑर्डर, बच्चों की पढ़ाई पर निवेश
अनीता अपने हाथों से जुट के सुंदर बैग बनाती हैं, जिन पर आकर्षक पेंटिंग उकेरी जाती है। उनके द्वारा बनाई गई फाइलों और थैलों की बाजार में अच्छी मांग बनी हुई है। उनके काम की लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी है कि स्थानीय लोग सीधे उनके घर आकर चूड़ियों और बैग का ऑर्डर देते हैं। अपने हुनर के दम पर अनीता अब हर महीने 20,000 रुपये तक की कमाई कर रही हैं।
आर्थिक स्वावलंबन से मिला मानसिक सुकून
अनीता इस कमाई का उपयोग अपने घर के दैनिक खर्च चलाने और बच्चों की अच्छी शिक्षा पर कर रही हैं। जहां कभी एक-एक रुपये के लिए सोचना पड़ता था, वहीं आज वे पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं और किसी भी जरूरी खर्च के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। अपने पैरों पर खड़े होने के बाद उन्हें जीवन में एक गहरा मानसिक सुकून और आत्मसम्मान हासिल हुआ है।



















