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मां के संकल्प और नाविक के तंज से खड़ा हुआ ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला, हरिद्वार की ऐतिहासिक धर्मशाला से जुड़ा है किस्साउत्तराखंड
15 अक्तू॰ 2026, 6:36 pm (2 घंटे पहले)· 0

मां के संकल्प और नाविक के तंज से खड़ा हुआ ऋषिकेश का लक्ष्मण झूला, हरिद्वार की ऐतिहासिक धर्मशाला से जुड़ा है किस्सा

ऋषिकेश के प्रतिष्ठित लक्ष्मण झूले की नींव एक नाविक के व्यंग्य और एक मां के दृढ़ संकल्प से जुड़ी है, जिसका निर्माण सेठ सूरजमल परिवार ने करवाया था।

उत्तराखंड में गंगा नदी पर बना ऋषिकेश का विख्यात लक्ष्मण झूला केवल इंजीनियरिंग का नमूना नहीं है, बल्कि इसके अस्तित्व में आने के पीछे मां के स्वाभिमान और सेवा भाव की एक बेहद दिलचस्प गाथा छिपी है। इस प्रतिष्ठित झूला पुल का ऐतिहासिक संबंध हरिद्वार के अपर रोड पर मौजूद लगभग 250 वर्ष पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला से गहराई से जुड़ा हुआ है। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दौर में जब बदरीनाथ और केदारनाथ की दुर्गम तीर्थयात्रा शुरू होती थी, तब तेज बहाव वाली उफनती गंगा नदी को पार करना तीर्थयात्रियों के लिए जीवन और मरण का जोखिम भरा संघर्ष हुआ करता था। श्रद्धालुओं के इस कष्ट को महसूस करते हुए दानवीर सेठ सूरजमल परिवार ने गंगा पर मजबूत लोहे के तारों वाला यह ऐतिहासिक झूला पुल तैयार करवाया था। इस पूरे प्रयास का उद्देश्य यही था कि चारधाम यात्रा के लंबे मार्ग पर चलने वाले श्रद्धालुओं को सिर छुपाने के लिए पक्की सुरक्षित छत और नदी पार करने के लिए सुगम मार्ग मिल सके।

नाविक का कड़वा व्यंग्य और मां का स्वाभिमान

इस पुल के निर्माण की पृष्ठभूमि हरिद्वार में संचालित सेठ सूरजमल धर्मशाला के संचालक श्रीनिवास पांडे द्वारा साझा किए गए ऐतिहासिक प्रसंग से स्पष्ट होती है। एक समय सेठ सूरजमल ने अपनी माताजी को बदरीनाथ और केदारनाथ की पवित्र यात्रा पर रवाना किया था। उस कालखंड में गंगा की जलधारा पार करने का एकमात्र जरिया नावें ही थीं। सेठ की मां जब नौका में सवार हुईं और मल्लाह ने नाव को किनारे से आगे बढ़ाया, तब उन्होंने गौर किया कि उनके दल के कुछ साथी पीछे घाट पर ही छूट गए हैं। उन्होंने फौरन मल्लाह से नौका को वापस किनारे की ओर मोड़ने का निवेदन किया। हालांकि नाविक ने साफ मना कर दिया और कहा कि एक बार घाट छोड़ देने के बाद नाव उल्टे पांव नहीं लौटती।

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इसके बावजूद जब सेठ की माता ने साथी यात्रियों के लिए नाव वापस ले जाने की लगातार गुहार लगाई, तो नाविक झुंझला उठा। उसने तंज कसते हुए कड़वे स्वर में कह दिया कि यदि आपको इतनी ही परेशानी महसूस हो रही है, तो अपने लिए खुद का एक अलग पुल बनवा लीजिए। नाविक का यह व्यंग्य बाण सीधे बुजुर्ग मां के आत्मसम्मान पर लगा। उन्होंने उसी क्षण आगे की यात्रा स्थगित करने का निर्णय लिया और बदरी-केदार के दर्शन किए बिना ही उल्टे पांव घर वापसी की राह पकड़ ली।

कलकत्ता वापसी और बेटे के सामने रखा कठिन संकल्प

तीर्थयात्रा बीच में छोड़कर जब सेठ की माता सीधे कोलकाता पहुंचीं, तो बेटे सूरजमल ने यात्रा अधूरी छूटने का कारण पूछा। इस पर मां ने पूरा वाकया सुनाते हुए साफ शब्दों में कहा कि वह बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के दर्शन अब तभी करेंगी, जब गंगा नदी के आर-पार जाने के लिए एक मजबूत पुल तैयार हो जाएगा। अपनी मां के इस अटल संकल्प और स्वाभिमान को सम्मान देने के लिए दानवीर सेठ सूरजमल के परिवार ने ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1929 में गंगा नदी के ऊपर मजबूत तारों वाला भव्य लक्ष्मण झूला पुल बनवाकर तैयार कर दिया।

