वर्ष 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौर की एक अत्यंत दिलचस्प और ऐतिहासिक घटना नीम करोली बाबा के दिव्य आशीर्वाद और दूरदृष्टि से जुड़ी मानी जाती है। जिस समय पूर्वी पाकिस्तान में भयंकर युद्ध छिड़ा हुआ था और बांग्लादेशी नेता शेख मुजीबुर्रहमान पश्चिमी पाकिस्तान की जेल में मौत की सजा का सामना कर रहे थे, उस समय भारत की राजधानी दिल्ली में एक ऐसा संवाद हुआ जिसने भविष्य की तस्वीर पहले ही साफ कर दी थी। दिल्ली स्थित बिरला मंदिर में ठहरे संत नीम करोली बाबा ने उस कठिन दौर में न केवल बंदी नेता की सकुशल रिहाई का संकेत दिया था, बल्कि उनके स्वतंत्र राष्ट्र के सर्वोच्च पद पर आसीन होने की बात भी कही थी। इतिहास के पन्नों में दर्ज यह घटना संत परंपरा की आध्यात्मिक सामर्थ्य और समकालीन राजनीति के एक दुर्लभ संगम को रेखांकित करती है।
बिरला मंदिर में अज्ञात बांग्लादेशी नागरिकों का आगमन
यह पूरा किस्सा उस समय का है जब 1971 के दौरान भारत में बांग्लादेश के स्वतंत्रता सेनानियों और नागरिकों की आवाजाही बढ़ी हुई थी। नीम करोली बाबा उस दौरान दिल्ली के प्रसिद्ध बिरला मंदिर परिसर में ठहरे हुए थे। बाबा के दर्शन के लिए प्रतिदिन भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती थी। इसी भीड़ में कुछ बांग्लादेशी नागरिक भी संत का आशीर्वाद लेने पहुंचे थे। मंदिर परिसर में उपस्थित लोगों के अनुसार, बाबा ने अचानक भीड़ की तरफ देखते हुए एक विशेष संदेश भिजवाया। उन्होंने कहा कि वहां मौजूद लोगों में से वह व्यक्ति तुरंत उनके पास आए जिसका भाई इस समय जेल की सलाखों के पीछे बंद है।
मियांवाली जेल का जिक्र और बाबा की सांत्वना
बाबा का संदेश सुनते ही एक व्यक्ति भीड़ से निकलकर उनके समीप पहुंचा और अत्यंत व्यथित होकर अपने भाई की विकट परिस्थिति के बारे में बताने लगा। उसने बाबा को जानकारी दी कि उसका भाई पश्चिमी पाकिस्तान की मियांवाली जेल में कैद है और वहां की सैन्य अदालत द्वारा उसे मौत की सजा सुनाई जा चुकी है। परिवार और समर्थकों के सामने अपने प्रिय नेता और भाई की जान बचाने का कोई मार्ग नजर नहीं आ रहा था। व्यक्ति की पूरी बात सुनने के बाद बाबा ने उसे ढांढस बंधाया और एक ऐतिहासिक वक्तव्य दिया। बाबा ने कहा कि चिंता करने की कोई आवश्यकता नहीं है, उनका भाई बहुत जल्द शत्रुओं की कैद से सुरक्षित बाहर निकल आएगा।
शहंशाह बनने का आशीर्वाद और पहचान का खुलासा
नीम करोली बाबा ने केवल रिहाई का आश्वासन ही नहीं दिया, बल्कि आगे बढ़कर एक ऐसी भविष्यवाणी की जिसने सबको अचंभित कर दिया। उन्होंने कहा कि जेल में बंद वह व्यक्ति आगे चलकर अपने देश का सबसे बड़ा शहंशाह यानी सर्वोच्च शासक बनेगा। इसके साथ ही बाबा ने उस व्यक्ति से कहा कि वह तुरंत वापस लौटकर अपने भाई के भव्य स्वागत की तैयारियां शुरू करे। बाद में इस बात की पुष्टि हुई कि बाबा से बातचीत करने वाला वह व्यक्ति कोई सामान्य नागरिक नहीं बल्कि स्वयं शेख मुजीबुर्रहमान का छोटा भाई था। उस समय जब चारों तरफ अनिश्चितता का माहौल था, बाबा के इन शब्दों ने समर्थकों के भीतर एक नई उम्मीद जगा दी थी।
ऐतिहासिक दस्तावेज और रिहाई का घटनाक्रम
इतिहास के प्रामाणिक दस्तावेज इस बात की तस्दीक करते हैं कि शेख मुजीबुर्रहमान को 25 मार्च 1971 को पाकिस्तानी सैन्य कार्रवाई के तुरंत बाद गिरफ्तार किया गया था। उन्हें पूर्वी पाकिस्तान से ले जाकर पश्चिमी पाकिस्तान की मियांवाली जेल में रखा गया था, जहां उन पर गंभीर मुकदमे चलाए जा रहे थे। हालांकि, दिसंबर 1971 में भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी के संयुक्त प्रयासों से पाकिस्तान की करारी हार हुई और बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में अस्तित्व में आया। युद्ध की समाप्ति और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद 8 जनवरी 1972 को मुजीबुर्रहमान को पाकिस्तान की कैद से रिहा कर दिया गया।
ढाका वापसी और नए राष्ट्र का नेतृत्व
रिहाई के पश्चात शेख मुजीbुर्रहमान पहले ब्रिटेन की राजधानी लंदन पहुंचे, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को संबोधित किया। इसके बाद 10 जनवरी 1972 को वे स्वतंत्र बांग्लादेश की राजधानी ढाका पहुंचे। ढाका की धरती पर कदम रखते ही लाखों लोगों ने अपने प्रिय नेता का अभूतपूर्व और भव्य स्वागत किया। उल्लेखनीय है कि 1971 में ही उन्हें बांग्लादेश की अस्थायी सरकार का राष्ट्रपति घोषित किया गया था, और ढाका लौटने के बाद उन्होंने नए देश की बागडोर संभाली। नीम करोली बाबा द्वारा बिरला मंदिर में कही गई एक-एक बात समय के साथ पूरी तरह सच साबित हुई, जिसे आज भी इतिहास और आस्था के अनोखे संगम के रूप में याद किया जाता है।



















