दीपावली के उल्लास भरे वातावरण के तुरंत बाद मनाया जाने वाला गोवर्धन पर्व भारतीय जनमानस में विशेष स्थान रखता है। इस अवसर पर घरों के द्वारों और आंगनों में गोवंश के गोबर की सहायता से एक विशालकाय टीले अथवा पहाड़ी का स्वरूप तैयार किया जाता है। विभिन्न पुष्पों, हरि पत्तियों, रोली, अक्षत और दीपों से अलंकृत यह संरचना भगवान श्रीकृष्ण की उस ऐतिहासिक लीला का स्मरण कराती है, जिसने जनसाधारण को प्रकृति के संरक्षण की सीख दी थी। इस प्राचीन रीति-रिवाज के मूल में आध्यात्मिक विश्वास के साथ-साथ हमारी कृषि संस्कृति का गहरा मर्म भी छिपा हुआ है।
गोवर्धन लीला और देवराज के दर्प का दलन
पौराणिक गाथाओं के अनुसार, द्वापर युग के दौरान ब्रजभूमि के निवासी प्रतिवर्ष वर्षा के अधिपति देवराज इंद्र को प्रसन्न करने के लिए विशाल यज्ञों का आयोजन करते थे। बालकृष्ण ने तत्कालीन समाज को इस पारंपरिक दृष्टिकोण से परे जाकर वास्तविक संबल को पहचानने की प्रेरणा दी। उन्होंने ब्रजवासियों को समझाया कि उनका दैनिक भरण-पोषण, पशुओं का चारा और संपूर्ण जीवन प्रणाली उन जंगलों, वनस्पतियों, गोचर भूमियों तथा गोवर्धन की पहाड़ियों से चलती है। इसलिए यदि श्रद्धा प्रकट करनी है, तो उन प्रत्यक्ष प्राकृतिक संसाधनों का वंदन किया जाना चाहिए जो समस्त प्राणियों का पोषण करते हैं।
जब ब्रज के लोगों ने अपने आराध्य के सुझाव पर इंद्र के स्थान पर गिरधारी और पर्वत की अर्चना शुरू की, तो क्रोधित होकर देवराज ने समूचे क्षेत्र में प्रलयंकारी मूसलाधार जलवर्षा आरंभ कर दी। निरंतर गिरने वाले जलकणों से जब संपूर्ण जनजीवन और मूक मवेशी संकट में घिर गए, तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपने वामहस्त की कनिष्ठिका उंगली पर विशाल पर्वतमाला को एक छत्र की भांति धारण कर लिया। मान्यता है कि उन्होंने लगातार सात दिनों तक उस भारी पर्वत को साधे रखा और समस्त ब्रजवासियों को उसके नीचे सुरक्षित पनाह दी। उत्तर प्रदेश का पर्यटन विभाग भी अपने सांस्कृतिक प्रलेखों में इस लोक अनुष्ठान को श्रीकृष्ण के इसी साहसिक संरक्षण कार्य से जोड़ता है।
गोबर के उपयोग का वैज्ञानिक और सांस्कृतिक धरातल
पहाड़ की इस प्रतिकृति को निर्मित करने के लिए गाय के गोबर का चयन अनायास नहीं हुआ था। पुरातन काल से भारतीय ग्रामीण परिवेश का समूचा चक्र गोवंश के ईद-गिर्द घूमता रहा है। गाय न केवल दुग्ध और पोषण की जननी थी, बल्कि उसका गोबर जैविक खाद के रूप में खेतों की उर्वरा शक्ति बनाए रखने, घरों की दीवारों और आंगनों को रोगाणुरहित रखने तथा ईंधन की पूर्ति में सबसे बड़ा माध्यम बनता था। पंडित संतोष शुक्ला के अनुसार, गाय, खेती और प्रकृति के अटूट संबंधों को सम्मान देने के उद्देश्य से ही इस सामग्री को पूजन विधान में केंद्रीय स्थान मिला।
सनातन परंपरा में गोमय को अत्यंत शुद्ध और दोष निवारक तत्व स्वीकार किया गया है। हर मांगलिक कार्य में इसका स्पर्श पवित्रता का संचारक माना जाता है। जब लोग अपने घर की चौखट पर गोबर से पहाड़ी की आकृति उभारते हैं, तो वे वास्तव में उस दैवीय संरक्षण को अपने परिवेश में सांकेतिक रूप से स्थापित करते हैं। यह क्रिया इंसान और निरीह जीवों के बीच परस्पर निर्भरता का प्रत्यक्ष प्रमाण बनकर उभरती है।
आकृतियों का विस्तार और पूजन की विविधता
घरों में केवल पर्वत की आकृति बनाकर ही पूजा समाप्त नहीं होती, बल्कि ग्रामीण जीवन के समूचे दृश्यों को गोबर के माध्यम से उकेरा जाता है। कई अंचलों में श्रद्धालु पर्वत के पास ही नन्हीं गायों, बछड़ों, ग्वालों और वृक्षों की अनुकृतियां भी निर्मित करते हैं। इसके उपरांत इन आकृतियों को प्राकृतिक रंगों, सिंदूर, धूप और दीपकों से सुसज्जित किया जाता है।
संध्याकाल अथवा प्रातःकाल में परिवार के सदस्य एकत्रित होकर इस निर्मित पर्वत के सम्मुख नतमस्तक होते हैं और श्रीकृष्ण का गुणगान करते हैं। अनेक क्षेत्रों में प्रतीकात्मक गोवर्धन की सात परिक्रमाएं लगाने की भी सुदृढ़ परंपरा है। यद्यपि भिन्न-भिन्न प्रान्तों और कुलों में इस अर्चना की बाह्य विधियों में सूक्ष्म अंतर देखा जा सकता है, किंतु सभी का आंतरिक भाव अपने संरक्षक के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना ही होता है।
आधुनिक जीवनशैली में इस लोकपर्व की प्रासंगिकता
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह पर्व किसी रूढ़िवादी अनुष्ठान से कहीं बढ़कर पारिस्थितिकी संतुलन का संदेश देता है। यह दिवस हमें स्मरण कराता है कि पहाड़ियां, सघन वन, नदियां और पशु संपदा हमारे अस्तित्व की अनिवार्यताएं हैं। भौतिक विकास की दौड़ में जब प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण हो रहा है, तब गोबर से पहाड़ बनाने की यह साधारण-सी दिखने वाली क्रिया हमें अपनी जड़ों, भूमि की उर्वरता और मूक प्राणियों की रक्षा के संकल्प से जोड़ती है।



















