उत्तराखंड के जंगलों और इंसानी बस्तियों के बीच बढ़ता टकराव वन्यजीव प्रबंधन के लिए बेहद गंभीर संकट बन चुका है। राज्य के विभिन्न हिस्सों में पकड़े गए आदमखोर, घायल और अनाथ वन्यजीवों को सुरक्षित रखने के लिए बनाए गए मौजूदा आश्रय गृह अब पूरी तरह भर चुके हैं। स्थिति यह है कि इन केंद्रों में निर्धारित क्षमता से कहीं अधिक संख्या में हिंसक वन्यजीवों को रखा जा रहा है, जिससे उनकी देखभाल और नए रेस्क्यू अभियानों में भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। आंकड़ों के अनुसार जनवरी 2000 से जून 2026 के बीच वन्यजीवों से जुड़ी घटनाओं में कुल 1,320 नागरिकों की जान जा चुकी है। इस अवधि में केवल गुलदारों के हमलों में 565 लोगों की मौत दर्ज हुई, जबकि 2,181 लोग घायल हुए। इस प्रकार राज्य में वन्यजीव हमलों से होने वाली कुल जनहानि में लगभग 43 प्रतिशत हिस्सा केवल गुलदारों के हमलों का है, जिनकी अनुमानित आबादी पूरे राज्य में लगभग 3,000 दर्ज है।
वर्तमान आश्रय गृहों में क्षमता से अधिक वन्यजीव
इस समय उत्तराखंड के पांच क्रियाशील रेस्क्यू सेंटरों में कुल मिलाकर 73 गुलदार और 21 बाघ बंद हैं। इनमें हरिद्वार वन प्रभाग के अंतर्गत आने वाले चिड़ियापुर केंद्र की हालत सबसे ज्यादा चिंताजनक है, जहां निर्धारित क्षमता मात्र 14 से 15 गुलदारों की है, परंतु वहां वर्तमान में 24 गुलदार रखे गए हैं। इसके अलावा कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के ढेला रेस्क्यू सेंटर में 20 गुलदार और 17 बाघ मौजूद हैं। अल्मोड़ा केंद्र में 11 गुलदार, नैनीताल वन प्रभाग के रानीबाग रेस्क्यू सेंटर में 10 गुलदार व 4 बाघ तथा देहरादून रेस्क्यू सेंटर में 8 गुलदार रखे गए हैं। क्षमता से अधिक जानवर होने के बावजूद प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में वन्यजीवों की सक्रियता लगातार बनी हुई है। हाल ही में चमोली जिले में एक भालू ने एक ही परिवार के चार सदस्यों पर हमला कर उन्हें गंभीर रूप से घायल कर दिया था।
सालों से कैद में रहने की मुख्य वजहें
इन केंद्रों में रखे गए अधिकांश शिकारी जानवर आदमखोर घोषित होने के बाद अलग-अलग जिलों से पिंजरों में कैद किए गए थे। कानूनी और सुरक्षा कारणों से ऐसे आदमखोर जानवरों को वापस खुले जंगलों में नहीं छोड़ा जा सकता, जिसके कारण वे वर्षों से इन केंद्रों में कैद हैं। इसके अलावा कुछ वन्यजीव गंभीर चोटों के इलाज के लिए यहां लाए गए थे, जबकि कई ऐसे गुलदार हैं जो शावक अवस्था में अनाथ पाए गए थे। मानव संपर्क और लंबे समय तक चारदीवारी में रहने के कारण ये जानवर प्राकृतिक रूप से शिकार करने की क्षमता खो देते हैं, इसलिए इन्हें उम्रभर रेस्क्यू सेंटरों में ही रखना पड़ता है।
10 नए क्षेत्रीय रेस्क्यू सेंटर बनाने की योजना
पहाड़ी और दूरदराज के जिलों से मौजूदा केंद्रों की दूरी बहुत अधिक है, जिससे रेस्क्यू के दौरान जानवरों को कई घंटों तक वाहन में सफर कराना पड़ता है। इस लंबी यात्रा से जानवरों का तनाव अत्यधिक बढ़ जाता है, उनके त्वरित उपचार में देरी होती है और परिवहन पर भारी खर्च भी आता है। इस संकट से निपटने के लिए केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (CZA) को 19 जून 2026 को एक औपचारिक प्रस्ताव भेजा गया है। योजना के अनुसार वित्तीय वर्ष 2026-27 में 10 नए क्षेत्रीय केंद्र स्थापित किए जाएंगे, जहां प्रत्येक केंद्र में 8 गुलदारों को रखने की व्यवस्था होगी।
इन जिलों में चिह्नित की गई दो-दो हेक्टेयर भूमि
नए क्षेत्रीय केंद्र रुद्रप्रयाग, चमोली, बागेश्वर, ऊधमसिंह नगर, अल्मोड़ा, पौड़ी, टिहरी, पिथौरागढ़, चंपावत और उत्तरकाशी जिलों में बनाए जाने प्रस्तावित हैं। प्रत्येक नए केंद्र के निर्माण के लिए लगभग दो हेक्टेयर वन भूमि चिह्नित की गई है। इन केंद्रों में आधुनिक पशु चिकित्सा जांच, क्वारंटीन वार्ड, त्वरित उपचार और पुनर्वास की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। वन अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ये नए केंद्र किसी सार्वजनिक चिड़ियाघर या पर्यटकों के प्रदर्शन के लिए नहीं होंगे, बल्कि इनका पूरा उपयोग केवल आपातकालीन रेस्क्यू, चिकित्सा देखभाल और वैज्ञानिक पुनर्वास के लिए ही किया जाएगा।



