मरम्मत के लिए उस दौर में एक लाख की सावधि जमा

पुल केवल बना देना ही काफी नहीं था, बल्कि भविष्य में इसके रख-रखाव की पुख्ता व्यवस्था भी सेठ सूरजमल ने पहले ही सुनिश्चित कर दी थी। संचालक श्रीनिवास पांडे के विवरण के अनुसार, पुल की नियमित मरम्मत और देखरेख के लिए सेठ ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के पास एक लाख रुपये की भारी-भरकम राशि फिक्स डिपॉजिट यानी सावधि जमा के रूप में जमा करवाई थी। प्रशासन के साथ बकायदा यह औपचारिक समझौता किया गया था कि इस राशि से मिलने वाले ब्याज के पैसे से ही लक्ष्मण झूला पुल के निरंतर रख-रखाव और मरम्मत का खर्च उठाया जाएगा। इतना ही नहीं, लक्ष्मण झूले का निर्माण कराने से पहले भी इस परोपकारी परिवार ने हरिद्वार तथा लक्सर क्षेत्र में यात्रियों के विश्राम के लिए बड़ी धर्मशालाएं स्थापित की थीं, जो आज भी अडिग खड़ी रहकर तीर्थयात्रियों की सेवा कर रही हैं।

सवाल-जवाब

ऋषिकेश के लक्ष्मण झूले का निर्माण किस वर्ष हुआ था?
लक्ष्मण झूला पुल का निर्माण ब्रिटिश शासनकाल के दौरान वर्ष 1929 में पूरा कराया गया था।
लक्ष्मण झूले का निर्माण किस परिवार ने करवाया था?
इस ऐतिहासिक झूला पुल का निर्माण दानवीर सेठ सूरजमल के परिवार ने करवाया था।
सेठ की माता ने बदरी-केदार यात्रा बीच में क्यों छोड़ दी थी?
नाविक द्वारा अपने साथियों को लेने के लिए नाव वापस मोड़ने से इनकार करने और तंज कसने के कारण उन्होंने यात्रा अधूरी छोड़ दी थी।
नाविक ने सेठ की माता को क्या ताना मारा था?
नाविक ने व्यंग्य करते हुए कहा था कि यदि उन्हें इतनी परेशानी है तो वे अपने लिए अलग पुल बनवा लें।
पुल की मरम्मत के लिए क्या व्यवस्था की गई थी?
सेठ ने तत्कालीन सरकार के पास एक लाख रुपये फिक्स डिपॉजिट में रखकर एग्रीमेंट किया था कि इसके ब्याज से पुल की मरम्मत होगी।
सेठ सूरजमल धर्मशाला कहां स्थित है?
यह लगभग 250 वर्ष पुरानी धर्मशाला हरिद्वार के अपर रोड पर स्थित है।
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टिप्पणियाँ 5

Divya Reddy@divya-reddy·38 मिनट पहले

एक ताने ने इतना ऐतिहासिक काम करवा दिया, ये जानकर बहुत हैरानी हुई। मां का स्वाभिमान और बेटे का संकल्प वाकई कमाल का था।

Arjun Mehta@arjun-mehta·53 मिनट पहले

लक्ष्मण झूले पर खड़े होकर वो हवा महसूस की है, पर कभी सोचा नहीं था कि इसके पीछे एक माँ का ऐसा गुस्सा और जिद होगी। सच में, इतिहास की कहानियाँ कितनी दिलचस्प होती हैं।

Ravikash Gupta@ravikash·53 मिनट पहले

अर्जुन भाई, बात तो सही कही आपने। पर क्या सच में उस नाविक को कभी पता चला होगा कि उसकी एक बात से इतिहास बदल गया?

Rohan Verma@rohan-verma·1 घंटे पहले

एक नाविक के ताने पर इतना बड़ा पुल कोई बनवा देगा, बात थोड़ी हजम नहीं हुई यार।

Karan Malhotra@karan-malhotra·1 घंटे पहले

रोहन भाई, बात भले अजीब लगे पर अहंकार और स्वाभिमान में बड़े काम हो जाते हैं। वैसे ये बताओ, उस नाविक का बाद में क्या हुआ होगा?

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