उत्तर प्रदेश की चुनावी राजनीति में शाहजहांपुर विधानसभा क्षेत्र उन बेहद चुनिंदा सीटों में शुमार है जहाँ तीन दशकों से अधिक समय से किसी एक ही दल और नेता का परचम लहराता आ रहा है। राज्य सरकार में वित्त एवं संसदीय कार्य मंत्री सुरेश कुमार खन्ना शाहजहांपुर सीट संख्या 135 से लगातार नौ बार से विधायक चुने जाते रहे हैं। साल 1989 में जब उन्होंने पहली बार इस सीट पर जीत का स्वाद चखा था, उसके बाद से प्रदेश में सत्ता के कितने ही समीकरण बदले, लेकिन शाहजहांपुर का सियासी गणित उनके पक्ष में ही झुका रहा। वर्ष 2000 के दशक में जब पूरे उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी का संगठनात्मक आधार कमजोर पड़ा, तब भी इस सीट पर कोई आंच नहीं आई। मायावती के नेतृत्व में वर्ष 2007 में आई बहुजन समाज पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली लहर हो या फिर 2012 में समाजवादी पार्टी को मिला प्रचंड जनादेश, सुरेश कुमार खन्ना अपने मजबूत सियासी आधार के दम पर विधानसभा पहुँचने में सफल रहे। बसपा और सपा ने दशकों तक उनके सामने मजबूत मोर्चेबंदी की, पर वे उनके इस अजेय तिलिस्म को तोड़ने में नाकाम रहे। शाहजहांपुर लोकसभा क्षेत्र के तहत आने वाली इस विधानसभा सीट का तीन दशकों का चुनावी इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है और 2027 के आगामी दंगल में यहाँ नए सियासी समीकरण बनते दिख रहे हैं।
शुरुआती असफलता के बाद 1989 में खुला खाता और 1991 में दर्ज की सबसे बड़ी जीत
शाहजहांपुर सीट पर सुरेश कुमार खन्ना का चुनावी सफर 1980 के दशक से ही शुरू हो गया था। उन्होंने वर्ष 1980 में जनता पार्टी (सेक्युलर) के टिकट पर अपनी पहली चुनावी पारी खेली थी। इसके बाद 1985 में उन्होंने बीजेपी प्रत्याशी के रूप में किस्मत आजमाई, लेकिन शुरुआती दोनों ही प्रयासों में उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा था। इस दोहरी हार के बाद उनकी मेहनत रंग लाई और 1989 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने तत्कालीन विधायक नवाब सिकंदर अली खान को हराकर पहली बार जीत हासिल की।
साल 1991 में राम मंदिर आंदोलन की पृष्ठभूमि में जब मध्यावधि चुनाव हुए, तो सुरेश कुमार खन्ना एक बार फिर बीजेपी के बैनर तले चुनावी मैदान में उतरे। इस चुनाव में उन्होंने 50 हजार 579 मत प्राप्त किए और अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी जनता दल के मोहम्मद इकबाल को 28 हजार 237 वोटों के भारी अंतर से मात दी। मोहम्मद इकबाल के खाते में 22 हजार 342 वोट आए थे। दिलचस्प बात यह है कि 1991 से लेकर 2022 तक लड़े गए सभी चुनावों में यह सुरेश कुमार खन्ना की जीत का अब तक का सबसे बड़ा अंतर साबित हुआ। इसी चुनाव में कांग्रेस के प्रत्याशी अशफाक उल्ला खान को 18 हजार 648 मत मिले थे, जबकि जनता पार्टी के टिकट पर उतरे पूर्व विधायक नवाब सिकंदर अली खान महज 6 हजार 71 वोटों पर सिमट गए थे।
1993 में सपा-बसपा गठबंधन को पछाड़ा और 1996 में चौथी जीत से कायम रखा दबदबा
साल 1993 का विधानसभा चुनाव उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा मोड़ लेकर आया था, जब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन के चलते बसपा ने शाहजहांपुर में अपना प्रत्याशी नहीं उतारा और सपा के अशोक कुमार मैदान में थे। इस संयुक्त चुनौती के बावजूद सुरेश कुमार खन्ना ने अपनी जीत की हैट्रिक पूरी की। उन्हें 60 हजार 224 वोट मिले, जबकि सपा प्रत्याशी अशोक कुमार 43 हजार 356 मत ही जुटा सके। खन्ना ने यह मुकाबला 16 हजार 868 वोटों के अंतर से जीत लिया। इस चुनाव में कांग्रेस के उम्मीदवार मोहम्मद इकबाल 13 हजार 220 वोटों पर सिमट गए और मुकाबले को त्रिकोणीय बनाने में पूरी तरह नाकाम रहे।
