उत्तर प्रदेश की राजनीति में रूहेलखंड अंचल का बरेली जिला हमेशा से रणनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जाता रहा है, और इसी जिले की विधानसभा सीट संख्या 120 यानी भोजीपुरा सूबे के सबसे चर्चित चुनावी अखाड़ों में शुमार है। बरेली लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाले इस इलाके का सियासी मिजाज ऐसा रहा है कि यहां किसी भी एक दल का एकछत्र राज लंबे समय तक टिक नहीं पाया। अगर बीते तीन दशकों के चुनावी नतीजों पर नजर डालें, तो समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों ही तीन-तीन बार यहां विजय पताका फहरा चुकी हैं। इसके अलावा बहुजन समाज पार्टी और मौलाना तौकीर रजा की इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल ने भी एक-एक बार इस सीट पर बाजी मारकर मुकाबले को बेहद दिलचस्प बनाया है। इलाके की राजनीति में शाजिल अंसारी, बहोरन लाल मौर्य और वीरेंद्र सिंह गंगवार जैसे चेहरों का दबदबा रहा है। सामाजिक बनावट के स्तर पर यहां मुस्लिम, कुर्मी, अन्य पिछड़े वर्ग और अनुसूचित जाति के मतदाताओं की तादाद इतनी मजबूत है कि वे किसी भी प्रत्याशी की तकदीर तय करने का माद्दा रखते हैं।
1991 के दौर में बीजेपी के कुंवर सुभाष पटेल का परचम
साल 1991 के विधानसभा चुनाव के दौरान भोजीपुरा में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और जनता पार्टी के बीच सिमट गया था। उस चुनाव में बीजेपी की ओर से कुंवर सुभाष पटेल मैदान में थे, जबकि जनता पार्टी ने मोहम्मद फारूक को अपना उम्मीदवार बनाया था। जब मतपेटियों से पर्चियां गिनी गईं, तो कुंवर सुभाष पटेल ने 8 हजार 883 मतों के अंतर से जीत दर्ज की। आंकड़ों के अनुसार बीजेपी प्रत्याशी को 37 हजार 228 वोट हासिल हुए थे, जबकि जनता पार्टी के मोहम्मद फारूक 28 हजार 345 वोटों तक ही पहुंच सके। इस मुकाबले में कांग्रेस पार्टी के देवपाल सिंह 14 हजार 66 वोट पाकर तीसरे पायदान पर रहे, वहीं जनता दल के उम्मीदवार नरेंद्र पाल सिंह को 9 हजार 528 वोट मिले और वे चौथे स्थान पर रहे।
1993 में सपा-बसपा गठबंधन ने बदला समीकरण, हरीश गंगवार जीते
साल 1993 के चुनाव में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा फेरबदल हुआ, जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर चुनावी समर में उतरने का फैसला किया। भोजीपुरा सीट पर समाजवादी पार्टी ने हरीश कुमार गंगवार पर दांव लगाया, जबकि उनके सामने बीजेपी ने अपने तत्कालीन विधायक सुभाष पटेल को दोबारा प्रत्याशी बनाया था। इस मुकाबले में कांटे की टक्कर देखने को मिली और आखिरकार हरीश कुमार गंगवार ने 4 हजार 330 वोटों के मामूली अंतर से जीत दर्ज कर पहली बार इस सीट पर समाजवादी पार्टी का खाता खोला। नतीजों में सपा प्रत्याशी हरीश कुमार गंगवार को 48 हजार 681 वोट मिले, जबकि बीजेपी के सुभाष पटेल 44 हजार 351 वोट जुटा पाए। कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार खुर्शीद हुसैन इस मुकाबले में काफी पीछे रह गए और उन्हें महज 7 हजार 968 वोटों से संतोष करना पड़ा।
1996 में त्रिकोणीय घमासान और बहोरन लाल मौर्य की जीत
