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उत्तर कोरिया की विदेश नीति पर गहराया संकट, बीजिंग और मॉस्को के रुख से किम जोंग उन की बढ़ी मुश्किलेंदुनिया
2 नव॰ 2026, 2:05 pm (2 घंटे पहले)· 0

उत्तर कोरिया की विदेश नीति पर गहराया संकट, बीजिंग और मॉस्को के रुख से किम जोंग उन की बढ़ी मुश्किलें

उत्तर कोरियाई नेतृत्व को चीन और रूस से मिलने वाले कूटनीतिक सहारे में दरारें दिखने लगी हैं, जिससे वॉशिंगटन के साथ वार्ता की योजनाएं खटाई में पड़ती नजर आ रही हैं।

उत्तर कोरियाई नेतृत्व के कूटनीतिक समीकरण हाल के दिनों में उलझते दिखाई दे रहे हैं, जहां अमेरिका के दबाव से निपटने के लिए जिन पुराने सहयोगियों पर सबसे ज्यादा भरोसा था, वहीं से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल पा रहा है। उत्तर कोरिया लंबे समय से चीन और रूस को अपने अंतरराष्ट्रीय रक्षा कवच और कूटनीतिक ढाल के रूप में देखता रहा है। हालांकि, मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों में यह साझेदारी वैसी सहज नहीं रह गई है जैसी पहले समझी जाती थी। न तो मॉस्को की ओर से वॉशिंगटन के साथ वार्ता का कोई ठोस पुल तैयार हो पा रहा है और न ही बीजिंग अपने शीर्ष नेतृत्व की सीधी भागीदारी देकर पहले जैसी तत्परता दिखा रहा है। इन दोनों मोर्चों पर बनी असहज स्थिति ने प्योंगयांग की कूटनीतिक रणनीति के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं।

बीजिंग का ठंडा रुख और सीमावर्ती शहर में सीमित बातचीत

उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन 24 अक्टूबर को अप्रत्याशित रूप से चीन के सीमावर्ती शहर डांडोंग पहुंचे थे। इस यात्रा का मुख्य मकसद चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ सीधे संवाद की जमीन तैयार करना माना जा रहा था, ताकि अमेरिकी नेतृत्व के साथ आगामी बातचीत के लिए एक मजबूत कूटनीतिक ढांचा बनाया जा सके। इसके साथ ही नवंबर में होने वाले एशिया-प्रशांत आर्थिक सहयोग (APEC) सम्मेलन के रणनीतिक मंच पर भी ध्यान केंद्रित था। लेकिन इस यात्रा के दौरान किम जोंग उन की शी जिनपिंग से कोई मुलाकात नहीं हो सकी।

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चीन की तरफ से शीर्ष नेता के बजाय चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चौथे सबसे वरिष्ठ नेता वांग हुनिंग ने किम जोंग उन का स्वागत किया। इस दौरान दोनों नेताओं ने एक युद्ध स्मारक का दौरा किया और एक बस निर्माण इकाई का मुआयना किया। सर्वोच्च स्तर पर सीधी बैठक न होना इस बात का स्पष्ट संदेश माना जा रहा है कि बीजिंग फिलहाल उत्तर कोरियाई नेतृत्व के साथ सार्वजनिक गर्मजोशी दिखाने में सावधानी बरत रहा है और प्योंगयांग की हर योजना पर तुरंत हामी भरने के मूड में नहीं है।

रूस के साथ सैन्य साझेदारी और कूटनीतिक गतिरोध

दूसरी तरफ, किम जोंग उन ने हाल के वर्षों में रूस के साथ अपने सुरक्षा और रणनीतिक गठजोड़ को तेजी से आगे बढ़ाया है। यूक्रेन में जारी संघर्ष के दौरान उत्तर कोरिया ने रूस को भारी मात्रा में संसाधन, सैन्य उपकरण और सैनिक तक मुहैया कराए हैं। इसके बदले में प्योंगयांग को आर्थिक रियायतों और उन्नत सैन्य तकनीक में सहयोग की भारी उम्मीदें थीं। वर्ष 2024 में दोनों पक्षों के बीच एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि पर भी हस्ताक्षर किए गए थे, जिसमें एक-दूसरे को सैन्य सहायता देने के स्पष्ट प्रावधान शामिल किए गए हैं। अमेरिकी कांग्रेस की शोध सेवा के दस्तावेजों में भी दर्ज है कि उत्तर कोरिया ने रूस को भारी मात्रा में गोला-बारूद, बैलिस्टिक मिसाइलें और अपने सैनिक उपलब्ध कराए हैं।