इसके बाद 1996 के विधानसभा चुनाव में सुरेश कुमार खन्ना ने लगातार चौथी बार अपनी जीत का परचम फहराया। इस बार उनके सामने मुख्य प्रतिद्वंद्वी के रूप में कांग्रेस के नवाब सिकंदर अली खान खड़े थे। खन्ना ने 60 हजार 58 वोट हासिल किए, जबकि सिकंदर अली खान को 37 हजार 793 मत मिले। बीजेपी उम्मीदवार ने यह मुकाबला 22 हजार 265 मतों के भारी अंतर से अपने नाम कर लिया। समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी ओम प्रकाश गुप्ता इस मुकाबले में तीसरे स्थान पर रहे और उन्हें मात्र 23 हजार 339 वोटों से संतोष करना पड़ा।
2002 में जीत का पंजा और 2007 की बसपा लहर में भी बचाई सीट
वर्ष 2002 के विधानसभा चुनाव में जब राज्य में त्रिशंकु विधानसभा की स्थिति बन रही थी, तब सुरेश कुमार खन्ना ने लगातार पांचवीं जीत दर्ज कर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। चुनाव आयोग के आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, खन्ना ने 68 हजार 454 वोट हासिल कर समाजवादी पार्टी के प्रदीप पांडे को 23 हजार 37 वोटों के अंतर से शिकस्त दी। रनर-अप रहे प्रदीप पांडे को 45 हजार 417 वोट मिले थे। कांग्रेस के अशफाक उल्ला खान को 15 हजार 757 वोट मिले, जबकि बसपा प्रत्याशी तकवीम खान महज 7 हजार 830 वोटों पर ही सिमट कर रह गए थे।
साल 2007 का चुनाव उत्तर प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में इसलिए दर्ज है क्योंकि तब मायावती के नेतृत्व में बसपा ने अपने बूते पूर्ण बहुमत हासिल किया था। प्रदेश भर में चली इस बसपा की आंधी के बीच भी शाहजहांपुर में सुरेश कुमार खन्ना ने अपनी सीट बचा ली, हालांकि मुकाबला बेहद कड़ा रहा। खन्ना को 51 हजार 463 वोट मिले, जबकि बसपा उम्मीदवार फैजान अली खान ने 41 हजार 273 मत हासिल कर उन्हें कड़ी टक्कर दी। इस बार जीत का अंतर घटकर 10 हजार 190 वोटों पर आ गया था। सपा के प्रदीप पांडे 21 हजार 808 वोट लेकर तीसरे स्थान पर खिसक गए थे।
2012 में सपा की पूर्ण बहुमत सरकार के दौर में जीत और 2017 में एक लाख पार का रिकॉर्ड
साल 2008 में हुए नए परिसीमन के बाद शाहजहांपुर सीट पर 2012 में पहली बार वोट डाले गए। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी ने प्रदेश में पूर्ण बहुमत हासिल कर सरकार बनाई थी। इसके बावजूद शाहजहांपुर के मतदाताओं ने सुरेश कुमार खन्ना पर भरोसा बनाए रखा। खन्ना ने 81 हजार 581 वोट पाकर जीत दर्ज की, जबकि सपा के प्रत्याशी तनवीर खान 65 हजार 403 वोट हासिल कर दूसरे स्थान पर रहे। खन्ना की जीत का अंतर 16 हजार 178 वोटों का रहा। बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े असलम खान 19 हजार 936 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे थे।
साल 2017 के चुनाव में जब पूरे प्रदेश में बीजेपी की प्रचंड लहर चल रही थी, तब सुरेश कुमार खन्ना ने पहली बार अपने करियर में एक लाख से अधिक मत हासिल करने का नया कीर्तिमान स्थापित किया। उन्होंने कुल 1 लाख 734 वोट प्राप्त किए। समाजवादी पार्टी ने एक बार फिर तनवीर खान पर ही दांव आजमाया था। तनवीर खान ने 81 हजार 531 वोट तो हासिल किए, लेकिन वे 19 हजार 203 वोटों के अंतर से चुनाव हार गए।