तीन साल बाद यानी 1996 के विधानसभा चुनाव में भोजीपुरा की सियासी जमीन पर बीजेपी ने जोरदार वापसी की। इस चुनाव में वोटों का बिखराव तीन प्रमुख दावेदारों के बीच हुआ, जिसका सीधा लाभ भारतीय जनता पार्टी को मिला। बीजेपी के टिकट पर उतरे बहोरन लाल मौर्य ने 45 हजार 156 मत हासिल किए और कांग्रेस प्रत्याशी भानु प्रताप सिंह को 10 हजार 399 वोटों के अंतर से शिकस्त दी। भानु प्रताप सिंह को उस चुनाव में 34 हजार 757 वोट मिले थे। वहीं दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी के तत्कालीन विधायक हरीश कुमार गंगवार इस त्रिकोणीय संघर्ष में पिछड़कर तीसरे स्थान पर चले गए और केवल 32 हजार 828 वोट ही जुटा पाए।
2002 में वीरेंद्र सिंह के सहारे समाजवादी पार्टी का पलटवार
साल 2002 के विधानसभा चुनाव में भोजीपुरा की जनता ने एक बार फिर सत्ता परिवर्तन का फैसला सुनाया। इस चुनाव में भी 1996 की तरह त्रिकोणीय खींचतान बनी, मगर इस बार बाजी समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार वीरेंद्र सिंह के हाथ लगी। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक वीरेंद्र सिंह ने 42 हजार 761 वोट हासिल कर जीत अपने नाम की। उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी अब्दुल कादिर रहे, जिन्हें 36 हजार 386 वोट मिले। इस तरह हार-जीत का फैसला 6 हजार 375 वोटों से हुआ। वहीं बीजेपी के तत्कालीन विधायक बहोरन लाल मौर्य 33 हजार 442 वोट पाकर तीसरे स्थान पर खिसक गए।
2007 में बसपा की ऐतिहासिक जीत, शाजिल इस्लाम की धमाकेदार एंट्री
साल 2007 में जब पूरे उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी की सियासी लहर चली, तब भोजीपुरा विधानसभा क्षेत्र में भी इतिहास रचा गया। बीएसपी के टिकट पर शाजिल इस्लाम अंसारी ने मैदान संभाला और बेहद नजदीकी मुकाबले में बीजेपी उम्मीदवार बहोरन लाल मौर्य को पराजित कर दिया। शाजिल इस्लाम अंसारी को 39 हजार 339 मत मिले, जबकि बहोरन लाल मौर्य 38 हजार 209 वोटों पर सिमट गए। महज 1 हजार 130 वोटों के अंतर से तय हुआ यह मुकाबला पिछले तीन दशकों के सबसे रोमांचक मुकाबलों में से एक साबित हुआ। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के वीरेंद्र सिंह गंगवार 31 हजार 973 वोटों के साथ तीसरे और मौलाना तौकीर रजा की इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के सरदार खान 13 हजार 637 वोटों के साथ चौथे स्थान पर रहे। कांग्रेस पार्टी पांचवें पायदान पर लुढ़क गई और उसके प्रत्याशी अब्दुल कादिर को केवल 8 हजार 922 वोट मिले।
2012 में इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल का बड़ा उलटफेर
साल 2012 का विधानसभा चुनाव भोजीपुरा के इतिहास का सबसे अप्रत्याशित चुनाव माना जाता है। किसी भी राष्ट्रीय या मुख्यधारा के बड़े राजनीतिक दल को पछाड़ते हुए मौलाना तौकीर रजा की इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल ने यहां जीत का परचम लहरा दिया। तत्कालीन विधायक शाजिल इस्लाम अंसारी ने बीएसपी छोड़कर इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के चुनाव चिन्ह पर ताल ठोंकी थी। मतगणना के बाद शाजिल इस्लाम अंसारी ने 65 हजार 531 वोट बटोरकर समाजवादी पार्टी के वीरेंद्र सिंह गंगवार को 17 हजार 948 वोटों के भारी अंतर से हरा दिया। सपा के वीरेंद्र सिंह गंगवार को 47 हजार 583 वोट मिले। इस चुनाव में बीजेपी के बहोरन लाल मौर्य 34 हजार 281 वोटों के साथ तीसरे, बीएसपी के अखलाक अहमद 19 हजार 119 वोटों के साथ चौथे और कांग्रेस के योगेश कुमार 14 हजार 815 वोटों के साथ पांचवें नंबर पर रहे।
