उत्तराखंड में गंगा नदी पर बना ऋषिकेश का विख्यात लक्ष्मण झूला केवल इंजीनियरिंग का नमूना नहीं है, बल्कि इसके अस्तित्व में आने के पीछे मां के स्वाभिमान और सेवा भाव की एक बेहद दिलचस्प गाथा छिपी है। इस प्रतिष्ठित झूला पुल का ऐतिहासिक संबंध हरिद्वार के अपर रोड पर मौजूद लगभग 250 वर्ष पुरानी सेठ सूरजमल धर्मशाला से गहराई से जुड़ा हुआ है। बीसवीं शताब्दी के आरंभिक दौर में जब बदरीनाथ और केदारनाथ की दुर्गम तीर्थयात्रा शुरू होती थी, तब तेज बहाव वाली उफनती गंगा नदी को पार करना तीर्थयात्रियों के लिए जीवन और मरण का जोखिम भरा संघर्ष हुआ करता था। श्रद्धालुओं के इस कष्ट को महसूस करते हुए दानवीर सेठ सूरजमल परिवार ने गंगा पर मजबूत लोहे के तारों वाला यह ऐतिहासिक झूला पुल तैयार करवाया था। इस पूरे प्रयास का उद्देश्य यही था कि चारधाम यात्रा के लंबे मार्ग पर चलने वाले श्रद्धालुओं को सिर छुपाने के लिए पक्की सुरक्षित छत और नदी पार करने के लिए सुगम मार्ग मिल सके।
नाविक का कड़वा व्यंग्य और मां का स्वाभिमान
इस पुल के निर्माण की पृष्ठभूमि हरिद्वार में संचालित सेठ सूरजमल धर्मशाला के संचालक श्रीनिवास पांडे द्वारा साझा किए गए ऐतिहासिक प्रसंग से स्पष्ट होती है। एक समय सेठ सूरजमल ने अपनी माताजी को बदरीनाथ और केदारनाथ की पवित्र यात्रा पर रवाना किया था। उस कालखंड में गंगा की जलधारा पार करने का एकमात्र जरिया नावें ही थीं। सेठ की मां जब नौका में सवार हुईं और मल्लाह ने नाव को किनारे से आगे बढ़ाया, तब उन्होंने गौर किया कि उनके दल के कुछ साथी पीछे घाट पर ही छूट गए हैं। उन्होंने फौरन मल्लाह से नौका को वापस किनारे की ओर मोड़ने का निवेदन किया। हालांकि नाविक ने साफ मना कर दिया और कहा कि एक बार घाट छोड़ देने के बाद नाव उल्टे पांव नहीं लौटती।
इसके बावजूद जब सेठ की माता ने साथी यात्रियों के लिए नाव वापस ले जाने की लगातार गुहार लगाई, तो नाविक झुंझला उठा। उसने तंज कसते हुए कड़वे स्वर में कह दिया कि यदि आपको इतनी ही परेशानी महसूस हो रही है, तो अपने लिए खुद का एक अलग पुल बनवा लीजिए। नाविक का यह व्यंग्य बाण सीधे बुजुर्ग मां के आत्मसम्मान पर लगा। उन्होंने उसी क्षण आगे की यात्रा स्थगित करने का निर्णय लिया और बदरी-केदार के दर्शन किए बिना ही उल्टे पांव घर वापसी की राह पकड़ ली।
कलकत्ता वापसी और बेटे के सामने रखा कठिन संकल्प
तीर्थयात्रा बीच में छोड़कर जब सेठ की माता सीधे कोलकाता पहुंचीं, तो बेटे सूरजमल ने यात्रा अधूरी छूटने का कारण पूछा। इस पर मां ने पूरा वाकया सुनाते हुए साफ शब्दों में कहा कि वह बदरीनाथ और केदारनाथ धाम के दर्शन अब तभी करेंगी, जब गंगा नदी के आर-पार जाने के लिए एक मजबूत पुल तैयार हो जाएगा। अपनी मां के इस अटल संकल्प और स्वाभिमान को सम्मान देने के लिए दानवीर सेठ सूरजमल के परिवार ने ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1929 में गंगा नदी के ऊपर मजबूत तारों वाला भव्य लक्ष्मण झूला पुल बनवाकर तैयार कर दिया।
मरम्मत के लिए उस दौर में एक लाख की सावधि जमा
पुल केवल बना देना ही काफी नहीं था, बल्कि भविष्य में इसके रख-रखाव की पुख्ता व्यवस्था भी सेठ सूरजमल ने पहले ही सुनिश्चित कर दी थी। संचालक श्रीनिवास पांडे के विवरण के अनुसार, पुल की नियमित मरम्मत और देखरेख के लिए सेठ ने तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत के पास एक लाख रुपये की भारी-भरकम राशि फिक्स डिपॉजिट यानी सावधि जमा के रूप में जमा करवाई थी। प्रशासन के साथ बकायदा यह औपचारिक समझौता किया गया था कि इस राशि से मिलने वाले ब्याज के पैसे से ही लक्ष्मण झूला पुल के निरंतर रख-रखाव और मरम्मत का खर्च उठाया जाएगा। इतना ही नहीं, लक्ष्मण झूले का निर्माण कराने से पहले भी इस परोपकारी परिवार ने हरिद्वार तथा लक्सर क्षेत्र में यात्रियों के विश्राम के लिए बड़ी धर्मशालाएं स्थापित की थीं, जो आज भी अडिग खड़ी रहकर तीर्थयात्रियों की सेवा कर रही हैं।






















