भारत में लंबे समय से शेयर बाजार का पूरा दायरा मुंबई के दो प्रमुख एक्सचेंजों तक सीमित रहा है, लेकिन अब देश के पूर्वी हिस्से में स्थित एक ऐतिहासिक मंच की दोबारा वापसी के संकेत मिल रहे हैं। एक सदी से भी अधिक पुराना कलकत्ता शेयर बाजार (सीएसई) आने वाले दिनों में फिर से सक्रिय हो सकता है। भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) के चेयरमैन तुहिन कांत पांडेय ने स्पष्ट किया है कि इस ऐतिहासिक एक्सचेंज को दोबारा चालू करने के विकल्प पर विचार किया जा रहा है। हालांकि, इसकी अंतिम मंजूरी इस बात पर टिकी होगी कि यह एक्सचेंज पर्याप्त ट्रेडिंग वॉल्यूम जुटा सकता है या नहीं, इसका कारोबारी मॉडल आर्थिक रूप से टिकाऊ है या नहीं, और क्या इसके प्रवर्तक नई तकनीक में भारी निवेश करने में सक्षम हैं।
पश्चिम बंगाल सरकार की पहल और नियामक शर्तें
इस ऐतिहासिक एक्सचेंज को दोबारा शुरू करने की पहल पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से आए एक आधिकारिक प्रस्ताव के बाद आगे बढ़ी है। इस प्रस्ताव पर अपना रुख स्पष्ट करते हुए सेबी प्रमुख ने बताया कि मौजूदा कानूनी और नियामकीय ढांचा देश में किसी नए या पुराने एक्सचेंज की शुरुआत पर कोई रोक नहीं लगाता है। लेकिन ऐसा कोई भी प्रस्ताव तभी आगे बढ़ सकता है, जब वह नियामक द्वारा तय की गई सख्त व्यवस्थाओं और पूंजीगत आवश्यकताओं के सभी मानकों पर पूरी तरह खरा उतरे। पुराने दौर की तुलना में वर्तमान बाजार की स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। जब देश भर में क्षेत्रीय स्टॉक एक्सचेंज काम कर रहे थे, उस समय भौतिक ट्रेडिंग होती थी, जबकि आज आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग सिस्टम के कारण देश का कोई भी निवेशक कहीं से भी सीधे बड़े बाजारों में अपनी भागीदारी दर्ज करा लेता है।
तरलता और व्यावसायिक व्यवहार्यता की सबसे बड़ी कसौटी
नियामक के अनुसार, किसी नए एक्सचेंज को अनुमति देना केवल कागजी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि उसका जमीनी स्तर पर टिके रहना सबसे अहम चुनौती है। तुहिन कांत पांडेय का कहना है कि सिर्फ एक्सचेंज खोल लेना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि यह साबित करना पड़ता है कि वह वास्तव में व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक बन पाएगा। किसी भी नए ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के लिए पर्याप्त तरलता (लिक्विडिटी) सबसे बुनियादी शर्त है। एक्सचेंज के प्रवर्तकों को नियामक के सामने यह प्रमाणित करना होगा कि उनके प्लेटफॉर्म पर ट्रेडिंग जारी रखने के लिए पर्याप्त संख्या में खरीदार और विक्रेता मौजूद रहेंगे। यदि नियामक के विस्तृत आकलन में यह पाया जाता है कि कलकत्ता शेयर बाजार इन सभी कड़े मानकों को सफलतापूर्वक पूरा कर सकता है, तो निश्चित तौर पर इसके पुनरुद्धार की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और अप्रैल 2013 में ट्रेडिंग बंद होने की वजह
कलकत्ता शेयर बाजार की नींव ब्रिटिश शासनकाल के दौरान साल 1908 में रखी गई थी, और उस दौर में यह समूचे क्षेत्र के कारोबार और पूंजी का मुख्य केंद्र माना जाता था। एक समय ऐसा भी आया था जब साल 1997 से 2000 के दौरान इस एक्सचेंज पर ट्रेडिंग का स्तर इतना ऊंचा था कि यह कई बार बीएसई से भी आगे निकल जाता था और देश के सबसे बड़े बाजारों में शुमार था। लेकिन समय के साथ मुंबई के बीएसई और एनएसई ने खुद को पूरी तरह आधुनिक और डिजिटल ढांचे में ढाल लिया, जिससे क्षेत्रीय एक्सचेंजों की चमक फीकी पड़ने लगी।
इसके बाद सेबी ने अपने नियमों में कड़ा बदलाव करते हुए यह अनिवार्य कर दिया कि प्रत्येक स्टॉक एक्सचेंज के पास अलग और स्वतंत्र मान्यता प्राप्त क्लीयरिंग कॉरपोरेशन होना चाहिए, ताकि सौदों के निपटान में पारदर्शिता रहे। कलकत्ता शेयर बाजार के पास क्लीयरिंग और सेटलमेंट की ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था नहीं थी, जिसके चलते अप्रैल 2013 में यहां शेयरों की ट्रेडिंग पूरी तरह रोक दी गई। हालांकि इस मंच पर 13 वर्षों से कोई ट्रेडिंग गतिविधि नहीं हुई है, लेकिन कानूनी रूप से यह आज भी सेबी के नियमन के दायरे में बना हुआ है। अब राज्य सरकार के नए प्रस्ताव की गहन समीक्षा के बाद ही यह तय होगा कि कोलकाता के इस ऐतिहासिक बाजार में ट्रेडिंग की घंटी फिर से बजेगी या नहीं।


