इतने बड़े पैमाने पर सैन्य सहयोग देने के बावजूद किम जोंग उन को रूस से वह राजनीतिक फायदा नहीं मिल सका है, जिसकी वे आस लगाए बैठे थे। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के जरिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ किसी सीधी और सफल बातचीत का रास्ता तैयार होने की जो उम्मीद बांधी गई थी, वह अब तक किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच सकी है। सैन्य गठजोड़ गहरा होने के बावजूद प्योंगयांग के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक गतिरोध जस का तस बना हुआ है।

कोरियाई प्रायद्वीप में तनाव और बीजिंग की चिंताएं

चीन के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द कोरियाई प्रायद्वीप में तेजी से बढ़ता सैन्य तनाव बना हुआ है। उत्तर कोरिया द्वारा लगातार अपने परमाणु हथियारों के जखीरे, उन्नत मिसाइलों और रक्षा तकनीक का विस्तार किया जा रहा है। हथियारों का यह निरंतर विस्तार पूरे क्षेत्र में सुरक्षा अस्थिरता को बढ़ावा दे रहा है। इसके अलावा, रूस के साथ प्योंगयांग की लगातार गहरी होती सैन्य साझेदारी भी बीजिंग के लिए नई रणनीतिक उलझनें पैदा कर रही है।

उत्तर कोरिया की मॉस्को पर बढ़ती निर्भरता से यह अंदेशा भी जन्म ले रहा है कि इस क्षेत्र में चीन का पारंपरिक रणनीतिक प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग चाहता है कि उत्तर कोरिया केवल मिसाइल परीक्षणों और सैन्य ताकत बढ़ाने पर ही जोर न दे, बल्कि अपने आर्थिक सुधारों, व्यापार और बुनियादी विकास की दिशा में भी ठोस कदम उठाए। चीन उत्तर कोरिया का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है, जबकि रूस उसे तकनीकी और सामरिक सहयोग दे रहा है। ऐसे में यदि दोनों सहयोगी देशों के साथ प्योंगयांग के रिश्तों में किसी भी तरह की दूरी या असंतुलन पैदा होता है, तो उत्तर कोरिया की पूरी वैश्विक रणनीति डगमगा सकती है। हालांकि दोनों देशों ने प्योंगयांग से पूरी तरह मुंह नहीं मोड़ा है, लेकिन हालिया घटनाओं ने किम जोंग उन की विदेश नीति पर गहरे सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

सवाल-जवाब

किम जोंग उन 24 अक्टूबर को चीन के किस शहर में गए थे?
किम जोंग उन 24 अक्टूबर को चीन के सीमावर्ती शहर डांडोंग पहुंचे थे।
डांडोंग में किम जोंग उन का स्वागत किसने किया?
चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के चौथे सबसे वरिष्ठ नेता वांग हुनिंग ने उनका स्वागत किया।
क्या इस यात्रा के दौरान किम जोंग उन और शी जिनपिंग की मुलाकात हुई?
नहीं, इस यात्रा के दौरान किम जोंग उन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कोई मुलाकात नहीं हुई।
रूस और उत्तर कोरिया के बीच 2024 में कौन सा महत्वपूर्ण समझौता हुआ था?
दोनों देशों ने 2024 में एक व्यापक रणनीतिक साझेदारी संधि की थी, जिसमें आपसी सैन्य सहायता का प्रावधान शामिल है।
उत्तर कोरिया ने यूक्रेन युद्ध के दौरान रूस को क्या सहायता दी है?
अमेरिकी शोध सेवा के अनुसार, उत्तर कोरिया ने रूस को गोला-बारूद, बैलिस्टिक मिसाइलें और सैनिक उपलब्ध कराए हैं।
उत्तर कोरिया को लेकर चीन की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
चीन की सबसे बड़ी चिंता कोरियाई प्रायद्वीप में बढ़ता सैन्य तनाव और उत्तर कोरिया का निरंतर परमाणु व मिसाइल विस्तार है।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 2

Carlos Mendoza@carlos-mendoza·1 घंटे पहले

वांग हुनिंग से मुलाक़ात और शी जिनपिंग का न मिलना साफ़ दिखाता है कि किम की चालें अब हर बार काम नहीं आ रहीं। जब मैं बीजिंग में था, तब भी उत्तर कोरिया के रवैये को लेकर अधिकारियों के सुर काफ़ी नपे-तुले रहते थे। रूस के साथ मिलकर भी प्योंगयांग को वो नहीं मिल रहा जिसकी उसे असल में दरकार थी।

Li Wei@li-wei·1 घंटे पहले

कार्लोस, बिल्कुल सही कहा आपने। बीजिंग में जब मैं इन मुलाकातों को कवर कर रहा था, तब भी साफ महसूस होता था कि किम का यह पैंतरा अब काम नहीं आने वाला।

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