डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस लौटने के बाद से ही टैरिफ यानी आयात शुल्क उनके आर्थिक एजेंडे का सबसे प्रमुख हथियार बना हुआ है। ट्रंप का लगातार तर्क रहा है कि विदेशी वस्तुओं पर सीमा शुल्क बढ़ाने से अमेरिका में विनिर्माण क्षेत्र को मजबूती मिलती है और नए रोजगार पैदा होते हैं। हालांकि, आर्थिक विश्लेषकों और आलोचकों का मानना है कि इस नीति ने अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए दैनिक सामान महंगे कर दिए हैं और वैश्विक आपूर्ति शृंखला को गहरा नुकसान पहुंचाया है। व्यापार के बुनियादी नियमों के तहत टैरिफ किसी उत्पाद के मूल्य का एक निश्चित प्रतिशत होता है। उदाहरण के लिए, यदि 10 डॉलर के उत्पाद पर 10% का टैरिफ लागू होता है, तो उस पर 1 डॉलर का अतिरिक्त टैक्स जुड़ जाता है और कुल लागत बढ़कर 11 डॉलर हो जाती है। यह कर विदेशी सामान देश में लाने वाली कंपनियां सीधे सरकार को चुकाती हैं। इसके बाद कंपनियां इस अतिरिक्त बोझ को अपने ग्राहकों पर डाल देती हैं या फिर विदेशी आयात में कटौती करने लगती हैं। ट्रंप का मानना है कि इससे न केवल सरकारी राजस्व बढ़ता है, बल्कि विदेशी कंपनियों को अमेरिका में निवेश करने की प्रेरणा भी मिलती है।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला और आपातकालीन शक्तियों पर कानूनी रोक
फरवरी 2026 में अमेरिका के उच्चतम न्यायालय यानी सुप्रीम कोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप की टैरिफ रणनीति को एक बड़ा झटका दिया। अदालत ने फैसला सुनाया कि ट्रंप ने बिना कांग्रेस की मंजूरी के विशिष्ट देशों पर शुल्क लगाने के लिए आपातकालीन शक्तियों का इस्तेमाल करके अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक आदेश ने उन सभी शुल्कों को प्रभावित किया जो इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (आईईईपीए) के तहत लागू किए गए थे। इसमें वर्ष 2025 की शुरुआत में मेक्सिको, कनाडा और चीन पर लगाए गए शुरुआती टैरिफ शामिल थे। इसके अलावा, अप्रैल 2025 में तथाकथित 'लिबरेशन डे' के अवसर पर घोषित वे दरें भी अमान्य हो गईं, जिनके तहत कंबोडिया, वियतनाम और मलेशिया सहित दर्जनों देशों पर 50% तक का भारी शुल्क लगाया गया था। इस न्यायिक फैसले के बाद, प्रभावित आयातकों और कंपनियों को अरबों डॉलर की राशि वापस लौटानी पड़ी है।
वैकल्पिक व्यापार कानूनों का सहारा और नई टैरिफ दरें
अदालती झटके के बावजूद अमेरिकी प्रशासन ने अपने टैरिफ एजेंडे को रोका नहीं, बल्कि वैकल्पिक कानूनी रास्तों की तलाश शुरू कर दी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के तुरंत बाद, ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 के सेक्शन 122 का इस्तेमाल करते हुए सभी वैश्विक आयातों पर 10% का अस्थायी टैरिफ लागू कर दिया गया। ये अस्थायी शुल्क 24 जुलाई को समाप्त हो गए, लेकिन प्रशासन ने ब्रिटेन, यूरोपीय संघ और चीन जैसे शीर्ष 60 अमेरिकी व्यापारिक साझेदारों के सामान पर 10% से 12.5% के नए टैरिफ लगा दिए। इस बार यह कार्रवाई ट्रेड एक्ट ऑफ 1974 के सेक्शन 301 के तहत की गई, जिसमें सहयोगी देशों पर जबरन श्रम के मुद्दों से निपटने में विफल रहने का आरोप लगाया गया। इसके खिलाफ अमेरिका के 25 डेमोक्रेटिक शासित राज्यों ने