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बलिया के जिस गांव ने निर्भया को जन्म दिया, वहां सड़क नहीं सिर्फ गड्ढे और बकरियों के हवाले अस्पतालउत्तर प्रदेश
24 जून 2026, 9:12 am (46 दिन पहले)· 3

बलिया के जिस गांव ने निर्भया को जन्म दिया, वहां सड़क नहीं सिर्फ गड्ढे और बकरियों के हवाले अस्पताल

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का मेड़वरा कलां गांव, जो निर्भया का पैतृक गांव है, आज पक्की सड़क, स्कूल और इलाज के लिए तरस रहा है। ग्रामीणों ने अब सड़क नहीं तो वोट नहीं का नारा देकर चुनाव बहिष्कार का ऐलान कर दिया है।

उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का एक गांव कभी पूरे देश की जुबान पर था। यह वही मेड़वरा कलां है, जो सन 2012 के निर्भया कांड के बाद सुर्खियों में आया, जिसने पूरे मुल्क को हिलाकर रख दिया था। उस वक्त इंसाफ की मांग को लेकर लोग सड़कों पर उतरे और बेटियों की सुरक्षा को लेकर एक नई बहस छिड़ी। लेकिन 14 साल बीत जाने के बाद आज यही गांव उपेक्षा और बदहाली की मिसाल बन चुका है। जिस गांव के विकास के लिए बड़े-बड़े वादे हुए, वहां सड़कें गड्ढों में बदल चुकी हैं और निर्भया के नाम पर खुला अस्पताल बकरियों का ठिकाना बन गया है। यहां की बेटियां पांच साल से लगातार आवाज उठा रही हैं, मगर जिम्मेदार अफसर और नेता गहरी नींद में हैं।

गांव तक पहुंचने के लिए एक भी पक्की सड़क नहीं

गांव के रहने वाले सुभाष पांडेय बताते हैं कि निर्भया की हत्या के बाद सरकार ने इस गांव को बहुत कुछ दिया था, लेकिन आज वह सब अनदेखी का शिकार है। निर्भया के नाम पर बना अस्पताल अब बकरियां चला रही हैं। कभी-कभार फार्मासिस्ट आ जाते हैं, डॉक्टर का तो कोई अता-पता ही नहीं रहता। यहां बमुश्किल खांसी और बुखार की दवा मिल पाती है। पट्टी, मरहम या पानी चढ़ाने तक की कोई व्यवस्था नहीं है। सोनू पासवान कहते हैं कि गांव सालों से सड़क के लिए तरस रहा है, यहां आने-जाने के लिए एक भी पक्की सड़क मौजूद नहीं है।

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रास्ते में हो जाती है डिलीवरी, इलाज के बिना गई जानें

मोहन मुरारी राय का कहना है कि किसी गर्भवती महिला को प्रसव कराना हो तो कई बार रास्ते में ही डिलीवरी हो जाती है। सड़क न होने की वजह से उनके सामने ही तीन मरीजों की मौत हो चुकी है। प्रेम नारायण ने सड़क बनवाने की मांग रखी है। गांव के युवा शिव जी पांडेय मायूसी के साथ कहते हैं कि अब तो बिना शादी किए ही मरना पड़ेगा, क्योंकि बरसात शुरू होने वाली है और इस गांव में कोई तिलक लेकर यानी रिश्ता लेकर आने को तैयार नहीं है। उन्हें लगता है कि अब उनकी शादी ही नहीं होगी।

बरसात में चार महीने ठप हो जाती है पढ़ाई

छात्रा पूनम कुमारी बताती हैं कि बरसात के मौसम में करीब चार महीने तक पढ़ाई पूरी तरह बंद हो जाती है। सड़क इतनी खराब है कि साइकिल से जाते वक्त आधे रास्ते में गिरना तय है। अमृता कुमारी कहती हैं कि सड़क की हालत ने पढ़ाई पूरी तरह चौपट कर दी है। दिव्यानी पांडेय के मुताबिक पढ़ाई पर गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। निक्की पटेल कहती हैं कि बरसात में पढ़ाई करना किसी चुनौती से कम नहीं रहता, स्कूल जाते समय साइकिल से गिरना, ड्रेस का गंदा होना और साइकिल का बिगड़ना रोज की मुसीबत बन गई है।

