उदयपुर जिले के आदिवासी क्षेत्रों में एक बड़ा आर्थिक बदलाव देखने को मिल रहा है। जो महिलाएं कभी अनिश्चित दिहाड़ी मजदूरी की तलाश में दूर-दराज के शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर थीं, वे अब अपने ही गांव में एक सफल स्थानीय उद्यम चला रही हैं। गोगुंदा क्षेत्र की इन आदिवासी महिलाओं ने जामुन की व्यावसायिक क्षमता का सही उपयोग करके आत्मनिर्भरता का एक शानदार मॉडल तैयार किया है। उन्होंने यह साबित कर दिया है कि स्थायी ग्रामीण रोजगार पूरे परिवार की दिशा बदल सकता है।
गांव में ही स्थायी आमदनी का साधन
इस बड़े बदलाव का केंद्र गोगुंदा स्थित स्ट्री सखी एग्रो फूड है, जो स्थानीय समुदाय के लिए एक प्रमुख आर्थिक आधार बन चुका है। यह उद्यम वर्तमान में 300 से अधिक आदिवासी महिलाओं को नियमित रोजगार दे रहा है। यह उस अनौपचारिक श्रम बाजार से बिल्कुल अलग है, जिसका वे पहले हिस्सा हुआ करती थीं। अब हर महिला हर महीने 10 हजार रुपये से अधिक की आय प्राप्त कर रही है। इस आर्थिक स्थिरता ने स्थानीय अर्थव्यवस्था में नई जान फूंक दी है, जिससे ये परिवार अब केवल दिन काटने के बजाय अपने भविष्य की योजना बना पा रहे हैं।
जंगलों से लेकर आधुनिक मशीनों तक का सफर
इन दिनों जामुन का सीजन अपने चरम पर है, इसलिए कंपनी में बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण का कार्य चल रहा है। काम की शुरुआत महिलाओं द्वारा आसपास के जंगलों और क्षेत्रों से ताजे जामुन इकट्ठा करने से होती है। फल को कारखाने में लाने के बाद उसे अच्छी तरह से साफ किया जाता है। स्वच्छता मानकों का पूरा ध्यान रखना यहां की सर्वोच्च प्राथमिकता है; महिलाएं दस्ताने पहनकर एक-एक जामुन से बीज अलग करने का काम करती हैं। बीज निकालने के बाद, गूदे को आधुनिक मशीनों में डाला जाता है, जो इसे एक चिकने पेस्ट में बदल देती हैं। तैयार किए गए इस पेस्ट को ताजगी बनाए रखने के लिए पैक करके डीप फ्रीज में सुरक्षित रखा जाता है। इसके बाद इसे गुजरात सहित देश के कई अन्य राज्यों में भेज दिया जाता है।
अनिश्चित पलायन के चक्र का अंत
इस पहल का सबसे बड़ा प्रभाव मजबूरी में होने वाले पलायन को रोकने में दिखा है। कंपनी में काम करने वाली नानकी बाई ने अपने पुराने संघर्षों को साझा किया। उन्होंने बताया कि पहले उन्हें रोजगार के लिए गोगुंदा से निकलकर उदयपुर, पिंडवाड़ा और सिरोही जैसे शहरों में जाना पड़ता था। इतनी लंबी यात्रा करने के बाद भी इस बात की कोई गारंटी नहीं होती थी कि पूरे दिन का काम मिलेगा या नहीं। अब अपने ही गांव में स्थायी नौकरी मिलने का मतलब है कि वे अपने परिवार के करीब रह सकती हैं और बिना किसी चिंता के घर का खर्च आसानी से चला सकती हैं।
शिक्षा का खर्च और बढ़ता आत्मविश्वास
एक भरोसेमंद आय आने से परिवारों के भीतर पारंपरिक भूमिकाओं में भी काफी बदलाव आया है। कारखाने की एक अन्य कार्यकर्ता सुगना गरासिया ने बताया कि जो महिलाएं पहले केवल घर के कामकाज तक ही सीमित रहती थीं, वे अब आर्थिक रूप से मजबूत बनकर उभर रही हैं। फल प्रसंस्करण से होने वाली कमाई का उपयोग सीधे उनके परिवारों की भलाई के लिए हो रहा है। महिलाएं अपने वेतन का उपयोग बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च और अन्य जरूरी जरूरतों को पूरा करने के लिए कर रही हैं। इस नई आर्थिक ताकत ने उनके आत्मविश्वास को स्पष्ट रूप से बढ़ाया है, जिससे गांव की अन्य महिलाएं भी प्रेरित होकर आगे आ रही हैं और इस काम से जुड़ रही हैं।
एक मौसम से आगे की सोच
इस उद्यम की रणनीति इस तरह बनाई गई है कि फसल के हर हिस्से का अधिकतम मूल्य प्राप्त किया जा सके। स्ट्री सखी एग्रो फूड के संचालक मुकेश कुमार ओझा ने बताया कि प्रसंस्कृत जामुन का उपयोग कई तरह के खाद्य उत्पाद बनाने में किया जाता है। इसके अलावा, यहां कुछ भी बर्बाद नहीं होता; निकाले गए बीजों की भी बहुत मांग है और उनका उपयोग डायबिटीज की दवाइयों के निर्माण में किया जाता है। महिलाओं को साल भर रोजगार मिलता रहे, यह सुनिश्चित करने के लिए ओझा ने स्पष्ट किया कि कारखाना केवल एक ही फसल पर निर्भर नहीं है। मौसम के अनुसार जैसे-जैसे अन्य फल उपलब्ध होते हैं, कंपनी उनका भी प्रसंस्करण करती है और मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करती है। स्थानीय कृषि के प्रति इस व्यापक सोच ने गोगुंदा की महिलाओं को उनके समाज की आर्थिक मजबूती का एक महत्वपूर्ण स्तंभ बना दिया है।


















