उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में कभी किनारे लगाई गईं पूर्व सांसद प्रियंका सिंह रावत के सियासी सफर ने एक बार फिर नई करवट ली है। राजधानी लखनऊ में 6 अक्टूबर 2026 को भारतीय जनता पार्टी के जिन आठ उम्मीदवारों ने उच्च सदन के लिए अपने पर्चे दाखिल किए, उनमें बाराबंकी की यह पूर्व सांसद प्रमुख चेहरे के रूप में उभरीं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी में हुए इस नामांकन के दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री के चरण स्पर्श कर शुभाशीष प्राप्त किया। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब वर्ष 2027 के राज्य विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक दल अपने सामाजिक समीकरणों को नए सिरे से साधने में जुटे हैं।
युवा उम्र में मिली ऐतिहासिक चुनावी सफलता
संसदीय राजनीति के इतिहास में प्रियंका सिंह रावत का उभार बेहद नाटकीय और धमाकेदार रहा था। वर्ष 2014 के आम चुनाव में जब पूरे देश में नरेंद्र मोदी के नाम की आंधी चल रही थी, तब भाजपा ने महज 28 वर्ष की इस युवा नेत्री पर भरोसा जताते हुए बाराबंकी की सुरक्षित लोकसभा सीट से चुनाव मैदान में उतारा। इस मुकाबले में उनके सामने कांग्रेस पार्टी के अत्यंत अनुभवी कद्दावर नेता और तत्कालीन सांसद पी एल पुनिया खड़े थे। चुनावी नतीजों ने राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया था, क्योंकि प्रियंका ने पुनिया को 2,11,878 मतों के विशाल अंतर से शिकस्त दी थी। उस ऐतिहासिक मुकाबले में भाजपा प्रत्याशी को 4,54,214 वोट मिले थे, जबकि कांग्रेस के दिग्गज नेता 2,42,336 मतों पर ही सिमट कर रह गए थे। इतनी कम उम्र में देश की सबसे बड़ी पंचायत में पहुंचना उनके करियर का सबसे चमकीला दौर साबित हुआ।
लगातार दो बार लगा झटका और संगठन के प्रति निष्ठा
संसद में पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद राजनीतिक रास्ते अचानक पथरीले हो गए। वर्ष 2019 के आम चुनाव से ठीक पहले भाजपा ने एक अप्रत्याशित निर्णय लेते हुए बाराबंकी से वर्तमान सांसद प्रियंका का टिकट काट दिया। उनके स्थान पर उपेंद्र सिंह रावत को चुनावी समर में उतारा गया। उपेंद्र सिंह रावत ने उस चुनाव में 5,35,917 मत पाकर सीट पर पार्टी का परचम लहराए रखा। सांसद रहते हुए चुनावी दौड़ से बाहर कर दिए जाने के फैसले से प्रियंका अत्यंत दुखी हुईं और उस समय उनकी आंखों से आंसू भी छलके। हालांकि उन्होंने किसी बगावत का रास्ता चुनने के बजाय दल के अनुशासन और शीर्ष नेतृत्व के निर्णय को शिरोधार्य किया।
इसके बाद वर्ष 2024 के आम चुनाव में भी उन्हें बाराबंकी से दोबारा टिकट की उम्मीद थी, किंतु पार्टी ने पुनः उन्हें चुनावी मैदान से दूर रखा। लगातार दो बार संसद पहुंचने का मौका छिन जाने के बावजूद उन्होंने भगवा खेमे का साथ नहीं छोड़ा। दल ने उनके धैर्य को परखते हुए उन्हें संगठन के भीतर महत्वपूर्ण काम सौंपे। पहले उन्हें उत्तर प्रदेश भाजपा में प्रदेश मंत्री की जिम्मेदारी दी गई और बाद में पदोन्नत करके प्रदेश उपाध्यक्ष का महत्वपूर्ण दायित्व सौंपा गया।
प्रशासनिक तल्खी और विवादों का साया
अपने पहले संसदीय कार्यकाल के दौरान प्रियंका सिंह रावत अपने आक्रामक और बेबाक तेवरों के कारण अक्सर सुर्खियों में रहीं। प्रशासनिक मशीनरी के साथ उनके टकराव की खबरें लगातार सामने आती रहीं। एक बहुचर्चित प्रकरण में उनकी जुबान से निकले तीखे बोल इतने विवादित हुए कि उन्होंने एक आईपीएस अधिकारी को गंभीर चेतावनी तक दे डाली थी। इसके अलावा एक अन्य मौके पर वह कलेक्ट्रेट परिसर में तत्कालीन जिलाधिकारी के कक्ष के बाहर धरने पर जा बैठी थीं।
इतना ही नहीं, उन्होंने अपने पिता उत्तम राम सिंह को औपचारिक रूप से अपना जनसंपर्क अधिकारी नियुक्त कर दिया था, जिस पर दिल्ली में प्रधानमंत्री तक चर्चा पहुंच गई थी। बाद में शीर्ष नेतृत्व द्वारा मामले का संज्ञान लिए जाने पर उनके पिता को उस पद से हटाया गया था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना रहा है कि इन्हीं प्रशासनिक तनातनी और विवादों की वजह से 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में उनकी उम्मीदवारी पर कैंची चली थी।
अवध का पासी समाज और महिला प्रतिनिधित्व
वर्ष 2026 के राज्यसभा चुनाव में प्रियंका सिंह रावत की वापसी भाजपा के एक सुनियोजित सामाजिक संतुलन का हिस्सा मानी जा रही है। वह पासी बिरादरी से ताल्लुक रखती हैं, जो उत्तर प्रदेश के दलित वर्ग में एक अत्यंत प्रभावशाली और विशाल आबादी वाला समूह है। खासकर मध्य उत्तर प्रदेश यानी अवध के विस्तृत इलाके में इस समुदाय का चुनावी प्रभाव निर्णायक माना जाता है। बाराबंकी के साथ-साथ लखनऊ, सीतापुर, हरदोई, उन्नाव, रायबरेली और अमेठी जैसे प्रमुख जिलों में पासी मतदाताओं की सघन मौजूदगी है।
इसके साथ ही, उच्च सदन के लिए घोषित आठ उम्मीदवारों के पैनल में भाजपा ने दो महिला चेहरों को आगे बढ़ाया है, जिनमें प्रियंका सिंह रावत के अलावा श्रुति गंगवार का नाम भी शामिल है। पूर्व में लोकसभा की चुनावी जंग जीत चुकीं, केंद्रीय स्तर की राजनीति का अनुभव रखने वाली और प्रदेश संगठन में उपाध्यक्ष रह चुकीं प्रियंका को संसद के उच्च सदन में भेजकर भाजपा ने दलित और महिला वोटरों को एक साथ साधने की पुख्ता रणनीति बनाई है।