2017 में मोदी लहर के बीच बहोरन लाल मौर्य की रिकॉर्ड जीत
साल 2017 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के बहोरन लाल मौर्य ने भोजीपुरा सीट पर ऐतिहासिक अंतर से जीत दर्ज की। इस बार शाजिल इस्लाम अंसारी ने इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल छोड़कर समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा था। बीजेपी प्रत्याशी बहोरन लाल मौर्य को 1 लाख 381 वोट मिले, जबकि सपा उम्मीदवार शाजिल इस्लाम अंसारी 72 हजार 617 वोट ही हासिल कर सके। बहोरन लाल मौर्य ने 27 हजार 764 वोटों के भारी अंतर से जीत हासिल की, जो 1991 से 2022 के बीच इस सीट पर दर्ज की गई सबसे बड़ी जीत का रिकॉर्ड है। इस चुनाव में बहुजन समाज पार्टी के सुलेमान बेग 49 हजार 882 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे, जबकि इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल के उम्मीदवार शेर अली जाफरी को सिर्फ 6 हजार 494 वोट मिले और वे चौथे स्थान पर खिसक गए।
2022 के चुनाव में शाजिल इस्लाम ने सपा को दिलाई सीट
साल 2022 के विधानसभा चुनाव में एक बार फिर भोजीपुरा सीट पर शाजिल इस्लाम अंसारी और बहोरन लाल मौर्य के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला देखने को मिला। जब ईवीएम के मतों की गिनती पूरी हुई, तो समाजवादी पार्टी के शाजिल इस्लाम अंसारी ने 9 हजार 409 वोटों से जीत हासिल कर सीट बीजेपी से वापस छीन ली। शाजिल इस्लाम अंसारी के खाते में 1 लाख 19 हजार 402 वोट आए, जबकि बीजेपी के बहोरन लाल मौर्य को 1 लाख 9 हजार 993 मत प्राप्त हुए। वहीं बीएसपी प्रत्याशी योगेश कुमार 26 हजार 909 वोटों के साथ काफी पीछे छूट गए और कांग्रेस उम्मीदवार सरदार खान को महज 1 हजार 963 वोट मिले।
2027 के महासमर में क्या बन रहे हैं सियासी समीकरण
भोजीपुरा विधानसभा सीट के चुनावी इतिहास में व्यक्तिगत प्रदर्शन का विश्लेषण करें तो शाजिल इस्लाम अंसारी का दबदबा साफ नजर आता है। उन्होंने अलग-अलग राजनीतिक दलों के टिकट पर चार बार चुनावी किस्मत आजमाई और तीन बार विधानसभा पहुंचने में सफल रहे। शाजिल इस्लाम अंसारी 2007 में बीएसपी, 2012 में इत्तेहाद-ए-मिल्लत काउंसिल और 2022 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर विधायक चुने गए। दूसरी तरफ बीजेपी के वरिष्ठ नेता बहोरन लाल मौर्य 1996 से लगातार इसी सीट पर चुनाव लड़ रहे हैं और उन्होंने 1996 तथा 2017 में बीजेपी को शानदार जीत दिलाई है।
आगामी 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भोजीपुरा की बिसात पर एक बार फिर समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच सीधी भिड़ंत होने के आसार हैं। हालांकि बहुजन समाज पार्टी का रुख और उसके प्रत्याशी की स्थिति भी निर्णायक साबित होगी, क्योंकि बीएसपी का वोट बैंक ही यह तय करता है कि किस दल का समीकरण बिगड़ेगा। मुस्लिम, कुर्मी, पिछड़े और दलित मतदाताओं की गोलबंदी को साधने के लिए पार्टियां किस चेहरे पर दांव लगाती हैं, यही फैसला 2027 में भोजीपुरा के ताज का फैसला करेगा।























