अगरतला का प्रतिष्ठित दुर्गाबाड़ी मंदिर इन दिनों अपनी प्राचीन परंपराओं और कानूनी पेचीदगियों के बीच सुर्खियों में है। मंदिर परिसर में महा नवमी के पावन अवसर पर पारंपरिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए एक भैंसे और कई बकरों की बलि दी गई। मंदिर से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि यह धार्मिक अनुष्ठान पिछले 149 वर्षों से लगातार चला आ रहा है और वे इस ऐतिहासिक विरासत को पूरी श्रद्धा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।
गोपनीयता और अदालती पाबंदियां
मंगलवार को संपन्न हुए इन धार्मिक अनुष्ठानों को पूरी तरह गुप्त रखा गया। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई पाबंदियों का सख्ती से पालन करते हुए, बलि स्थल को आम जनता की नजरों से पूरी तरह पर्दे या स्क्रीन से ढक दिया गया था। मंत्रोच्चार के बीच हुए इन गुप्त संस्कारों के दौरान आम लोगों के प्रवेश पर पूरी पाबंदी रही ताकि कानूनी निर्देशों का उल्लंघन न हो।
पुजारी और प्रबंधन का पक्ष
मंदिर के मुख्य पुजारी जयंत भट्टाचार्य ने इस प्रथा को पूजा का अहम हिस्सा बताते हुए कहा कि इसके बिना अनुष्ठान अधूरा रहता है। वहीं मंदिर के प्रभारी प्रदीप देबनाथ ने स्पष्ट किया कि देवी को चढ़ने वाले प्रसाद में शाकाहारी या मांसाहारी होने का कोई बंधन नहीं है। श्रद्धालु जो भी सामग्री या भेंट अर्पित करते हैं, उसे माता को समर्पित किया जाता है और मंदिर परिसर में मांस-मछली के भोग पर कोई रोक नहीं है।
कानूनी विवाद और पुराना इतिहास
इस बलि प्रथा का कानूनी संघर्ष काफी पुराना रहा है। साल 2019 में त्रिपुरा उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने राज्यभर के मंदिरों में पशु-पक्षियों की बलि पर पूरी तरह रोक लगा दी थी, जिसमें प्रसिद्ध माता त्रिपुरा सुंदरी मंदिर भी शामिल था। हालांकि बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए इस रोक पर रोक लगा दी और कुछ कड़ी शर्तें तय कर दीं।
शाही परंपरा और आगामी कार्यक्रम
इस मंदिर में होने वाली दुर्गा पूजा का आयोजन पश्चिम त्रिपुरा जिला प्रशासन द्वारा मानिक्य राजवंश की तरफ से किया जाता है। अब सभी की निगाहें विजया दशमी के कार्यक्रमों पर टिकी हुई हैं। पुजारी के अनुसार, सुबह के वक्त पुलिस बल मंदिर परिसर में देवी को गार्ड ऑफ ओनर देगा। इसके बाद पवित्र कलश को भव्य रूप से उज्ज्वयंत पैलेस ले जाया जाएगा, जहां शाही परिवार के सदस्य मां दुर्गा को अंतिम विदाई देंगे।


