पांचवीं के बाद गांव में कोई स्कूल ही नहीं

गोल्डी पटेल और आंचल शर्मा बताती हैं कि यहां के बुजुर्ग ऑटो पर जान हथेली पर रखकर सफर करते हैं, क्योंकि सड़क में इतने गड्ढे हैं कि इससे तो गांव का खेत भी बेहतर है। सबसे ज्यादा परेशानी छोटे बच्चों को उठानी पड़ती है, उनकी बुनियादी पढ़ाई ही चौपट हो रही है। दिव्या पांडेय का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य दोनों की असली जड़ सड़क ही है। इस गांव में पांचवीं के बाद कोई स्कूल नहीं है। गांव से तीन रास्ते जुड़ते हैं और तीनों कच्चे हैं, जो बरसात के मौसम में बंद हो जाते हैं। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां के लोग किस हाल में जीते होंगे।

सड़क नहीं तो वोट नहीं, गांव का चुनाव बहिष्कार का फैसला

दूध बेचने वाले चंद्रबली यादव बताते हैं कि रास्ता इतना खराब है कि उनकी गाड़ी पूरी तरह टूट चुकी है और खुद उनके हाथ-पैर भी कई बार टूट चुके हैं। बुजुर्ग बसंत कुमार पांडेय तंज कसते हुए कहते हैं कि उनके पैर के साथ नेता भी लंगड़े हो चुके हैं। पूरे गांव ने ठान लिया है कि इस बार चुनाव का बहिष्कार किया जाएगा और कोई वोट नहीं डालेगा। सड़क नहीं तो वोट नहीं, यही अब गांव की आवाज बन चुकी है। अब देखना दिलचस्प होगा कि निर्भया के इस चर्चित गांव की तस्वीर बदलती है या हालात जस के तस बने रहते हैं।

सवाल-जवाब

मेड़वरा कलां गांव क्यों चर्चा में रहा है?
यह उत्तर प्रदेश के बलिया जिले का गांव है, जो 2012 के निर्भया कांड के बाद निर्भया के पैतृक गांव के तौर पर सुर्खियों में आया था।
निर्भया के नाम पर बने अस्पताल की क्या हालत है?
अस्पताल अब बकरियों का ठिकाना बन गया है। यहां कभी-कभार फार्मासिस्ट आते हैं, डॉक्टर नहीं रहता और सिर्फ खांसी-बुखार की दवा मिल पाती है।
गांव में सड़क की क्या समस्या है?
गांव तक पहुंचने के लिए कोई पक्की सड़क नहीं है। तीनों कच्चे रास्ते बरसात में बंद हो जाते हैं और गड्ढों से भरे हैं।
सड़क न होने से लोगों को क्या नुकसान हुआ है?
मोहन मुरारी राय के मुताबिक उनके सामने ही तीन मरीजों की मौत हो चुकी है और कई बार महिलाओं की डिलीवरी रास्ते में ही हो जाती है।
बच्चों की पढ़ाई पर क्या असर पड़ रहा है?
बरसात में करीब चार महीने पढ़ाई ठप हो जाती है और पांचवीं के बाद गांव में कोई स्कूल ही नहीं है।
गांव वालों ने क्या फैसला लिया है?
पूरे गांव ने इस बार चुनाव बहिष्कार का फैसला लिया है और सड़क नहीं तो वोट नहीं का नारा दिया है।
निर्भया कांड कब हुआ था?
यह घटना सन 2012 में हुई थी, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था।
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