रागी यानी मड़ुआ की उन्नत खेती के जरिए बंपर फसल तैयार करने के लिए सबसे पहले मिट्टी और खेत का चुनाव बेहद अहम होता है। इसकी रोपाई के लिए हल्की दोमट, भुरभुरी और जल निकासी की बेहतरीन सुविधा वाली जमीन सबसे मुफीद मानी जाती है। किसानों को अपने इलाके के हिसाब से जून से जुलाई के बीच इसकी बुवाई का काम पूरा करना चाहिए ताकि पौधे सही समय पर अपनी विकास यात्रा शुरू कर सकें।
सही किस्मों का चुनाव और बीज की गुणवत्ता
फसल की बंपर पैदावार सीधे तौर पर उन्नत और प्रमाणित बीजों के चयन पर निर्भर करती है। किसान जीपीयू-28 और मंडावा जैसी उन्नत किस्मों के साथ-साथ अपने क्षेत्र के अनुकूल अन्य प्रमाणित स्थानीय बीजों को भी चुन सकते हैं। हमेशा भरोसेमंद स्रोतों से ही बीज खरीदें और बुवाई से पहले उनकी अंकुरण क्षमता की जांच जरूर कर लें ताकि खेत में पौधों का विकास एकसमान और स्वस्थ रूप से हो सके।
बीज जनित रोगों से सुरक्षा के लिए उपचार
अंकुरण के तुरंत बाद शुरुआती अवस्था में पौधों को फंगस और अन्य बीमारियों से बचाने के लिए बीज उपचार करना अनिवार्य है। इसके लिए तय मात्रा में कार्बेन्डाजिम का इस्तेमाल किया जाता है। बीजों को इस रसायन से अच्छी तरह उपचारित करने के बाद उन्हें छांव में सुखाया जाता है, जिससे रोगजनक फफूंद का खतरा कम हो जाता है और पौधों की शुरुआती ग्रोथ मजबूत होती है।
प्रति एकड़ सही बीज दर का निर्धारण
एक एकड़ खेत में रागी की बुवाई के लिए करीब 4 से 5 किलोग्राम बीज पर्याप्त मात्रा माने जाते हैं। बीज की मात्रा तय सीमा से अधिक होने पर पौधों के बीच पोषक तत्वों के लिए अनावश्यक प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है, जबकि कम मात्रा होने पर खेत खाली नजर आ सकता है। इसलिए लाइन में बुवाई का तरीका अपनाना चाहिए ताकि हर पौधे को पर्याप्त जगह, हवा और पोषण मिल सके।
खेती के लिए खेत की उचित तैयारी
बुवाई से पहले खेत को भुरभुरी और समतल शक्ल देना सफलता की एक बड़ी कुंजी है। मिट्टी की कठोर पर्त को तोड़ने के लिए खेत की दो से तीन बार गहरी जुताई करनी चाहिए। इसके बाद पाटा चलाकर मिट्टी को एकदम बारीक और समतल बना लिया जाता है, जिससे बीजों को अंकुरण के लिए अनुकूल माहौल मिलता है और जड़ों का फैलाव बेहतर होता है। जलभराव से बचाने के लिए खेत में पानी की निकासी का पुख्ता इंतजाम रखना बहुत जरूरी है।
लाइन से बुवाई करने के फायदे
छिटवां विधि के बजाय लाइनों में बुवाई करना हमेशा फायदेमंद साबित होता है। इसमें एक कतार से दूसरी कतार की दूरी लगभग 25 सेंटीमीटर रखनी चाहिए। इससे पौधों को धूप, हवा और पोषक तत्व समान रूप से मिलते हैं। इसके अलावा सही फासला होने की वजह से खरपतवार नियंत्रण और निराई-गुड़ाई का काम भी काफी आसान हो जाता है और पौधों की संख्या संतुलित बनी रहती है।
सिंचाई प्रबंधन और नमी की जरूरत
रागी की फसल को बहुत ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है, लेकिन नाजुक चरणों में खेत में नमी बनाए रखना फसल की सेहत के लिए बेहद आवश्यक है। सामान्य तौर पर बारिश का पानी इसकी जरूरत पूरी कर देता है, लेकिन सूखे की स्थिति में हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है। विशेष तौर पर बालियां निकलते समय और दाने भरते वक्त नमी की कमी बिल्कुल नहीं होनी चाहिए, हालांकि खेतों में पानी का ठहराव भी नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे जड़ें सड़ सकती हैं।
खाद और उर्वरक का संतुलित उपयोग
पौधों के समुचित विकास के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश जैसे प्रमुख पोषक तत्वों का संतुलित इस्तेमाल जरूरी है। नाइट्रोजन पत्तियों की हरियाली और बढ़वार बढ़ाता है, फास्फोरस मजबूत जड़ें विकसित करता है और पोटाश पौधों को मजबूती देकर दाने भरने में मदद करता है। खादों की सही मात्रा का निर्धारण मिट्टी की जांच और स्थानीय कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर ही तय किया जाना चाहिए ताकि अधिक नाइट्रोजन से फसल गिरने का खतरा न पैदा हो।



















