यूट्यूब एक्सपर्ट के आसान टिप्स: प्रूनिंग और खास खाद से गुड़हल में आएंगे ढेरों फूलभारत NCAP सेफ्टी असेसमेंट में टाटा की इस इलेक्ट्रिक कार का जलवा, पंच ईवी को मिली 5 स्टार रेटिंगअमेरिकी आव्रजन एजेंसी आईसीई के नए अनुबंधों में डिटेंशन सेंटरों पर राज्य कानून लागू न होने का दावाडायबिटीज कंट्रोल और तेजी से वजन घटाने में असरदार है क्विनोआ-वेजिटेबल खिचड़ी, देखें पूरी रेसिपीग्लासगो में जैस्मीन लांबोरिया ने क्वार्टरफाइनल जीतकर पक्का किया 10वां पदक, मुक्केबाजी में भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शनग्लास्गो में भारतीय मुक्केबाजों का शानदार रिकॉर्ड, साक्षी और नरेंदर समेत 5 और खिलाड़ी सेमीफाइनल में पहुंचेकाठमांडू को क्यों कहते हैं मोमो का गढ़ और हर दिन इसे खाने के क्या हैं सेहत संबंधी खतरेन्यू मेक्सिको में ठंडे पड़े जिओथर्मल वेल को एआई और एडवांस ड्रिलिंग से मिला नया जीवनरात में बाइक चलाते वक्त कम दिख रही सड़क? रोशनी दोगुनी करने के लिए आजमाएं ये 5 असरदार तरीकेइथेनॉल ब्लेंडिंग नीति के खिलाफ टाउनहॉल रोकने का आरोप, अरविंद केजरीवाल ने कहा पुलिस कार्रवाई से नहीं डरेगा देश
उत्तर प्रदेश के गोंडा में किसान संजय मौर्य ने अपनाया लौकी का मॉडल, 3 हजार की लागत से पाई 80 हजार रुपये तक की आमदनीसक्सेस स्टोरी
29 जुल॰ 2026, 3:18 pm (15 घंटे पहले)· 2

उत्तर प्रदेश के गोंडा में किसान संजय मौर्य ने अपनाया लौकी का मॉडल, 3 हजार की लागत से पाई 80 हजार रुपये तक की आमदनी

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के रुपईडीह विकासखंड के किसान संजय मौर्य ने धान-गेहूं छोड़कर लौकी की खेती शुरू की है। मात्र 3,000 रुपये की लागत लगाकर वह 6 से 7 महीने में 70,000 से 80,000 रुपये तक कमा रहे हैं।

उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले स्थित रुपईडीह विकासखंड के रहने वाले युवा कृषक संजय मौर्य ने खेती-किसानी के पारंपरिक तौर-तरीकों को पीछे छोड़ते हुए सब्जी उत्पादन के क्षेत्र में मिसाल कायम की है। उन्होंने पारंपरिक धान और गेहूं की खेती के स्थान पर लौकी की खेती को अपनाया है। अपनी कड़ी मेहनत और वैज्ञानिक तकनीकों के बल पर वे न केवल लौकी की बंपर पैदावार हासिल कर रहे हैं, बल्कि अपनी आर्थिक स्थिति में भी उल्लेखनीय सुधार लाने में सफल हुए हैं। उनकी इस उपलब्धि को देखकर आसपास के कई अन्य किसान भी सब्जियों की व्यावसायिक खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

पारंपरिक खेती की चुनौतियों से सब्जी उत्पादन तक का सफर

संजय मौर्य पूर्व में पारंपरिक फसलों जैसे धान और गेहूं की ही खेती किया करते थे। हालांकि, इन फसलों में बीज, खाद और सिंचाई की लागत साल-दर-साल बढ़ती जा रही थी, जबकि बाजार में प्राप्त होने वाला मुनाफा बहुत सीमित रहता था। कड़ी मेहनत के बावजूद अपेक्षित लाभ न मिलने के कारण उन्होंने कृषि के प्रारूप को बदलने का विचार बनाया। इसी क्रम में उन्होंने कम समय और कम लागत में बेहतर रिटर्न देने वाली लौकी की फसल को चुनने का निर्णय लिया। शुरुआत में उन्होंने परीक्षण के तौर पर बहुत छोटे भूभाग पर लौकी बोई थी। जब फसल की गुणवत्ता अच्छी रही और बाजार में बेहतर दाम मिले, तो उन्होंने खेती का दायरा बढ़ाने का मन बना लिया।