2022 में कड़े मुकाबले के बीच नौवीं जीत और घटता जीत का अंतर
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने एक बार फिर अपने नौ बार के इस दिग्गज नेता पर दांव लगाया। उनके सामने समाजवादी पार्टी ने लगातार तीसरी बार तनवीर खान को अपना चेहरा बनाया। इस बार मुकाबला बेहद कड़ा और सांस रोक देने वाला रहा। सुरेश कुमार खन्ना ने 1 लाख 9 हजार 942 वोट हासिल किए, जबकि सपा के तनवीर खान भी 1 लाख 629 मत पाने में कामयाब रहे। खन्ना ने अंततः 9 हजार 313 वोटों से यह सीट जीत ली। हालांकि 1991 से 2022 के बीच लड़े गए आठ विधानसभा चुनावों के रिकॉर्ड को देखें तो यह उनकी सबसे कम अंतर वाली जीत दर्ज की गई।
चुनावी आंकड़ों की नजर में शाहजहांपुर विधानसभा का सफर
शाहजहांपुर सीट पर पिछले आठ चुनावों के परिणाम इस बात की गवाही देते हैं कि किस तरह समय के साथ विपक्षी दलों की चुनौती मजबूत होती गई है। वर्ष 1991 में बीजेपी के सुरेश कुमार खन्ना ने जनता दल के मोहम्मद इकबाल को 28 हजार 237 वोटों से मात दी थी। इसके बाद 1993 में उन्होंने सपा के अशोक कुमार को 16 हजार 868 मतों से हराया। साल 1996 में कांग्रेस के सिकंदर अली खान के खिलाफ खन्ना की जीत का अंतर 22 हजार 265 वोटों का रहा था। 2002 में सपा के प्रदीप पांडे को उन्होंने 23 हजार 37 वोटों के फासले से पछाड़ा था।
वर्ष 2007 में बसपा के फैजान अली खान के खिलाफ जीत का फासला घटकर 10 हजार 190 वोटों पर आ गया था। साल 2012 में सपा के तनवीर खान के खिलाफ यह अंतर 16 हजार 178 मतों का था, जो 2017 में बढ़कर 19 हजार 203 वोटों पर पहुँच गया। लेकिन 2022 के चुनाव में जब दोनों मुख्य उम्मीदवारों ने एक लाख से अधिक मत हासिल किए, तब तनवीर खान के खिलाफ जीत का अंतर सिमटकर महज 9 हजार 313 वोटों पर आ गया।
2027 के चुनाव में क्या बन सकते हैं नए सियासी समीकरण
पिछले तीन दशकों के इतिहास को देखें तो शाहजहांपुर विधानसभा क्षेत्र में सुरेश कुमार खन्ना का राजनीतिक दबदबा निर्विवाद रहा है। लगातार नौ बार के विधायक को उनके घरेलू मैदान पर चुनौती देना किसी भी विरोधी दल के लिए आसान काम नहीं रहा है। लेकिन 2022 के चुनाव में जीत के अंतर का 10 हजार से नीचे आ जाना और सपा का 1 लाख से अधिक मत जुटा लेना इस बात का संकेत है कि अब मुकाबला एकतरफा नहीं रह गया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में यदि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस एक साथ मिलकर चुनावी मैदान में उतरते हैं, तो शाहजहांपुर में एक बार फिर सीधा और बेहद कड़ा मुकाबला देखने को मिल सकता है। इसकी एक बड़ी झलक 2024 के लोकसभा चुनाव में भी दिखाई दी थी। शाहजहांपुर लोकसभा सीट के अंतर्गत आने वाले इसी शाहजहांपुर विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी प्रत्याशी अरुण कुमार सागर को सपा उम्मीदवार ज्योत्सना गोंड के मुकाबले सिर्फ 3 हजार 183 वोटों की मामूली बढ़त मिल सकी थी। उस चुनाव में बीजेपी प्रत्याशी ने 96 हजार 786 वोट हासिल किए थे, जबकि सपा की ज्योत्सना गोंड को 93 हजार 603 वोट मिले थे। यदि 2024 के लोकसभा चुनाव की तरह ही विपक्षी दलों का साझा वोट बैंक 2027 के विधानसभा चुनाव में भी एकजुट रहा, तो बीजेपी के इस मजबूत किले में सुरेश कुमार खन्ना के सामने अपने राजनीतिक जीवन की सबसे कठिन चुनौती खड़ी हो सकती है।





















