सोशल मीडिया पर एक वीडियो को लेकर नौकरीपेशा लोगों के बीच खासी चर्चा छिड़ गई है, जिसमें एक युवक तेज बारिश के बीच रेनकोट पहनकर पैदल अपने दफ्तर की तरफ बढ़ता नजर आ रहा है. सड़कों पर पानी भरा होने के बावजूद वह हिम्मत नहीं हारता और किसी तरह ऑफिस की दिशा में आगे बढ़ता रहता है.
वीडियो में आखिर दिखा क्या
वीडियो जोशुआ जैकब स्मिथ नाम के एक शख्स ने शेयर किया है, जिसमें वह कंधे पर बैग टांगे भारी बारिश में भीगती सड़कों से गुजरते दिखते हैं. रास्ता इतना पानी से भरा है कि पैदल चलना भी मुश्किल जान पड़ता है, फिर भी वह अपने दफ्तर पहुंचने की कोशिश में जुटे रहते हैं. वीडियो की शुरुआत में ही वह एक तीखा सवाल पूछते हैं, जब आज की टेक्नोलॉजी इतनी तरक्की कर चुकी है कि लैपटॉप, इंटरनेट और वीडियो कॉल की मदद से घर बैठे काम निपटाया जा सकता है, तो फिर खराब मौसम में भी दफ्तर आने की जिद क्यों की जाती है. वीडियो के कैप्शन में उन्होंने लिखा कि आज भी कुछ कंपनियां पाषाण युग जैसी पुरानी सोच से बाहर नहीं निकल पाई हैं, जहां काम पूरा होने से ज्यादा तवज्जो इस बात को दी जाती है कि कर्मचारी शारीरिक रूप से दफ्तर में मौजूद है या नहीं.
सिर्फ बारिश नहीं, लंबे काम के घंटे भी असली मुद्दा
जोशुआ ने अपने वीडियो में भारतीय दफ्तरों की कार्यसंस्कृति पर भी नाराजगी जाहिर की. उनका कहना है कि बारिश जैसे हालात में घर से काम करने की सुविधा कर्मचारियों के लिए एक बड़ी राहत साबित हो सकती है, लेकिन ज्यादातर जगहों पर इसे सहज तरीके से स्वीकार नहीं किया जाता. यह मामला सिर्फ बरसात के दिनों तक सीमित नहीं है. काम के लंबे घंटे, जरूरत से ज्यादा काम का बोझ और रोज ऑफिस आने-जाने में जाया होने वाला अतिरिक्त समय भी कर्मचारियों की मुश्किलों में शामिल है. यही वजह है कि यह सवाल बार-बार उठता है कि जब काम डिजिटल तरीके से घर से ही निपटाया जा सकता है, तो हर हाल में दफ्तर पहुंचना कितना जरूरी रह जाता है.
यूजर्स की मिली-जुली प्रतिक्रियाएं
वीडियो वायरल होने के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी-अपनी राय रखनी शुरू कर दी. एक यूजर ने लिखा कि दफ्तर में कर्मचारी की पोजीशन के हिसाब से हालात बदल जाते हैं, यानी हर किसी के लिए एक जैसा नियम लागू नहीं हो सकता. वहीं एक अन्य यूजर ने बीमारी की स्थिति का उदाहरण देते हुए कहा कि ऐसे मौकों पर घर से काम करने की जरूरत को आमतौर पर समझा जाता है. एक और यूजर ने तो सीधे तंज कसते हुए लिख दिया कि कुछ एम्प्लॉयर आज भी मानसिक रूप से पाषाण युग में ही जी रहे हैं.
वर्क कल्चर पर पुरानी बहस फिर छिड़ी
गौर करने वाली बात यह है कि यह वीडियो और इसमें कही गई बातें जोशुआ के अपने निजी अनुभव और राय को दर्शाती हैं, इसलिए इसे भारत के हर दफ्तर या हर कंपनी की तस्वीर नहीं माना जा सकता. इसके बावजूद इस वीडियो ने एक पुरानी और अनसुलझी बहस को फिर से हवा दे दी है कि क्या दफ्तर जाना वाकई काम पूरा करने के लिए जरूरी है, या यह सिर्फ बरसों पुरानी कार्यसंस्कृति की एक आदत भर बनकर रह गया है. ऐसे वीडियो कर्मचारियों को अपनी बात खुलकर रखने और कंपनियों को अपनी नीतियों पर दोबारा सोचने का मौका जरूर देते हैं.



















