संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक अधिवेशन के दौरान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच से तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन ने एक बार फिर दक्षिण एशिया और कश्मीर का प्रसंग छेड़ा है। वैश्विक नेताओं की सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने क्षेत्रीय विवादों पर अपने विचार रखे और कश्मीर के मामले को बातचीत के रास्ते सुलझाने पर जोर दिया। यह बयान ऐसे समय में सामने आया जब सभा कक्ष में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ भी उपस्थित थे।
संयुक्त राष्ट्र महासभा में क्या बोले तुर्की के राष्ट्रपति
मंगलवार को महासभा को संबोधित करते हुए रेचेप तैयप एर्दोगन ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र की स्थिरता पर टिप्पणी की। उन्होंने अपने संबोधन में स्पष्ट किया कि दक्षिण एशिया में कश्मीर विवाद सहित तमाम अनसुलझे मसलों को संयुक्त राष्ट्र चार्टर तथा संबंधित प्रस्तावों के दायरे में रखकर वार्ता के माध्यम से हल किया जाना अत्यंत आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों में इस टिप्पणी को तुर्की के पुराने रुख की निरंतरता के रूप में देखा जा रहा है।
एर्दोगन का यह भाषण केवल दक्षिण एशिया तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने वैश्विक राजनीति के कई अन्य ज्वलंत मुद्दों पर भी तुर्की का पक्ष रखा। उन्होंने गाजा में चल रहे सैन्य संघर्ष पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कड़े और प्रभावी कदम उठाने की अपील की। इसके साथ ही उन्होंने फिलिस्तीनी राज्य को पुनः औपचारिक मान्यता दिए जाने और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के ढांचे में व्यापक सुधार किए जाने की मांग दोहराई।
फिलिस्तीन और साइप्रस पर भी रखा अपना रुख
अपने विस्तृत भाषण में तुर्की के राष्ट्रपति ने फिलिस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास की अनुपस्थिति को भी रेखांकित किया। उन्होंने जानकारी दी कि महमूद अब्बास लगातार दूसरे वर्ष इस महत्वपूर्ण वैश्विक सम्मेलन में व्यक्तिगत रूप से भाग नहीं ले सके हैं। एर्दोगन ने स्पष्ट किया कि उनका देश अंतरराष्ट्रीय मंचों पर फिलिस्तीनी जनता के अधिकारों और उनकी मांगों को पूरी मजबूती से उठाता रहेगा। उन्होंने गाजा क्षेत्र के हालात का जिक्र करते हुए इजरायल के सैन्य अभियानों की कड़े शब्दों में निंदा की और वहां पनपे मानवीय संकट को अत्यंत गंभीर करार दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने तुर्की साइप्रस के नागरिकों के अंतरराष्ट्रीय अलगाव को समाप्त करने की आवश्यकता पर भी बल दिया।
2019 के बाद से लगातार बयानों का सिलसिला
तुर्की के राष्ट्रपति द्वारा संयुक्त राष्ट्र महासभा में कश्मीर का उल्लेख किया जाना कोई पहली घटना नहीं है। पिछले कई वर्षों से वे अपने वार्षिक संबोधनों में इस विषय को अलग-अलग संदर्भों और लहजों में शामिल करते रहे हैं। इस सिलसिले की शुरुआत विशेष तौर पर वर्ष 2019 में देखी गई थी, जब भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 370 के तहत लागू विशेष दर्जे को समाप्त करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया था।
वर्ष 2019 में आयोजित 74वीं संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के दौरान एर्दोगन ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि 80 लाख लोग लगभग नाकाबंदी की स्थिति में हैं। उन्होंने उस समय यह आरोप भी लगाया था कि वैश्विक समुदाय ने पिछले 72 वर्षों के लंबे अंतराल में इस विवाद के समाधान पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया है।
कूटनीतिक प्रतिक्रियाएं और नई दिल्ली का रुख
साल 2019 में दिए गए उस बयान पर भारत की ओर से बेहद कड़ा कूटनीतिक विरोध दर्ज कराया गया था। नई दिल्ली ने तब स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी थी कि तुर्की को दूसरे संप्रभु राष्ट्रों की आंतरिक सीमाओं और अखंडता का सम्मान करना चाहिए तथा घरेलू विषयों में अवांछित हस्तक्षेप से पूरी तरह बचना चाहिए। इस तल्खी का असर द्विपक्षीय संबंधों पर भी पड़ा, जिसके चलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रस्तावित तुर्की यात्रा रद्द हो गई थी और भारत ने तुर्की के साथ अपने रक्षा सहयोग को भी काफी सीमित करने के कदम उठाए थे।
इसके बावजूद एर्दोगन ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपने रुख में बदलाव नहीं किया। वर्ष 2021 के अपने संबोधन में भी उन्होंने इस मसले को 74 वर्षों से जारी समस्या बताते हुए एक ऐसा समाधान खोजने की पैरवी की थी जो स्थानीय लोगों की आकांक्षाओं के अनुरूप हो। भारत सरकार लगातार यह दोहराती रही है कि जम्मू-कश्मीर और लद्दाख का संपूर्ण क्षेत्र भारत का अभिन्न और अविभाज्य अंग है और इसमें किसी भी तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप अथवा अंतरराष्ट्रीय मंच पर अनावश्यक बयानबाजी की कोई गुंजाइश नहीं है।





















