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बिहार में ब्राह्मण कल्याण बोर्ड और ईडब्ल्यूएस सुधार की गुहार, राजधानी में जुटी भीड़ ने रखी 15 सूत्री मांगेंबिहार
1 नव॰ 2026, 10:40 pm (1 घंटे पहले)· 0

बिहार में ब्राह्मण कल्याण बोर्ड और ईडब्ल्यूएस सुधार की गुहार, राजधानी में जुटी भीड़ ने रखी 15 सूत्री मांगें

बिहार की राजधानी में जुटे ब्राह्मण समुदाय के प्रतिनिधियों ने कल्याण बोर्ड के गठन, जनसंख्या आधारित हिस्सेदारी और भूमिहीनता के संकट को लेकर राजभवन तक मार्च निकाला।

बिहार की राजधानी में पारंपरिक गुलाबी पाग पहने हजारों लोगों के जमावड़े ने सामाजिक सुरक्षा, शैक्षणिक उपेक्षा और घटती कृषि जोत के मुद्दों को केंद्र में लाकर एक नई बहस छेड़ दी है। लोक मंच के तत्वावधान में आयोजित इस मौन संकल्प मार्च के जरिए समुदाय के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि आर्थिक तंगहाली और राजनीतिक अनदेखी ने उनके अस्तित्व के सामने गंभीर चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। मिलर ग्राउंड से शुरू होकर ऐतिहासिक शहीद स्मारक तक पहुंचे इस पैदल मार्च में शामिल लोगों ने शासन को आगाह किया कि जमीनी हकीकत को स्वीकार किए बिना समावेशी विकास का दावा अधूरा रहेगा। कार्यक्रम के समापन पर राज्यपाल को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा गया, जिसमें तत्काल नीतिगत हस्तक्षेप की मांग की गई।

मिलर ग्राउंड से शहीद स्मारक तक एकजुटता का प्रदर्शन

आयोजन की शुरुआत मिलर ग्राउंड में आयोजित एक विशाल सभा से हुई, जहां राज्य के दूर-दराज के जनपदों से आए लोगों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। सभा के बाद अनुशासित तरीके से निकाला गया मौन मार्च जब राजधानी की मुख्य सड़कों से गुजरा, तो मार्ग पर जेसीबी मशीनों से फूलों की पंखुड़ियों की वर्षा की गई। पूरी पदयात्रा के दौरान किसी तरह की नारेबाजी से परहेज करते हुए शांतिपूर्ण तरीके से संदेश देने का प्रयास किया गया। गुलाबी रंग की पारंपरिक पाग पहने प्रतिभागियों की कतारों ने सांस्कृतिक गरिमा के साथ अपनी बात शासन तक पहुंचाने का रास्ता चुना।

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ऐतिहासिक स्मारक के चयन के पीछे का व्यापक संदेश

इस मौन प्रदर्शन के समापन स्थल के रूप में 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के अमर सेनानियों को समर्पित शहीद स्मारक को चुने जाने का भी एक खास सामाजिक संदर्भ था। पूर्व मुखिया प्रमोद कुमार मिश्र ने इस चयन के पीछे की सोच को स्पष्ट करते हुए कहा कि सात शहीदों की वह स्थली विभिन्न पृष्ठभूमि के लोगों के संयुक्त बलिदान का प्रतीक है। उन्होंने जोर दिया कि इस पहल का मकसद किसी अन्य वर्ग या शासन तंत्र का विरोध करना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहकर अपनी पीड़ा साझा करना है। इस कदम से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि समुदाय सबको साथ लेकर चलने की राष्ट्रीय भावना में विश्वास रखता है और उस पर संकीर्णता का ठप्पा लगाना अनुचित है।

15 सूत्री मांगपत्र में कल्याण बोर्ड और आरक्षण की समीक्षा

लोक मंच मधेपुरा के जिला संयोजक राजेश कुमार झा ने ज्ञापन में दर्ज प्रमुख विषयों को साझा किया। उन्होंने रेखांकित किया कि अन्य प्रांतों में जिस प्रकार से विप्र समुदाय के लिए विशेष संरचनाएं बनाई गई हैं, उसी प्रारूप पर यहां भी स्वतंत्र कल्याण बोर्ड स्थापित किया जाना समय की मांग है। इसके अतिरिक्त, ईडब्ल्यूएस प्रावधानों को व्यावहारिक बनाने और आबादी के अनुपात में संसाधनों व पदों पर उचित भागीदारी सुनिश्चित करने का आग्रह किया गया। प्रतिनिधिमंडल ने यह भी उठाया कि वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की सीमाओं के कारण गोस्वामी और गिरि समाज जैसे कई अन्य पारंपारिक समूह भी बुनियादी लाभों से वंचित रह गए हैं, जिनके संरक्षण के लिए अलग से प्रभावी नीतियां बनाई जानी चाहिए।

संस्कृत शिक्षा की बदहाली और सहरसा की धरोहर का प्रश्न

ज्ञापन में राज्य के पारंपरिक विद्या केंद्रों की बदहाली पर गहरी चिंता प्रकट की गई। मधेपुरा संयोजक ने कहा कि राज्य भर में फैले संस्कृत विद्यालयों को प्रशासनिक और वित्तीय मदद देकर पुनर्जीवित किया जाना आवश्यक है। इसके साथ ही सहरसा स्थित भारती-मंडन विश्वविद्यालय के कायाकल्प की मांग को प्रमुखता से उठाया गया। आयोजकों का कहना था कि मंडन मिश्र और विदुषी भारती के ऐतिहासिक दार्शनिक विमर्श से जुड़ी इस पावन भूमि की विरासत को प्रशासनिक उपेक्षा का शिकार नहीं होने दिया जा सकता। प्राचीन ज्ञान-विज्ञान और शास्त्रार्थ परंपरा को संरक्षित करने के लिए इस संस्थान को आधुनिक संसाधनों से संपन्न करना अनिवार्य है।

