पर्वतीय क्षेत्रों में शीत ऋतु का आगमन होते ही मवेशियों के लिए पौष्टिक हरी घास का प्रबंध करना ग्रामीण परिवारों के लिए एक कठिन चुनौती बन जाता है। पहाड़ों के अनेक दूरदराज के गांवों में कड़ाके की ठंड के दिनों में प्राकृतिक हरी घास की भारी कमी देखने को मिलती है। ऐसी विषम भौगोलिक परिस्थितियों में ग्रामीण किसान धान की फसल की कटाई के पश्चात बचने वाले अवशेषों यानी पराली को व्यर्थ समझकर नष्ट करने के बजाय बहुत संभालकर सहेजते हैं। जब शीतकाल में चारे का संकट गहराता है, तब यही सुरक्षित रखा गया अवशेष मवेशियों के आहार के रूप में अत्यंत उपयोगी सिद्ध होता है। पर्वतीय अंचलों में पशुपालक इस कार्य के लिए पीढ़ियों से चले आ रहे अपने पारंपरिक ज्ञान और सिद्ध तकनीकों का सहारा लेते हैं, जिसमें अवशेषों को धूप में सुखाकर सुरक्षित गठरियां बांधना अथवा विशेष आकृतियों में उनका भंडारण करना सम्मिलित है।
उत्तराखंड के पहाड़ी जनपदों में कृषि कर्म के साथ-साथ पशुपालन भी ग्रामीणों की दैनिक आजीविका और घरेलू अर्थव्यवस्था की सबसे प्रमुख धुरी माना जाता है। ऐसे में दुधारू पशुओं और अन्य मवेशियों के भरण-पोषण के लिए पूरे बारह महीने चारे का नियमित प्रबंध बनाए रखना अनिवार्य हो जाता है। धान की कटाई के बाद बचने वाली पराली को निरर्थक मानकर खेतों में आग के हवाले करने या खुले में फेंकने के स्थान पर यदि वैज्ञानिक और पारंपरिक समझ से सहेज लिया जाए, तो यह चारे की कमी को स्थायी रूप से दूर कर सकता है। इससे एक ओर जहां फसल अवशेषों का शत-प्रतिशत सदुपयोग सुनिश्चित होता है, वहीं दूसरी ओर पशुपालकों को सूखे चारे की निरंतर उपलब्धता का मजबूत संबल भी प्राप्त होता है।
धूप में सुखाकर हवादार ठिकानों पर गठरियां बांधने की प्रक्रिया
पहाड़ों के मौसम का मिजाज अत्यधिक परिवर्तनशील रहता है, जहां कभी भी बारिश, तेज ओस और धरती की प्राकृतिक नमी के कारण खुले में रखी पराली के सड़ने और खराब होने का अंदेशा बना रहता है। स्थानीय किसान रमेश कृषक पांडे ने बताया कि फसल कटाई के उपरांत धान की पराली को सीधे भंडारित करने की भूल बिल्कुल नहीं करनी चाहिए, बल्कि पहले उसे धूप में भली-भांति सुखाना चाहिए। पराली की नमी पूरी तरह सूख जाने के बाद उसकी सघन गठरियां बांधी जाती हैं और फिर उन्हें किसी पूरी तरह शुष्क तथा हवादार स्थान पर व्यवस्थित ढंग से रखा जाता है। इसके लिए ग्रामीण प्रायः टिनशेड वाले बाड़ों, पक्की छत वाले बरामदों अथवा ऐसे कवर्ड स्थानों का चयन करते हैं, जहां वर्षा की फुहारें या पानी सीधे न पहुंच सके।
पराली के बेहतर रख-रखाव के लिए यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि गठरियों को कभी भी सीधे गीली या कच्ची जमीन पर न रखा जाए। इसके स्थान पर मजबूत लकड़ी के तख्तों अथवा ऊंचे पत्थरों व सूखे ढांचों का एक मजबूत आधार तैयार किया जाता है, जिसके ऊपर पराली को व्यवस्थित किया जाता है। ऐसा करने से भूतल की सीलन ऊपर तक नहीं चढ़ती और अवशेष सुरक्षित बने रहते हैं। भारी वर्षा अथवा ओस से बचाव हेतु जरूरत पड़ने पर इन गठरियों को तिरपाल से भी ढका जाता है, किंतु इसमें यह सावधानी रखना अनिवार्य है कि भीतरी भाग में वाष्पीकरण से नमी न पनपने पाए। यदि किसी भी कारणवश पराली में फफूंद के लक्षण नजर आएं या उसमें सड़न आ जाए, तो ऐसी दूषित पराली पशुओं को बिल्कुल नहीं खिलानी चाहिए।
शंकु के आकार के लूटे बनाकर बारिश से बचाव
उत्तराखंड के पर्वतीय गांवों में पराली को बिना किसी बड़े गोदाम के भी खुले में महीनों तक सुरक्षित सहेजने के लिए 'लूटे' तैयार करने की अत्यंत लोकप्रिय पारंपरिक विधि प्रचलित है। इस पद्धति में पूरी तरह से सूखी हुई पराली को एक निश्चित स्थान पर क्रमबद्ध रूप से शंकु के आकार में ऊपर की ओर संकरा करते हुए जमाया जाता है। इस संरचना की ढलान और बुनावट इस वैज्ञानिक ढंग से तैयार की जाती है कि तेज बारिश का पानी बाहरी सतह से फिसलकर नीचे जमीन पर बह जाता है और संरचना के भीतरी हिस्से में पानी की एक बूंद भी प्रवेश नहीं कर पाती।
लूटे के निर्माण के लिए गांव के ऐसे ऊंचे और ढलान वाले स्थान का चुनाव किया जाता है, जहां वर्षा का पानी ठहरने या जमा होने की तनिक भी आशंका न हो। साथ ही इसके निचले आधार को भी जमीन की प्राकृतिक नमी और सीलन से पूर्णतः सुरक्षित बनाया जाता है। इस सावधानीपूर्वक बनाई गई संरचना से आवश्यकतानुसार समय-समय पर पराली निकाली जाती है और मवेशियों को सूखे चारे के रूप में परोसी जाती है, जिससे वर्षभर चारे की आपूर्ति सुगम बनी रहती है।
संतुलित पोषण के लिए हरी घास के साथ पराली का मेल
पशुओं के समुचित स्वास्थ्य और पोषण को ध्यान में रखते हुए ग्रामीण पशुपालक अक्सर सूखी पराली को बारीक काटकर उपलब्ध हरी घास के साथ मिलाकर मवेशियों को खिलाते हैं। यह तरीका सीमित मात्रा में उपलब्ध हरी घास का विवेकपूर्ण उपयोग करने और पशुओं के पाचन तंत्र को अनुकूल बनाए रखने में बहुत कारगर साबित होता है। हालांकि पशु विशेषज्ञों और अनुभवी किसानों का यह भी मानना है कि पराली को मवेशियों के संपूर्ण दैनिक आहार का एकमात्र स्रोत नहीं बनाया जाना चाहिए। पशुओं की शारीरिक आवश्यकता और दुग्ध उत्पादन को बनाए रखने के लिए उन्हें संतुलित व विविध आहार देना जरूरी है। उत्तराखंड के ये सदियों पुराने व्यावहारिक तौर-तरीके साबित करते हैं कि पराली को जलाने के विनाशकारी चलन के बजाय उसका समझदारी से भंडारण करना पर्यावरण संरक्षण और पशुधन सुरक्षा दोनों के लिए वरदान है।



















