टिपरा मोथा पार्टी के संस्थापक प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा ने ऐलान किया है कि वे अगले महीने के बाद सक्रिय राजनीति से पूरी तरह अलग हो जाएंगे। अपने इस बड़े फैसले के पीछे उन्होंने स्वास्थ्य कारणों का हवाला दिया है, हालांकि उन्होंने यह संकल्प भी दोहराया कि वे टिपरासा समुदाय के अधिकारों की रक्षा के लिए एक सजग प्रहरी बनकर हमेशा आवाज उठाते रहेंगे।
अपने विचार साझा करते हुए देबबर्मा ने कहा कि भले ही उनका सक्रिय राजनीतिक सफर अगले महीने समाप्त हो रहा हो, लेकिन जब भी टिपरासा समाज के साथ किसी तरह का अन्याय होगा, वे चुप नहीं बैठेंगे। उन्होंने अपने पिता महाराजा किरीट बिक्रम माणिक्य बहादुर की एक पुरानी सीख को याद करते हुए स्पष्ट किया कि इंसान को शिखर पर रहते हुए ही विदा लेनी चाहिए, न कि ढलान के वक्त। उन्होंने यह भी बताया कि राजनीति में आने का उनका कोई प्रारंभिक इरादा नहीं था, लेकिन अपने लोगों के हक की लड़ाई लड़ने के लिए उन्हें इस मैदान में उतरना पड़ा।
कार्यकर्ताओं से अंतिम राजनीतिक रैली का आह्वान
प्रद्योत किशोर माणिक्य देबबर्मा ने अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से अगले महीने एक विशाल जनसभा आयोजित करने को कहा है। इस भव्य कार्यक्रम में सभी ग्राम समितियों के नवनिर्वाचित अध्यक्षों को आमंत्रित करने का निर्देश दिया गया है, ताकि वे किसी राजनीतिक मंच से आखिरी बार कार्यकर्ताओं और नेताओं को सीधे संबोधित कर सकें।
राजनीतिक संन्यास के ऐलान के साथ ही उन्होंने केंद्र सरकार से मांग की कि वह त्रिपुरा के मूल निवासियों से किए गए अपने वादों का सम्मान करे और टिपरासा समझौते को तुरंत जमीन पर उतारे। मार्च 2024 में टिपरा मोथा पार्टी ने केंद्र और राज्य सरकार के साथ मिलकर इस ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए थे, जिसका मुख्य उद्देश्य राज्य के जनजातीय समुदायों का समग्र विकास सुनिश्चित करना है।
टिपरासा समझौते को लागू करने की समयसीमा
देबबर्मा ने याद दिलाया कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली में आयोजित एक बैठक के दौरान आश्वासन दिया था कि दुर्गा पूजा के बाद इस समझौते के क्रियान्वयन की प्रक्रिया शुरू कर दी जाएगी। उस महत्वपूर्ण बैठक में मुख्यमंत्री माणिक साहा भी उपस्थित थे। देबबर्मा ने उम्मीद जताई कि केंद्र सरकार जनजातीय क्षेत्रों के नागरिकों से किए गए इस वादे को हर हाल में पूरा करेगी।
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर किए गए वादों का सम्मान नहीं किया गया, तो वे 2028 के विधानसभा चुनावों में जनता के सामने किस मुंह से जाएंगे। उन्होंने कहा कि लोगों ने अपनी वास्तविक समस्याओं के समाधान और समझौते के लागू होने का बहुत धैर्यपूर्वक इंतजार किया है, इसलिए अब इस पर ठोस कार्रवाई शुरू करने का सही समय आ चुका है।
ग्राम समिति चुनावों के नतीजों का ब्योरा
यह महत्वपूर्ण राजनीतिक घोषणा त्रिपुरा जनजातीय क्षेत्र स्वायत्त जिला परिषद के तहत आने वाली 587 ग्राम समितियों के चुनावी परिणाम सामने आने के तुरंत बाद की गई है। इस चुनाव में कुल 4,594 सीटों में से राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने 4,320 सीटें हासिल कीं। टिपरा मोथा पार्टी ने अकेले 4,328 सीटें जीतीं, जबकि भारतीय जनता पार्टी को 859 सीटें मिलीं और उसकी सहयोगी इंडिजिनस पीपल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा ने 33 सीटों पर जीत दर्ज की।
मतदाताओं का आभार व्यक्त करते हुए देबबर्मा ने कहा कि पिछले 10 वर्षों से निर्वाचित निकायों के अभाव के कारण गांव के लोग अपने अधिकारों से वंचित थे, लेकिन अब वे अपने गांवों में वास्तविक सत्ता का उपयोग कर सकेंगे। उन्होंने याद दिलाया कि इन चुनावों को कराने के लिए उन्होंने पहले त्रिपुरा उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था और बाद में वे सर्वोच्च न्यायालय तक गए थे। उन्होंने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के बेहद आभारी हैं, जिसके निर्देश के बाद राज्य चुनाव आयोग ने एक दशक बाद यह चुनाव संपन्न कराया।
सद्भाव बनाए रखने और अधिकारों की मांग
शानदार जीत के बावजूद देबबर्मा ने पार्टी कार्यकर्ताओं से किसी भी तरह का जश्न न मनाने की अपील की। उनका कहना था कि जब तक संवैधानिक अधिकार पूरी तरह हासिल नहीं हो जाते, तब तक जश्न मनाने का कोई औचित्य नहीं है। इसके साथ ही उन्होंने राज्य के भीतर सामाजिक और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने स्पष्ट किया कि वे राज्य में रहने वाले किसी भी समुदाय के विरोध में नहीं हैं। उनका एकमात्र उद्देश्य यह है कि जनजातीय परिषद क्षेत्रों में मूल निवासियों के जमीन संबंधी और अन्य कानूनी अधिकारों की पूरी सुरक्षा हो, ठीक उसी तरह जैसे पूर्वोत्तर के अन्य छठी अनुसूची वाले इलाकों में सुनिश्चित की गई है। वर्तमान में टिपरा मोथा पार्टी द्वारा शासित यह स्वायत्त परिषद त्रिपुरा के लगभग दो-तिहाई भौगोलिक क्षेत्र में फैली हुई है।



















