व्यायाम और कसरत के बाद गरमागरम दूध-जलेबी खाने की एक निजी आदत किस तरह शहर की ऐतिहासिक पहचान बन सकती है, इसकी जीती-जागती मिसाल राजस्थान के कोटा शहर में देखने को मिलती है। चार पीढ़ियों से पारंपरिक स्वाद परोस रहा शंभू लाल का प्रतिष्ठान इन दिनों कोटा दशहरा मेले में पहली बार अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। मेले के परिसर में लगे इस स्टॉल पर रोजाना 500 से 1000 लोग पारंपरिक मिठास का आनंद लेने पहुंच रहे हैं, जिससे यह आयोजन के प्रमुख आकर्षणों में शुमार हो गया है।
रामपुरा की तंग गलियों से हुई थी स्वाद के सफर की शुरुआत
इस पारिवारिक व्यापार की जड़ें कोटा के रामपुरा इलाके से जुड़ी हुई हैं। सबसे पहले परदादा ओंकार लाल जी सैनी ने इस कार्य की नींव रखी थी। उनके बाद परिवार की कमान दादाजी शंभू लाल जी के हाथों में आई, जिनके नाम पर यह दुकान आज भी पूरे शहर में पहचानी जाती है। शंभू लाल जी स्वयं अखाड़े में पहलवानी करते थे और कसरत पूरी करने के उपरांत नाश्ते में दूध-जलेबी का सेवन करना उनका खास शौक था। अखाड़े के साथियों और स्थानीय पड़ोसियों ने जब उनके साथ इस नाश्ते का स्वाद चखा, तो वे इसके कायल हो गए। लोगों की बढ़ती रुचि और मांग को देखते हुए उन्होंने नियमित तौर पर दुकान शुरू कर दी, जो देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में ख्याति प्राप्त करने लगी।
चार पीढ़ियों की विरासत और शुद्धता की परंपरा
समय बीतने के साथ कारोबार की बागडोर पिता चंद्रप्रकाश जी और चाचा भरत प्रकाश जी के पास आई, जिन्होंने इसे पूरी निष्ठा से आगे बढ़ाया। अब इस पारिवारिक विरासत को चौथी पीढ़ी संभाल रही है। परिवार के सदस्य अभय सैनी बताते हैं कि पूरा कुनबा मिलकर इस कारोबार को चला रहा है। उनके अनुसार पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन दुकान के मूल स्वाद में कोई बदलाव नहीं आने दिया गया।
प्रतिष्ठान की सफलता का सबसे बड़ा आधार सामग्री की गुणवत्ता है। अभय सैनी के अनुसार वे पूरी तरह शुद्धता पर ध्यान देते हैं और किसी भी तरह की मिलावट से दूर रहते हैं। जलेबी को तैयार करने में केवल शुद्ध देसी घी का उपयोग किया जाता है। वहीं दूसरी तरफ, रबड़ी तैयार करने के लिए गाय और भैंस के शुद्ध दूध का इस्तेमाल होता है। दुकान का कामकाज हर रोज तड़के 5 बजे शुरू हो जाता है और सुबह 6:30 बजे तक खरीदारों को ताजी जलेबी, खौलते दूध और गाढ़ी रबड़ी की सेवा मिलने लगती है।
हाड़ौती अंचल की मांग पर मेले में पहली बार स्टॉल
हाड़ौती संभाग और आसपास के कस्बों से लगातार यह बात सामने आ रही थी कि इस ऐतिहासिक प्रतिष्ठान को कोटा दशहरा मेले का भी हिस्सा बनना चाहिए। लोगों के इसी विश्वास और आग्रह का मान रखते हुए परिवार ने इस वर्ष मेले में अपनी दुकान लगाने का निर्णय लिया। स्टॉल शुरू होते ही ग्राहकों का जबरदस्त रुझान देखने को मिला है और हर दिन 500 से 1000 लोग यहां स्वाद चखने आ रहे हैं। अभय ने नगर निगम द्वारा की गई व्यवस्थाओं की सराहना करते हुए कहा कि मेले का माहौल बेहतरीन है और वे उसी पारंपरिक गुणवत्ता को बड़े जनसमूह तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं।



