राजनीतिक उपेक्षा और घटती जमीन का दर्दनाक सच

ग्रामीण स्तर से आए प्रतिनिधियों ने समुदाय के तेजी से बदलते आर्थिक ताने-बाने को आंकड़ों के आईने में रखा। पूर्व सरपंच धर्मनारायण ठाकुर ने कहा कि सत्ता के गलियारों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व न मिलने के कारण समाज के भीतर लाचारी बढ़ी है। वहीं प्रदर्शन में शामिल सुबोध कुमार चौधरी ने भूमि संकट की भयावहता बयां करते हुए कहा,

"पहले हम 80 एकड़ में थे, अभी 80 डिसमिल के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं."
उन्होंने चेताया कि बड़े भूखंडों के स्वामी रहे परिवारों के पास आज आवासीय और मामूली खेती लायक जमीन भी नहीं बची है, जिसके चलते नई पीढ़ी गहरे संकट का सामना कर रही है।

अधिकांश आबादी भूमिहीन, राष्ट्रीय अवकाश की भी उठी मांग

मंच से साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक स्थिति इतनी विकट हो चुकी है कि समुदाय का एक बहुत बड़ा हिस्सा पूरी तरह भूमि विहीन हो चुका है। देवेंद्र झा उर्फ सुलताना जी ने दावा किया कि साठ प्रतिशत से अधिक लोग अब भूमिहीनता के दौर में पहुंच चुके हैं। उन्होंने साफ किया कि यह आयोजन किसी के खिलाफ मोर्चा खोलने के लिए नहीं, बल्कि नीति निर्माताओं को आत्ममंथन का अवसर देने के लिए था। वहीं दूसरी तरफ, ध्रुव कुमार झा ने बताया कि पिछले छह महीनों से लोक मंच के संस्थापक आशीष कुमार झा बब्बू की अगुवाई में इस जनचेतना अभियान का खाका तैयार किया जा रहा था। उन्होंने मांग रखी कि भगवान परशुराम के जन्मोत्सव पर केंद्र और राज्य स्तर पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाए ताकि सांस्कृतिक चेतना को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिल सके।

सवाल-जवाब

पटना में आयोजित मौन संकल्प पदयात्रा का नेतृत्व किसने किया?
इस पदयात्रा का नेतृत्व लोक मंच के संस्थापक आशीष कुमार झा 'बब्बू' ने किया, जिसकी रूपरेखा पिछले छह महीने से तैयार की जा रही थी।
पदयात्रा में शामिल लोगों ने शासन के सामने कितनी मांगें रखीं?
प्रदर्शनकारियों ने अपनी सामाजिक, आर्थिक और शैक्षणिक समस्याओं के निवारण हेतु 15 सूत्री मांगों का ज्ञापन राज्यपाल को सौंपा।
प्रदर्शन के लिए शहीद स्मारक को समापन स्थल क्यों चुना गया?
पूर्व मुखिया प्रमोद कुमार मिश्र के अनुसार, 1942 के सात शहीदों का यह स्मारक सर्वसमाज के संयुक्त बलिदान का प्रतीक है, जो एकता और सर्वसमावेशी सोच को दर्शाता है।
प्रदर्शनकारियों ने भूमि संकट को लेकर क्या आंकड़े पेश किए?
सुबोध कुमार चौधरी ने 80 एकड़ से घटकर 80 डिसमिल पर आने की बात कही, जबकि देवेंद्र झा ने दावा किया कि 60 प्रतिशत से अधिक लोग भूमिहीन हो चुके हैं।
ज्ञापन में शिक्षा और संस्कृति से जुड़ी कौन सी प्रमुख मांगें शामिल हैं?
सहरसा में भारती-मंडन विश्वविद्यालय का पुनरुद्धार, संस्कृत विद्यालयों का सुदृढ़ीकरण और भगवान परशुराम जयंती पर राष्ट्रीय अवकाश की मांग उठाई गई।
संपादकीय नीति सुधार नीति

टिप्पणियाँ 5

Arjun Mehta@arjun-mehta·10 मिनट पहले

राजधानी में गुलाबी पाग पहनकर इतनी बड़ी भीड़ ने शांति से मार्च निकाला, यह देखना दिलचस्प था। क्या सरकार सच में इनकी पंद्रह सूत्री मांगों पर कोई फैसला लेगी?

Ayesha Siddiqui@ayesha-siddiqui·9 मिनट पहले

अर्जुन जी, मार्च के दौरान जेसीबी से फूलों की पंखुड़ियाँ बरसाना मुझे बड़ा अजीब लगा, कौन करता है ऐसा?

Ravikash Gupta@ravikash·31 मिनट पहले

बिहार में आर्थिक तंगी और जमीन घटने की बात खुलकर सामने आ रही है, जिसका असर स्टार्टअप्स और छोटे निवेश पर भी दिख सकता है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·53 मिनट पहले

बिना किसी नारेबाज़ी के इस तरह शांति से ज्ञापन देना वाकई असर छोड़ता है। कई बार भीड़ जुटाकर शक्ति प्रदर्शन से बेहतर होता है कि नियम और दायरे में रहकर अपनी बात सीधे राज्यपाल तक पहुँचाई जाए।

Rohan Verma@rohan-verma·52 मिनट पहले

करण भाई, बात तो सही है। नारे लगाने से सिर्फ शोर होता है, पर शांति से मार्च निकाल कर राज्यपाल को ज्ञापन देना प्रशासन पर ज्यादा असर डालता है।

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