आजादी के तुरंत बाद का दौर भारतीय सिनेमा और अदब दोनों के लिए बेहद हलचल भरा था। उस जमाने में एक क्रांतिकारी शायर अपनी बेबाक नज्मों और गजलों से मुशायरों में अलग ही पहचान बना रहे थे। मशहूर अभिनेता बलराज साहनी उनके करीबी दोस्तों में शामिल थे। एक बार मजदूरों की एक सभा का आयोजन हुआ, जिसमें इन शायर को आमंत्रित किया गया था। जब वे बलराज साहनी के साथ उस सम्मेलन में पहुंचे, तो वहां मौजूद कामगारों ने उनसे अपने मिजाज के मुताबिक कुछ क्रांतिकारी पंक्तियां सुनाने की अपील की।
शायर ने मजदूरों की दरख्वास्त पर अपनी कुछ तल्ख पंक्तियां मंच से पढ़ीं, जिनमें व्यवस्था पर सीधा कटाक्ष था। उन पंक्तियों के बोल कुछ यूं थे, 'दिल में ख्वाब डॉलर का बसाकर फिरती है भारत की अहिंसा।' सभा में मौजूद लोगों ने इन शब्दों को हाथों-हाथ लिया और खूब तालियां बजाईं। इस शायरी की चर्चा तेजी से फैली, लेकिन हुकूमत और सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ लोगों को यह तीखा तंज बिल्कुल पसंद नहीं आया। नतीजतन, इस रचना की वजह से शायर और बलराज साहनी दोनों को दो साल के लिए जेल की सलाखों के पीछे भेज दिया गया।
मुश्किल घड़ी में राज कपूर की अनूठी मदद
जब इस क्रांतिकारी गीतकार को जेल में बंद किया गया, तब उनके परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था। उनकी पत्नी गर्भवती थीं और घर में आर्थिक तंगी चरम पर थी। जब शोमैन राज कपूर को इस नाजुक स्थिति की जानकारी मिली, तो वे चुप नहीं बैठ सके और उन्होंने अपने साथी कलाकार की मदद करने की ठानी। वे जानते थे कि सामने वाला शायर बेहद खुद्दार है और कोई भी मुफ्त की माली इमदाद या खैरात कभी कबूल नहीं करेगा।
राज कपूर ने जेल पहुंचकर उनसे मुलाकात की और एक रचनात्मक रास्ता निकाला। उन्होंने गीतकार से कहा कि वे सृष्टि और इस जहान पर एक नया तराना चाहते हैं, इसलिए वे इस पर कुछ विचार लिखें कि यह दुनिया क्यों और कैसे बनी। उस शायर ने फौरन कागज पर एक मुखड़ा रच दिया, जिसके अमर बोल थे, 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे दिल में समाई, काहे को दुनिया बनाई।' यह कलम किसी और की नहीं बल्कि मजरूह सुल्तानपुरी की थी। राज कपूर ने उस मुखड़े के एवज में उन्हें 1000 रुपये थमा दिए, जो 1948-49 के दौर में बहुत बड़ी रकम मानी जाती थी। इस तरह मजरूह के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाए बिना उनके परिवार को जरूरी सहारा मिल गया।
17 साल का लंबा इंतजार और तीसरी कसम
इस घटना के बाद वक्त का पहिया घूमता रहा और पूरे 17 साल का लंबा अरसा बीत गया। जब राज कपूर अपनी ऐतिहासिक फिल्म 'तीसरी कसम' के निर्माण में जुटे थे, तब मजरूह सुल्तानपुरी की लिखी वे दो पंक्तियां अचानक फिर चर्चा में आईं। राज कपूर ने वह पुराना मुखड़ा मशहूर गीतकार शैलेंद्र के सामने रखा। हालांकि शैलेंद्र उस वक्त फिल्म के निर्माता होने के नाते अन्य व्यवस्थाओं में बहुत व्यस्त चल रहे थे, इसलिए उन्होंने यह मुखड़ा गीतकार हसरत जयपुरी को सौंप दिया और उनसे पूरा गीत तैयार करने का आग्रह किया।
हसरत जयपुरी ने मजरूह के उस ऐतिहासिक मुखड़े के आगे शानदार अंतरे लिखे और पूरे गीत को मुकम्मल शक्ल दी। इस रचना को संगीतकार जोड़ी शंकर-जयकिशन ने अपनी धुन से सजाया, जबकि पार्श्वगायक मुकेश ने इसे अपनी दर्दभरी आवाज देकर हमेशा के लिए अमर बना दिया। जब यह पूरा गाना तैयार होकर मजरूह सुल्तानपुरी के सामने पेश किया गया, तो उन्होंने बड़े दिल का परिचय देते हुए पूरा क्रेडिट हसरत जयपुरी को ही देने की बात कही। यही वजह है कि आधिकारिक रिकॉर्ड्स में इस गीत के रचनाकार के तौर पर हसरत जयपुरी का नाम दर्ज है, मगर इतिहास के पन्नों में यह हकीकत हमेशा दर्ज रहेगी कि इसके मूल मुखड़े का जन्म जेल में बंद मजरूह सुल्तानपुरी की कलम से हुआ था।





















