संगीत की दुनिया सीमाओं और भौगोलिक दायरों में कभी नहीं बंधती, और कुछ दुर्लभ आवाजें सरहदों के पार जाकर सीधे लोगों की रूह को छू लेती हैं। लोक गायिका रेशमा की आवाज का जादू भी कुछ ऐसा ही था, जिसमें राजस्थान की मिट्टी की महक, दर्द और एक बेमिसाल कशिश महसूस होती थी। रेशमा ने अपने जीवन का अधिकांश समय पाकिस्तान में गुजारा, लेकिन भारतीय संगीत प्रेमियों से उन्हें हमेशा अटूट स्नेह मिला। वर्ष 1983 में प्रदर्शित हुई फिल्म 'हीरो' का अमर गीत 'लंबी जुदाई' उनके गायन की सबसे बड़ी पहचान बन गया। इस दर्द भरे गीत के सुर जब भी कानों में पड़ते हैं, तो सुनने वालों की आंखें आज भी नम हो उठती हैं।
बीकानेर के लोहा गांव से कराची तक का सफर
सदाबहार गीत 'लंबी जुदाई' को अपनी अनूठी आवाज देने वाली रेशमा का जन्म 1 जनवरी 1947 को राजस्थान में बीकानेर के समीप स्थित लोहा गांव में एक बंजारा परिवार में हुआ था। जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा हुआ, तब रेशमा की आयु केवल एक महीने थी और उनका परिवार सरहद पार पाकिस्तान चला गया। इसके बाद उनका परिवार कराची में ही स्थायी रूप से बस गया। रेशमा ने बचपन में ही बेहद छोटी उम्र से गायन शुरू कर दिया था। वे सूफी संतों की मजारों पर जाकर पूरी तन्मयता से सूफी कलाम गाया करती थीं। उनकी प्राकृतिक आवाज में ऐसा सम्मोहन था कि राह चलते लोग ठहरकर उन्हें सुनने लगते थे। विशेष बात यह थी कि रेशमा ने कभी संगीत की कोई औपचारिक शास्त्रीय तालीम नहीं ली थी।
रेडियो पाकिस्तान और सूफी गायकी में पहला बड़ा मुकाम
रेशमा की गायकी के सफर में सबसे अहम मोड़ उस समय आया, जब 12 वर्ष की उम्र में पाकिस्तानी रेडियो और टेलीविजन प्रोड्यूसर सलीम गिलानी की नजर उनकी प्रतिभा पर पड़ी। सलीम गिलानी ने इस कच्ची लेकिन बेहद असरदार आवाज के हुनर को तुरंत भांप लिया और उन्हें एक व्यापक मंच उपलब्ध कराया। इसके बाद वर्ष 1968 में रेशमा ने रेडियो पाकिस्तान के लिए 'लाल मेरी पत रखियो...' गाया। इस प्रसिद्ध सूफी गीत ने उन्हें रातों-रात व्यापक लोकप्रियता दिलाई और उन्हें एक प्रतिष्ठित सूफी गायिका के रूप में स्थापित कर दिया। इस सफलता के बाद रेशमा ने जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी आवाज की गूंज पाकिस्तान के साथ-साथ भारत में भी संगीत प्रेमियों के दिलों पर छाने लगी, क्योंकि उनके गायन में बनावटीपन या दिखावे की जगह दिल से उपजे सच्चे जज्बात होते थे।
राज कपूर के समारोह में मुलाकात और सुभाष घई का प्रस्ताव
रेशमा के संगीत सफर का सबसे ऐतिहासिक अध्याय वर्ष 1983 में जुड़ा, जब फिल्म निर्देशक सुभाष घई की फिल्म 'हीरो' सिनेमाघरों में आई थी। सुभाष घई ने पहली बार वर्ष 1982 में राज कपूर की एक पार्टी के दौरान रेशमा को गाते हुए सुना था। उनकी रूहानी और भावपूर्ण आवाज ने सुभाष घई को इतना ज्यादा प्रभावित किया कि उन्होंने तुरंत तय कर लिया कि वे अपनी आगामी फिल्म में रेशमा से गीत जरूर गवाएंगे।
हालांकि, रेशमा आरंभ में किसी बंद स्टूडियो के भीतर गाने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थीं। उनका स्पष्ट कहना था कि वे चारदीवारी की जगह खुले वातावरण में गाना अधिक सहजता से पसंद करती हैं। निर्देशक सुभाष घई ने उन्हें आश्वस्त किया कि रिकॉर्डिंग के समय उनकी सुविधा, पसंद और सहज माहौल का पूरा ध्यान रखा जाएगा। इस आश्वासन और सम्मान के बाद रेशमा फिल्म 'हीरो' के लिए अपनी आवाज देने पर राजी हुईं।
कम साजो-सामान, फर्श पर मटका और बोल पर तकरार
फिल्म 'हीरो' के इस दर्द भरे नगमे की रिकॉर्डिंग का वाकया संगीत जगत में बेहद अनूठा माना जाता है। रेशमा ने दिग्गज संगीतकार जोड़ी लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल से निवेदन किया था कि गीत में भारी-भरकम वाद्ययंत्रों के स्थान पर बेहद सीमित साज ही रखे जाएं। इसके बाद उन्होंने स्टूडियो में एक मटका मंगवाया और खुद फर्श पर बैठकर मटके की पारंपरिक थाप के साथ गाना शुरू कर दिया।
गीत के वास्तविक बोल थे, 'हिज्र की ऊंची दीवार बनाई...' लेकिन गायन के दौरान रेशमा लगातार 'बनाई' शब्द की जगह 'गिराई' गा रही थीं। संगीतकार प्यारेलाल ने उन्हें कई मर्तबा रोककर सही शब्द समझाने का प्रयास किया, परंतु रेशमा अपनी ही धुन में वही शब्द दोहराती रहीं। शब्दों के इस बार-बार गलत उच्चारण और बदलाव से नाराज होकर संगीतकार प्यारेलाल रिकॉर्डिंग स्टूडियो से बाहर चले गए। हालांकि, संगीतकार लक्ष्मीकांत ने रेशमा के स्वाभाविक अंदाज और उनके जज्बात को गहराई से समझा। उन्होंने तय किया कि रेशमा को उनके उसी सहज भाव और शैली में रिकॉर्ड करने दिया जाए। रेशमा ने भी बड़ी सादगी और विनम्रता से बताया कि वे पढ़ी-लिखी नहीं हैं, इसलिए शब्दों के उच्चारण में उनसे यह त्रुटि हो जाती है।
संघर्षपूर्ण अंतिम दौर और संगीत की दुनिया को अलविदा
रेशमा ने अपनी सादगी और जादुई आवाज के दम पर दोनों मुल्कों में अपार शोहरत और सम्मान हासिल किया, परंतु जिंदगी का आखिरी पड़ाव उनके लिए अत्यंत कष्टप्रद रहा। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे गले के कैंसर की गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं, और साथ ही उनका परिवार गंभीर आर्थिक तंगहाली के दौर से भी गुजर रहा था। लंबी बीमारी और मुश्किलों का सामना करने के बाद, 3 नवंबर 2013 को इस महान लोक गायिका ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।



