अदालत में मुकदमा दायर किया है, जिसमें इन शुल्कों को मनमाना, अनिश्चित और कानून के विपरीत बताया गया है। साथ ही आरोप लगाया गया है कि जबरन श्रम के मुद्दे को केवल टैरिफ जारी रखने का एक बहाना बनाया गया है। इसके अलावा, ट्रंप ने ब्राजील की नीतियों को अमेरिकी व्यापार के लिए हानिकारक बताते हुए सेक्शन 301 के तहत कुछ ब्राजीलियाई वस्तुओं पर 25% शुल्क लगाया, जबकि कनाडा पर अमेरिकी कारों, डेयरी और अल्कोहल के साथ असमान व्यवहार का आरोप लगाते हुए टैरिफ एक्ट ऑफ 1930 के सेक्शन 338 के तहत 50% का प्रतिशोध शुल्क लगा दिया।
ब्रिटेन के साथ विशेष समझौता और वैश्विक स्टील बाजार
व्यापारिक तनाव के बीच ब्रिटेन ने जून 2025 में ही अमेरिका के साथ एक विशेष समझौता कर लिया था, जिससे अधिकांश वस्तुओं पर 10% की दर तय हुई थी। वर्ष 2024 में ब्रिटेन ने अमेरिका को लगभग 58 अरब पाउंड के सामान का निर्यात किया था, जिसमें मुख्य रूप से गाड़ियां, मशीनरी और दवाएं शामिल थीं। वर्ष 2025 के समझौते के तहत 10% की यह रियायती दर ब्रिटेन से हर साल निर्यात होने वाली शुरुआती 100,000 गाड़ियों पर ही लागू होती है, जो कि 2024 की कुल बिक्री के बराबर है। इससे अधिक गाड़ियां भेजने पर 25% का मानक शुल्क लागू होता है। इसी तरह, अमेरिकी बाजार में ब्रिटिश स्टील पर 25% का शुल्क है, जबकि दुनिया के बाकी हिस्सों से आने वाले स्टील और एल्युमीनियम पर 50% की भारी दर लागू है। उल्लेखनीय है कि यूरोपीय संघ के बाद अमेरिका दुनिया में स्टील का सबसे बड़ा आयातक है, जो मुख्य रूप से कनाडा, ब्राजील, मेक्सिको और दक्षिण कोरिया से आयात करता है।
महंगाई की मार, कॉर्पोरेट नीतियां और वैश्विक प्रभाव
टैरिफ का सीधा असर उपभोक्ताओं की जेब पर देखा जा रहा है। टारगेट, वॉलमार्ट और एडिडास जैसी प्रमुख खुदरा कंपनियों ने स्पष्ट किया है कि वे बढ़े हुए सीमा शुल्क का बोझ अमेरिकी ग्राहकों पर डालेंगे। इसके चलते खिलौने, घरेलू उपकरण, फर्निचर और कई खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ गई हैं। विदेशी कलपूर्जों का उपयोग करके अमेरिका में बनाए जाने वाले सामान भी महंगे हो गए हैं। अक्टूबर 2025 में गोल्डमैन सैक्स के एक अध्ययन से सामने आया कि टैरिफ लागत का लगभग 55% हिस्सा सीधे अमेरिकी उपभोक्ताओं से वसूला जा रहा है। वहीं अप्रैल में फेडरल रिजर्व के अध्ययन में कहा गया कि वर्ष 2025 के व्यापक शुल्कों के कारण महंगाई में अचानक तेज उछाल आया है। दूसरी ओर, व्हाइट हाउस का रुख है कि इन नीतियों का दीर्घकालिक लाभ मिलेगा और कंपनियां अमेरिका में बड़े पैमाने पर विनिर्माण निवेश करेंगी। हालांकि व्यापारिक बाधाओं के बावजूद वर्ष 2025 में अमेरिका के कुल आयात में 4% की वृद्धि दर्ज की गई। वैश्विक स्तर पर, शुरुआती घोषणाओं के समय शेयर बाजारों और अमेरिकी डॉलर में भारी गिरावट आई थी। यद्यपि वित्तीय बाजार काफी हद तक संभल चुके हैं, लेकिन अनिश्चितता के कारण कई देश वैकल्पिक बाजारों की तलाश कर रहे हैं। जनवरी 2026 में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) ने चेतावनी दी कि इन शुल्कों ने वैश्विक आर्थिक गतिविधियों को सुस्त कर दिया है, जिसे ईरान युद्ध के कारण तेल और उर्वरक की आपूर्ति में आई रुकावटों ने और अधिक गंभीर बना दिया है।



















