उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर में खुले गड्ढों और बिना सुरक्षा इंतजामों वाले व्यावसायिक ढांचों की भारी लापरवाही ने एक और मासूम की जान ले ली। चकेरी थाना क्षेत्र के सनिगवां बंबा इलाके में सोमवार की शाम खेल-कूद के दौरान तीन वर्षीय मासूम बच्चा अचानक पानी से भरे एक गहरे टैंक में जा गिरा। यह टैंक वाहन धुलाई केंद्र के संचालन के मकसद से जमीन में खुदवाया गया था, जिस पर सुरक्षा का कोई पुख्ता ढक्कन या घेरा नहीं बनाया गया था। जब तक परिजनों को बच्चे के टैंक में समाने की खबर मिली, तब तक काफी देर हो चुकी थी और मासूम को बचाया नहीं जा सका।
खेलते-खेलते अचानक गायब हो गया तीन साल का मासूम
सनिगवां के बंबा मोहल्ले में रहने वाले मोहम्मद रफीक मजदूरी करके अपने परिवार का पेट पालते हैं। उनके परिवार में पत्नी सहाना के अलावा तीन बेटे गुफरान, कुर्बान और सबसे छोटा तीन साल का बेटा निहाल था। सोमवार दोपहर बाद करीब चार बजे निहाल रोज की तरह अपने घर के बाहर अन्य हमउम्र बच्चों के साथ खेल रहा था। खेलते-खेलते वह घर से महज तीस मीटर की दूरी पर बने एक वाहन धुलाई केंद्र के पास पहुंच गया। वहां गाड़ियों की धुलाई के लिए पानी जमा करने के वास्ते करीब पांच फीट गहरा टैंक खुदवाया गया था। खेल के दौरान ही निहाल का पैर फिसल गया और वह सीधे गहरे पानी से लबालब टैंक के अंदर गिर पड़ा।
हादसा होते ही आसपास मौजूद छोटे बच्चे सहम गए और किसी को तुरंत इस बात का अंदाजा नहीं लगा। दूसरी तरफ जब काफी देर तक निहाल दिखाई नहीं दिया, तो उसकी मां सहाना और पिता मोहम्मद रफीक को चिंता सताने लगी। घर के लोगों ने आसपास की गलियों, पड़ोस के घरों और रास्तों पर बच्चे की तलाश शुरू की। समय बीतने के साथ ही परिवार वालों की घबराहट बढ़ती चली गई, क्योंकि निहाल का कहीं कोई अता-पता नहीं चल पा रहा था।
डेढ़ घंटे बाद बच्चों ने दी टैंक में गिरने की जानकारी
लापता बेटे की खोजबीन में जुटे परिजनों को अनहोनी की कोई भनक तक नहीं थी। वे पूरे मोहल्ले में करीब डेढ़ घंटे तक लगातार निहाल को पुकारते रहे और लोगों से पूछताछ करते रहे। शाम के करीब साढ़े पांच बजे मोहल्ले के कुछ छोटे बच्चों ने हिम्मत जुटाकर परिजनों को बताया कि निहाल खेलते समय वाहन धुलाई सेंटर वाले गड्ढे के अंदर गिर गया था। यह सुनते ही परिवार वालों के पैरों तले जमीन खिसक गई और वे भागते हुए तुरंत मौके पर पहुंचे।
स्थानीय पड़ोसियों और परिजनों ने बिना वक्त गंवाए फौरन पानी के टैंक के भीतर तलाश शुरू की। चंद पलों में ही निहाल को टैंक से बाहर खींच निकाला गया, लेकिन तब तक पानी में डूबे रहने के कारण उसकी हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी। परिजन आनन-फानन में मासूम को सीने से लगाकर नजदीकी अस्पताल की ओर दौड़े, ताकि किसी तरह उसकी सांसें बचाई जा सकें। हालांकि अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में निहाल के शरीर ने कोई हरकत करना बंद कर दिया और उसने दम तोड़ दिया। डॉक्टरों ने भी देखने के बाद उसे मृत घोषित कर दिया, जिसके बाद घर में कोहराम मच गया।
देर शाम पुलिस को सूचना और परिजनों का फैसला
मासूम बेटे की अचानक मौत से मोहम्मद रफीक और उनकी पत्नी सहाना बेसुध हो गए। घर में मातम छा गया और मोहल्ले के लोग सांत्वना देने जुटने लगे। घटना घटने के लगभग तीन घंटे बाद, शाम सात बजे के करीब स्थानीय पुलिस और दमकल विभाग को इस हादसे की जानकारी दी गई। सूचना मिलते ही चकेरी थाने की पुलिस टीम और दमकल की एक गाड़ी सनिगवां बंबा स्थित घटना स्थल पर पहुंची। पुलिस अधिकारियों ने मौके का मुआयना किया और उस पांच फीट गहरे टैंक की स्थिति को देखा, जिसमें गिरकर बच्चे की मौत हुई थी।
पुलिस टीम ने परिजनों से शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजने और कानूनी कार्रवाई शुरू करने के संबंध में बातचीत की। हालांकि गहरे सदमे में डूबे परिजनों ने किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई कराने अथवा शव का पोस्टमार्टम कराने से साफ इनकार कर दिया। एसीपी चकेरी आशुतोष कुमार के मुताबिक परिजनों की तरफ से पुलिस को अभी तक कोई औपचारिक प्रार्थना पत्र या शिकायत नहीं सौंपी गई है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि परिजनों की ओर से थाने में कोई लिखित तहरीर दी जाती है, तो उसके आधार पर नियमों के अनुसार सख्त कानूनी कार्रवाई अमल में लाई जाएगी।
रिहायशी इलाकों में खुले व्यावसायिक गड्ढों पर गंभीर सवाल
इस हृदयविदारक हादसे ने एक बार फिर आबादी वाले मोहल्लों में चलने वाले व्यावसायिक प्रतिष्ठानों और वहां खोदे गए गहरे गड्ढों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सनिगवां इलाके में जिस जगह यह वाहन सर्विस सेंटर संचालित हो रहा था, वह पूरी तरह रिहायशी इलाका है जहां दिनभर दर्जनों छोटे बच्चे गलियों में खेलते हैं। इसके बावजूद संचालक ने लगभग पांच फीट गहरे पानी के टैंक को बिना किसी ढक्कन, जाली अथवा बाड़ के पूरी तरह खुला छोड़ रखा था।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि अगर सर्विस सेंटर संचालक ने टैंक के चारों तरफ मजबूत घेराबंदी की होती या उसे लोहे की जाली से ढक दिया होता, तो तीन साल के निहाल की जिंदगी बच सकती थी। बिना किसी अनुमति या बुनियादी सुरक्षा मानकों के रिहायशी इलाकों में ऐसे मौत के कुएं खुले छोड़ देना घोर गैर-जिम्मेदारी को दर्शाता है। हादसे के बाद पूरे इलाके में गम और गुस्से का माहौल है, जबकि एक गरीब मजदूर परिवार ने अपने सबसे छोटे बेटे को हमेशा के लिए खो दिया है।
























