उत्तर प्रदेश के चुनावी अखाड़े में असदुद्दीन ओवैसी ने अपनी रणनीति बदलते हुए मुख्य विपक्षी दल पर तीखे राजनीतिक हमले शुरू कर दिए हैं। अयोध्या से करीब 100 किलोमीटर के फासले पर स्थित श्रावस्ती में एक जनसभा को संबोधित करते हुए ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के प्रमुख ने सत्ताधारी दल के बजाय समाजवादी पार्टी को अपने निशाने पर रखा। उनका सीधा आरोप है कि अखिलेश यादव अल्पसंख्यक समुदाय से पूरा समर्थन तो ले लेते हैं, मगर उनके बुनियादी मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं। मदरसों की तालाबंदी और घरों पर चलने वाली प्रशासनिक बुलडोजर कार्रवाई जैसे गंभीर मामलों में भी सपा नेतृत्व कोई कड़ा विरोध दर्ज नहीं कराता।
दरकिनार किए जाने के बाद ओवैसी की नई रणनीति
इस तीखे राजनीतिक टकराव की पृष्ठभूमि विपक्षी खेमे में सीट बंटवारे और साझेदारी से जुड़ी हुई है। ओवैसी ने विपक्षी INDIA गठबंधन का हिस्सा बनने की इच्छा जताई थी और इसके लिए औपचारिक आग्रह करते हुए 2 अक्टूबर तक की समयसीमा तय की थी। यह मियाद पूरी होने के बावजूद अखिलेश यादव की ओर से कोई संवाद स्थापित नहीं किया गया। गठबंधन के दरवाजे बंद होने के बाद अब मजलिस प्रमुख ने सीधे मैदान में उतरकर सपा के पारंपरिक जनाधार में सेंध लगाने का फैसला किया है।
अवध से पूर्वांचल और पश्चिम तक रैलियों का खाका
राज्य के अलग-अलग अंचलों में पकड़ बनाने के लिए ओवैसी ने सघन प्रचार अभियान तैयार किया है। अवध के श्रावस्ती से इस दौरे की शुरुआत हो चुकी है और आगामी रविवार को उनका अगला पड़ाव पूर्वांचल का आजमगढ़ होगा। इसके तुरंत बाद वह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों का रुख करेंगे, जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की तादाद चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। राज्य के चुनावी गणित में यह वर्ग बेहद निर्णायक माना जाता है, इसलिए ओवैसी की सक्रियता सपा खेमे में भारी असहजता पैदा कर रही है।
आंकड़ों का खेल और सपा की बढ़ती चिंता
सपा की इस घबराहट की मुख्य वजह हालिया चुनावों के आंकड़े हैं, जिनमें अल्पसंख्यक समुदाय का एकतरफा झुकाव दिखा था। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा गठबंधन को 79 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का साथ मिला था, जबकि 2024 के आम चुनाव में कांग्रेस और सपा के संयुक्त मोर्चे को यह समर्थन बढ़कर 92 फीसदी तक पहुंच गया था। यदि ओवैसी इस मजबूत वोट बैंक से वोटों का एक छोटा हिस्सा भी अपनी ओर खींचने में सफल रहते हैं, तो सत्ता में वापसी की उम्मीद पाले अखिलेश यादव का चुनावी समीकरण पूरी तरह बिखर सकता है।
हिंदुत्व और सांस्कृतिक मुद्दों पर योगी आदित्यनाथ की किलेबंदी
विपक्षी दलों के बीच मुस्लिम मतों की इस खींचतान के समानांतर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ बहुसंख्यक मतदाताओं को एकजुट रखने की पिच मजबूत कर रहे हैं। हाल ही में एक सार्वजनिक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने आगाह किया कि जाति, क्षेत्र और भाषा के नाम पर विभाजनकारी ताकतें सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं। इसके साथ ही प्रशासनिक फैसलों के जरिए सांस्कृतिक अस्मिता को उभारने की कड़ी में उन्होंने भदोही जनपद का नाम बदलकर सद्गुरु संत रविदास के नाम पर समर्पित करने की घोषणा भी की है।



