ये भी पढ़ें

यूट्यूब और डिजिटल माध्यमों से हासिल की तकनीक

सब्जी की खेती में कदम रखने से पहले संजय मौर्य ने आधुनिक जानकारी जुटाने पर जोर दिया। उन्होंने यूट्यूब और इंटरनेट के विभिन्न मंचों के माध्यम से लौकी की वैज्ञानिक खेती के बारे में विस्तार से अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त, उन्होंने क्षेत्र के उन अनुभवी किसानों से भी सीधा संपर्क स्थापित किया जो पहले से लौकी उगा रहे थे। उनसे व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपने खेत को तैयार किया। लौकी की अच्छी पैदावार के लिए खेत की गहरी जुताई, सही जल निकासी, समय पर सिंचाई और निराई-गुड़ाई की प्रक्रिया बेहद आवश्यक होती है।

जैविक खाद और समय पर फसल की निगरानी

संजय मौर्य अपनी लौकी की फसल में रासायनिक उर्वरकों के बजाय संतुलित मात्रा में जैविक खाद का प्रयोग करते हैं। उनका मानना है कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखने और सब्जी की गुणवत्ता सुधारने में जैविक खाद मुख्य भूमिका निभाती है। इसके साथ ही वे खेत की नियमित निगरानी करते हैं। पौधों का निरंतर निरीक्षण करने से कीटों और विभिन्न रोगों का शुरुआती चरण में ही पता चल जाता है, जिससे समय रहते उनका जैविक अथवा सुरक्षित तरीकों से नियंत्रण कर लिया जाता है। बेहतर देखभाल के कारण उनकी लौकी की चमक और ताजगी बाजार में अलग ही नजर आती है।

लागत, कुल मुनाफा और आगे की योजनाएं

संजय मौर्य वर्तमान में लगभग एक बीघा जमीन पर लौकी की फसल उगा रहे हैं। एक बीघा खेत में लौकी की खेती शुरू करने में उनकी कुल लागत लगभग 3,000 रुपये आती है। लौकी की फसल को पूरी तरह तैयार होने और कटाई योग्य बनने में 6 से 7 महीने का समय लगता है। इस अवधि के दौरान वे अपनी उपज को बेचकर 70,000 रुपये से लेकर 80,000 रुपये तक की कुल आमदनी अर्जित कर लेते हैं। उनकी उत्पादित लौकी की स्थानीय मंडियों के साथ-साथ आसपास के ग्रामीण और शहरी बाजारों में काफी मांग रहती है, जिससे बिक्री में कोई परेशानी नहीं आती। इस कमाई से उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हुई है और वे आने वाले समय में सब्जी की खेती के क्षेत्र का और अधिक विस्तार करने की योजना बना रहे हैं।

सवाल-जवाब

संजय मौर्य कहां के रहने वाले हैं और वे किस फसल की खेती कर रहे हैं?
संजय मौर्य उत्तर प्रदेश के गोंडा जिले के रुपईडीह विकासखंड के निवासी हैं और वे वर्तमान में मुख्य रूप से लौकी की खेती कर रहे हैं।
उन्होंने पारंपरिक फसलों को छोड़कर लौकी की खेती क्यों चुनी?
धान और गेहूं जैसी फसलों में लागत अधिक आ रही थी और मुनाफा कम मिल रहा था, जिसके चलते उन्होंने बेहतर आय के लिए लौकी की खेती का विकल्प चुना।
एक बीघा जमीन में लौकी उगाने में कितनी लागत आती है और कितनी आमदनी होती है?
एक बीघा खेत में लगभग 3,000 रुपये की लागत आती है और 6 से 7 महीने के फसल चक्र में 70,000 से 80,000 रुपये तक की आमदनी होती है।
संजय मौर्य को खेती के इस नए तरीके की जानकारी कहां से मिली?
उन्हें यूट्यूब, इंटरनेट और क्षेत्र के अन्य अनुभवी लौकी उत्पादक किसानों के साथ चर्चा करके वैज्ञानिक खेती की जानकारी प्राप्त हुई।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं — पहली टिप्पणी आपकी हो!

नागरिक पत्रकारिता

TrendKia पत्रकार बनें

जनता की आवाज़

अपने आसपास की ख़बरें, तस्वीरें और वीडियो ट्रेंडकिआ के साथ साझा करें और अपनी आवाज़ देश तक पहुँचाएँ। हर नागरिक एक पत्रकार।

अभी जुड़ें
CH 01 लाइव
TrendKia TV ON AIR