अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की हालिया गिरावट पर फिलहाल ब्रेक लगता दिख रहा है। तकनीकी चार्ट पर बेहद ओवरसोल्ड स्तर पर पहुंचने के कारण ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को निचले स्तरों पर सहारा मिल रहा है, जिससे अमेरिकी डॉलर के सामने उसका नुकसान सीमित दायरे में सिमट गया है। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में मामूली सुस्ती देखी गई, जिसने पिछले सप्ताह के दो महीने के निचले स्तर से शुरू हुई दो दिन की रिकवरी को धीमा कर दिया है। इसके बावजूद बाजार विश्लेषकों का मानना है कि तकनीकी आधार पर बना गहरा दबाव मुद्रा को और ज्यादा नीचे फिसलने से रोक रहा है।
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के लिए तकनीकी स्तर और निकट अवधि का दायरा
दैनिक कारोबारी दृष्टिकोण के मुताबिक, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के 0.6930 और 0.6975 के बीच सीमित दायरे में रहने की संभावना जताई गई थी। वास्तविक कारोबार में मुद्रा 0.6933 से 0.6974 के थोड़े संकरे दायरे में रही और 0.30 प्रतिशत की बढ़त के साथ 0.6972 पर बंद हुई। ऊपर की ओर मामूली गति दिखाई जरूर दी है, लेकिन यह किसी लंबी या टिकाऊ तेजी की पुष्टि करने के लिए पर्याप्त नहीं मानी जा रही है। मौजूदा सत्र में इसके थोड़ा ऊपर जाने की संभावना तो है, परंतु इसका दायरा 0.6945 से 0.6985 के बीच ही सीमित रहने के आसार हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के 0.6985 के मजबूत स्तर को स्पष्ट रूप से पार करने की संभावना काफी कम है।
एक से तीन सप्ताह के मध्यम अवधि के नजरिए पर गौर करें, तो 02 अक्टूबर को स्पॉट स्तर 0.6930 पर दर्ज किया गया था। पिछले महीने के मध्य से शुरू हुई कमजोरी का दौर अब भी कायम है, लेकिन अत्यधिक ओवरसोल्ड परिस्थितियों को देखते हुए आगे होने वाली किसी भी गिरावट के 0.6866 के अगले बड़े सपोर्ट स्तर से पहले ही थम जाने की संभावना है। नीचे की ओर जाने वाली गति अब धीमी पड़ने लगी है। यदि मुद्रा 0.6985 के कड़े प्रतिरोध स्तर को पार करने में सफल रहती है, तो यह इस बात का स्पष्ट संकेत होगा कि 0.6866 का निचला स्तर अब पहुंच से बाहर हो चुका है।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और केंद्रीय बैंकों की नीतियां
अमेरिकी डॉलर को मजबूत बनाए रखने में निश्चित आय बाजार यानी फिक्स्ड इनकम मार्केट की बड़ी भूमिका रही है। बॉन्ड बाजार में लगातार जारी बिकवाली के कारण अमेरिकी बॉन्ड यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर के करीब बनी हुई है। इस मजबूत यील्ड और वैश्विक भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं ने मिलकर अमेरिकी डॉलर के रुख को सकारात्मक बनाए रखा है, भले ही अक्टूबर में यूएस फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाएं अब कमजोर पड़ चुकी हैं। दूसरी तरफ, ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को घरेलू मोर्चे से सहारा मिलने की उम्मीद है, क्योंकि रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया यानी RBA द्वारा इसी महीने ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी किए जाने के कयास लगाए जा रहे हैं, जो ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा के लिए मददगार साबित हो सकते हैं।
जापानी येन पर दबाव और USD/JPY का रुख
यूरोपीय कारोबारी सत्र की शुरुआत में मंगलवार को USD/JPY की जोड़ी दोबारा 158.00 के स्तर से ऊपर निकल गई। जापानी येन में यह कमजोरी तब भी देखने को मिल रही है जब बैंक ऑफ जापान यानी BoJ की ओर से सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीदें जताई जा रही हैं और बाजार में सरकारी हस्तक्षेप का जोखिम भी बना हुआ है। इसके बावजूद येन को कोई खास सहारा नहीं मिल सका। भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिका की ऊंची बॉन्ड यील्ड के सहारे अमेरिकी डॉलर अपने साल के उच्चतम स्तर के करीब टिका हुआ है, जिसने अक्टूबर में फेड की दर वृद्धि की कम होती उम्मीदों के असर को भी बेअसर कर दिया है। इसी वजह से USD/JPY जोड़ी को लगातार निचले स्तरों पर समर्थन मिल रहा है।
सोने में उछाल और कमोडिटी बाजार का हाल
कीमती धातुओं के बाजार में सोने ने अपने दो महीने के निचले स्तर यानी 4,100 डॉलर के दायरे से मजबूत वापसी की है। पहले यूरोपीय कारोबारी सत्र के दौरान सोना चढ़कर 4,150 डॉलर प्रति औंस के पार पहुंच गया। सितंबर महीने के निचले स्विंग स्तर से आई जोरदार तेजी के बाद अमेरिकी डॉलर की रफ्तार थोड़ी सुस्त पड़ी है, जिससे सोने को संभलने का मौका मिला। इसके अतिरिक्त, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा अक्टूबर में दरें बढ़ाने की घटती संभावनाओं ने भी बिना ब्याज देने वाली इस सुरक्षित धातु को लाभ पहुंचाया है, जिससे निवेशकों का रुझान एक बार फिर सोने की तरफ बढ़ा है।
यूरोपीय राजनीति और ईसीबी के सामने नई दुविधा
मैक्रोइकॉनॉमिक आंकड़ों के लिहाज से आज किसी बड़े टियर-1 डेटा की घोषणा नहीं होनी है। ऐसे में वित्तीय बाजारों का मुख्य ध्यान यूरोपीय बाजारों के घटनाक्रमों और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक हालातों पर टिका रहेगा। फ्रांस में राजनीतिक स्थिरता को लेकर आने वाले दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं, जहां यह देखा जाएगा कि क्या सोशलिस्ट और मरीन ले पेन की नेशनल रैली बजट विवाद को लेकर सरकार गिराने का कदम उठाते हैं या नहीं।
इधर यूरोपीय सेंट्रल बैंक यानी ECB के सामने एक जटिल मौद्रिक पहेली खड़ी हो गई है। सामान्य परिस्थितियों में जब महंगाई अपने तय लक्ष्य से लगभग दोगुनी रफ्तार से चल रही हो, तो केंद्रीय बैंक के पास ब्याज दरों को बढ़ाने का सीधा और स्पष्ट विकल्प होता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं। इस बार बॉन्ड बाजार पहले ही यील्ड बढ़ाकर मौद्रिक सख्ती का आधा काम खुद कर रहा है, जिससे ECB के नीति निर्माताओं के सामने दरें बढ़ाने या रोकने को लेकर एक बेहद कठिन असमंजस की स्थिति पैदा हो गई है।


















