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बिहार में 125 यूनिट मुफ्त बिजली सब्सिडी छोड़ने की अपील पर लोगों में बहस, पात्रता और वादे पर उठे सवालबिहार
4 नव॰ 2026, 1:36 pm (3 मिनट पहले)· 0

बिहार में 125 यूनिट मुफ्त बिजली सब्सिडी छोड़ने की अपील पर लोगों में बहस, पात्रता और वादे पर उठे सवाल

बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी द्वारा सक्षम परिवारों और आयकरदाताओं से 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सब्सिडी स्वेच्छा से छोड़ने की अपील के बाद बेगूसराय में लोगों की राय बंट गई है।

बिहार में 125 यूनिट मुफ्त बिजली योजना को लेकर अब एक नई सार्वजनिक बहस छिड़ गई है। राज्य के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने संपन्न परिवारों और आयकरदाताओं से स्वेच्छा से बिजली सब्सिडी का लाभ छोड़ने का आह्वान किया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि जो नागरिक आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उन्हें खुद आगे आकर यह लाभ छोड़ देना चाहिए। इससे बचने वाले सरकारी धन का उपयोग बिहार के समग्र विकास और शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने में किया जा सकेगा। इस अपील के सामने आने के बाद बेगूसराय समेत राज्य भर के आम नागरिकों, युवाओं और व्यापारियों के बीच मिली-जुली प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं।

सक्षम वर्गों द्वारा स्वेच्छा से त्याग का समर्थन

समाज के एक बड़े वर्ग का मानना है कि मुख्यमंत्री का यह आह्वान जनकल्याण और सरकारी संसाधनों के सही इस्तेमाल के लिहाज से तर्कसंगत है। स्नातक छात्र अमित कुमार का कहना है कि आर्थिक रूप से मजबूत लोगों को अपनी जिम्मेदारी समझते हुए खुद ही इस योजना का लाभ छोड़ देना चाहिए। उनके अनुसार, कल्याणकारी योजनाओं का असली लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े गरीब और जरूरतमंद परिवारों तक पहुंचना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि व्यवस्था को पारदर्शी बनाए रखने के लिए सरकार को सक्षम और वंचित परिवारों की पहचान हेतु स्पष्ट दिशा-निर्देश तय करने चाहिए।

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छात्र नेता विश्वजीत कुमार ने भी मुख्यमंत्री की इस पहल का समर्थन किया है। उनका कहना है कि जो लोग आयकर के दायरे में आते हैं या सरकारी सेवा में कार्यरत हैं, उन्हें 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सब्सिडी नहीं लेनी चाहिए। जब संपन्न वर्ग इस सुविधा का त्याग करेगा, तभी वास्तविक रूप से जरूरतमंद परिवारों को राहत देने का सरकारी संकल्प पूरी तरह साकार हो सकेगा।

इसी तरह मोहम्मद आलम का भी स्पष्ट मत है कि सरकारी सेवा में कार्यरत अधिकारियों, कर्मचारियों और नियमित करदाताओं को खुद पहल करते हुए मुफ्त बिजली का अधिकार छोड़ देना चाहिए, ताकि राज्य के सीमित संसाधनों पर गैर-जरूरी दबाव न पड़े।

राज्य के विकास और एलपीजी मॉडल से तुलना

पूर्व सरकारी अधिकारी प्रिया रंजन कुमार ने मुख्यमंत्री की अपील को राज्य के दीर्घकालिक विकास से जुड़ा कदम बताया है। उनका विश्लेषण है कि सरकारी सेवाओं में कार्यरत लोग, निजी क्षेत्र में अच्छा वेतन पाने वाले पेशेवर और नियमित आयकरदाता आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर हैं। ऐसे संपन्न नागरिकों को सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हुए स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ने के लिए आगे आना चाहिए।

प्रिया रंजन कुमार ने इस पहल की तुलना पूर्व में शुरू की गई रसोई गैस सब्सिडी छोड़ने की राष्ट्रीय मुहिम से की। उनका कहना है कि जिस तरह संपन्न लोगों ने एलपीजी पर मिलने वाली सब्सिडी छोड़ी थी और उसका सकारात्मक प्रभाव दिखाई दिया, उसी तरह यदि सक्षम परिवार बिजली सब्सिडी छोड़ते हैं तो सरकार उस बचत राशि को बिहार के बुनियादी ढांचे और जनसुविधाओं के विस्तार में लगा सकेगी।

