ब्राज़ीलियाई मुद्रा रियाल में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले चार प्रतिशत तक की उल्लेखनीय मजबूती देखने को मिली है, जिससे यूएसडी/बीआरएल की विनिमय दर 5.2 से फिसलकर 5 के स्तर पर आ गई। चुनावी दौड़ में एफ. बोल्सोनारो की शुरुआती बढ़त के बाद मुद्रा बाजार में यह उत्साह दर्ज किया गया। हालांकि, वित्तीय हलकों में इस बात पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है कि संसद की वास्तविक संरचना नए प्रशासन के आर्थिक एजेंडे को किस हद तक समर्थन दे पाएगी। पार्टिडो लिबरल और अन्य रूढ़िवादी दलों को संसदीय चुनावों में सीटें जरूर मिली हैं, लेकिन वे अपने दम पर पूर्ण बहुमत के आंकड़े से अभी दूर हैं।
संसद में गठबंधन पर निर्भरता और राजनीतिक समीकरण
संसदीय शक्ति संतुलन में बदलाव के बावजूद सरकार को कानून पारित कराने के लिए अन्य राजनीतिक दलों के समर्थन पर निर्भर रहना पड़ेगा। पार्टिडो लिबरल की अगुवाई वाला गठबंधन अन्य रूढ़िवादी गुटों के साथ मिलकर काम करने के लिए मजबूर होगा क्योंकि यह समूह पूरी तरह एकजुट नहीं है और कई छोटे धड़ों में बंटा हुआ है। यदि एफ. बोल्सोनारो चुनाव जीतते हैं, तो उनके सामने अपने पिता जेयर बोल्सोनारो की तुलना में अधिक अनुकूल माहौल जरूर हो सकता है, लेकिन बिना किसी अंकुश या राजनीतिक समझौते के शासन चलाना संभव नहीं होगा। किसी भी बड़े आर्थिक सुधार या कानून को अमलीजामा पहनाने के लिए विभिन्न विचारधाराओं वाले गुटों के बीच सहमति बनानी होगी।
बाजार समर्थक सुधारों के सामने चुनौतियां
वित्तीय विश्लेषकों का मानना है कि बाजार प्रतिभागियों द्वारा दिखाए जा रहे शुरुआती उत्साह को पूरी तरह अंतिम नहीं माना जा सकता। कागजों पर रूढ़िवादी दिखने वाली संसद अपने आप में सुगम आर्थिक नीतियां बनने की गारंटी नहीं देती। जैसे-जैसे प्रशासनिक और सामाजिक दबाव बढ़ता है, बाजार-उन्मुख पहलों और सुधारों के प्राथमिकता खोने का जोखिम हमेशा बना रहता है। एफ. बोल्सोनारो द्वारा घोषित सुधार वास्तव में कानून की शक्ल ले पाएंगे या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे संसद में मौजूद राजनीतिक गतिरोधों से कैसे निपटते हैं।
रनऑफ चुनाव और लूला की संभावनाएं
चुनावी मुकाबले के दूसरे चरण यानी रनऑफ पर भी सबकी निगाहें टिकी हुई हैं। यदि इस चरण में लूला की जीत होती है, तो उनके लिए संसद में अपने राजनीतिक और आर्थिक एजेंडे को आगे बढ़ाना और भी बड़ी चुनौती साबित होगा। वर्तमान में बाजार प्रतिभागी तीसरे स्थान पर रहे उम्मीदवारों के रुख पर बारीक नजर रखे हुए हैं। रनऑफ में दोनों प्रमुख दावेदारों में से वे किसे अपना समर्थन देने का फैसला करते हैं, इसका सीधा असर निवेशकों के मूड और मुद्रा के उतार-चढ़ाव पर पड़ेगा।
वैश्विक मुद्रा बाजारों में डॉलर का दबाव और केंद्रीय बैंकों का रुख
वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में मंगलवार को एशियाई सत्र के दौरान एयूडी/यूएसडी में मामूली गिरावट दर्ज की गई, जिससे पिछले सप्ताह छुए गए दो महीने के निचले स्तर से शुरू हुई दो दिवसीय रिकवरी की गति थम गई। अमेरिकी फिक्स्ड इनकम बाजार में लगातार बिकवाली के चलते बॉन्ड यील्ड बहु-वर्षीय उच्च स्तर के करीब बनी हुई है। अक्टूबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें बढ़ाने की घटती संभावनाओं के बावजूद, भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं और ऊंची बॉन्ड यील्ड ने अमेरिकी डॉलर को मजबूत स्थिति में बनाए रखा है। दूसरी ओर, रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया द्वारा इसी महीने ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी किए जाने की उम्मीदें ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के लिए एक सहायक कारक साबित हो सकती हैं।
यूरोपीय सत्र की शुरुआत में यूएसडी/जेपीवाई बढ़कर 158.00 के पार निकल गया। बैंक ऑफ जापान की ओर से सख्त रुख की उम्मीदों और बाजार में संभावित सरकारी हस्तक्षेप के जोखिम के बावजूद जापानी येन में कोई खास मजबूती नहीं दिखी। अमेरिकी डॉलर के अपने वार्षिक उच्च स्तर के करीब टिके रहने से इस मुद्रा जोड़ी को लगातार सहारा मिल रहा है।
सोने की कीमतें और यूरोपीय आर्थिक दुविधाएं
कमोडिटी बाजार में मंगलवार को यूरोपीय सत्र से पहले सोने की कीमतों में मामूली दैनिक गिरावट दर्ज की गई, हालांकि यह 4,100 डॉलर के स्तर से ऊपर टिकने में सफल रहा, जो मंगलवार को ही बना दो महीने का निचला स्तर था। मजबूत अमेरिकी डॉलर के कारण कीमती धातु की मांग पर दबाव बना हुआ है, जबकि अमेरिकी फेड द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी न होने की बढ़ती उम्मीदों ने सोने की गिरावट को सीमित करने में मदद की है।
वैश्विक मैक्रो परिदृश्य में आज किसी बड़े टीयर-1 आर्थिक आंकड़े की घोषणा नहीं है। निवेशकों का ध्यान यूरोपीय बाजारों के घटनाक्रम और मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक हालात पर टिका हुआ है। फ्रांस में आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि सोशलिस्ट और मरीन ले पेन की नेशनल रैली बजट के मुद्दे पर सरकार गिराने का संकेत देते हैं या नहीं। वहीं यूरोपीय सेंट्रल बैंक एक असामान्य दुविधा से जूझ रहा है। सामान्य परिस्थितियों में लक्ष्य से लगभग दोगुनी चल रही मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी एक सीधा कदम होता। लेकिन मौजूदा समय में बॉन्ड बाजार पहले से ही नीतिगत सख्ती का एक बड़ा हिस्सा खुद कर रहा है, जिससे ईसीबी के सामने नीतिगत फैसले लेना बेहद जटिल हो गया है।


