योजना की पात्रता और वादे से मुकरने पर उठते सवाल

दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री की इस अपील के बाद सरकार की योजना प्रक्रिया और प्राथमिकताओं पर भी तीखे सवाल खड़े किए जा रहे हैं। स्थानीय नागरिक मुकेश कुमार सिन्हा ने सरकार की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जताते हुए कहा कि योजना शुरू करने से पहले ही इस बात पर विचार क्यों नहीं किया गया कि इसका पात्र कौन है और अपात्र कौन। उनका कहना है कि जब सरकार पहले सभी के लिए 125 यूनिट बिजली मुफ्त देने का ऐलान करती है और फिर योजना लागू होने के बाद लोगों से सब्सिडी छोड़ने का आग्रह करती है, तो इससे आम जनता के बीच गलत और विरोधाभासी संदेश जाता है।

स्थानीय व्यवसायी राकेश कुमार सिन्हा ने भी इस मुद्दे पर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जब सरकार ने 125 यूनिट मुफ्त बिजली देने की घोषणा की थी, तब नीतिगत स्तर पर सभी पहलुओं का बारीकी से अध्ययन किया जाना चाहिए था। अब अचानक घोषणा के बाद इस तरह की अपील करना ऐसा प्रतीत होता है मानो सरकार अपने मूल वादे से पीछे हटने की कोशिश कर रही हो।

राकेश कुमार सिन्हा ने जोर देकर कहा कि यदि सरकार संपन्न और जरूरतमंद परिवारों के बीच अंतर करना ही चाहती है, तो इसके लिए एक ठोस और स्पष्ट पैमाना पहले से निर्धारित होना चाहिए। नीतिगत स्तर पर यह पारदर्शी होना जरूरी है कि किस आय या संपत्ति सीमा के आधार पर किसी परिवार को सक्षम या अक्षम माना जाएगा, ताकि बाद में कोई असमंजस न रहे।

जनमत में बंटी राय और आगे की राह

कुल मिलाकर बिहार में 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सब्सिडी को लेकर जनमत दो स्पष्ट धाराओं में बंटा नजर आ रहा है। एक पक्ष का दृढ़ विश्वास है कि संपन्न लोगों, करदाताओं और सरकारी कर्मियों को नैतिक आधार पर सब्सिडी छोड़कर गरीबों के उत्थान और राज्य के विकास में भागीदार बनना चाहिए। वहीं, दूसरा पक्ष इसे प्रशासनिक अपरिपक्वता मानते हुए यह सवाल कर रहा है कि यदि पात्रता तय करनी ही थी, तो योजना के शुभारंभ के समय ही इसके कड़े नियम और मानक क्यों नहीं बनाए गए।

सवाल-जवाब

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने किन लोगों से बिजली सब्सिडी छोड़ने की अपील की है?
मुख्यमंत्री ने संपन्न परिवारों, आयकरदाताओं और आर्थिक रूप से सक्षम नागरिकों से 125 यूनिट मुफ्त बिजली की सब्सिडी स्वेच्छा से छोड़ने की अपील की है।
सब्सिडी छोड़ने से बचने वाले पैसे का सरकार किस तरह इस्तेमाल करना चाहती है?
सरकार की योजना है कि इस राशि का उपयोग बिहार के समग्र विकास और राज्य की शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में किया जाए।
योजना के समर्थकों का इस अपील को लेकर क्या तर्क है?
समर्थकों का मानना है कि करदाताओं और सरकारी कर्मियों को सब्सिडी छोड़नी चाहिए ताकि कल्याणकारी योजनाओं का असली लाभ सिर्फ गरीब और जरूरतमंद परिवारों को मिले।
व्यवसायियों और आलोचकों ने सरकार से क्या मुख्य सवाल पूछा है?
आलोचकों का सवाल है कि 125 यूनिट मुफ्त बिजली की घोषणा करते समय ही सक्षम और जरूरतमंद परिवारों की पात्रता तय करने के स्पष्ट नियम क्यों नहीं बनाए गए।
क्या बिजली सब्सिडी छोड़ना कानूनी रूप से अनिवार्य कर दिया गया है?
नहीं, मुख्यमंत्री ने केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों से स्वेच्छा से सब्सिडी छोड़ने का अनुरोध किया है; यह अनिवार्य नहीं किया गया है।
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