आधुनिक भारत में चाहे सुबह दक्षिण भारतीय पारंपरिक फिल्टर कॉफ़ी की चुस्की हो या फिर शहरों के आधुनिक कैफ़े में मिलने वाली कैपुचीनो, कॉफ़ी भारतीय जनजीवन और खानपान की संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन चुकी है। हालांकि, बहुत कम लोगों को यह मालूम है कि भारत में इस ऊर्जावान पेय का इतिहास लगभग 350 से 400 वर्ष पुराना है और इसकी नींव महज 7 कच्चे बीजों की एक साहसिक यात्रा पर टिकी हुई है। कर्नाटक की शांत पहाड़ियों में रोपे गए उन 7 बीजों से शुरू हुआ यह सफर आज एक विशाल कृषि उद्योग में तब्दील हो चुका है, जो देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ लाखों परिवारों को रोजगार प्रदान कर रहा है।
7 बीजों की गुप्त यात्रा: बाबा बुदन ने कैसे तोड़ा यमन का एकाधिकार
भारतीय कॉफ़ी का इतिहास 17वीं शताब्दी यानी लगभग 1670 ईस्वी का है। उस दौर में पूरे विश्व में कॉफ़ी के उत्पादन और इसके अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर अरब देशों, विशेष रूप से यमन का पूर्ण एकाधिकार था। यमन का मोचा बंदरगाह वैश्विक कॉफ़ी व्यापार का सबसे बड़ा और प्रमुख केंद्र माना जाता था। अपने इस व्यापारिक वर्चस्व को बनाए रखने के लिए अरब के शासकों ने सख्त नियम लागू कर रखे थे, जिसके तहत कॉफ़ी के जीवित पौधे या अंकुरित हो सकने वाले हरे बीजों को देश से बाहर ले जाने पर पूर्ण प्रतिबंध था। बाहर भेजे जाने वाले कॉफ़ी बीजों को पहले उबाला या भुना जाता था ताकि कोई भी अन्य देश इन्हें उगाने में सफल न हो सके।
इसी कालखंड के दौरान कर्नाटक के चिकमगलूर क्षेत्र के रहने वाले सूफी संत हजरत बाबा बुदन मक्का में पवित्र हज यात्रा पर गए थे। मक्का से स्वदेश लौटते समय वे यमन के प्रसिद्ध मोचा शहर में ठहरे, जहां उन्होंने जीवन में पहली बार कॉफ़ी का स्वाद चखा। इसके अनूठे स्वाद, ताजगी और स्फूर्ति देने वाले गुणों से हजरत बाबा बुदन अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि वे इस अद्भुत पौधे को भारत लेकर जाएंगे। लेकिन यमन के बंदरगाहों पर तैनात कड़े पहरे और सख्त कानूनों के कारण जीवित बीज या पौधा बाहर ले जाना लगभग असंभव काम था।
कड़े नियमों की परवाह न करते हुए बाबा बुदन ने एक बेहद चतुर और साहसिक रास्ता चुना। चूंकि इस्लाम धर्म में 7 का अंक अत्यंत पवित्र माना जाता है, इसलिए उन्होंने कॉफ़ी के ठीक 7 हरे और कच्चे बीजों का चयन किया। अरब अधिकारियों की सख्त चेकिंग से बचने के लिए उन्होंने उन 7 उपजाऊ बीजों को अपनी लंबी और घनी दाढ़ी के भीतर सुरक्षित छुपा लिया। इस तरह मोचा बंदरगाह के कड़े पहरेदारों को चकमा देकर संत बाबा बुदन 7 बीजों के साथ अरब सागर पार कर सकुशल भारत लौट आए।
चंद्रद्रोण पहाड़ियों से बाबा बुदन गिरी तक: भारत में खेती की शुरुआत
भारत लौटने के बाद हजरत बाबा बुदन ने कर्नाटक के चिकमगलूर में स्थित चंद्रद्रोण पहाड़ियों की उपजाऊ ढलानों पर उन 7 बीजों को रोप दिया। चिकमगलूर की मिट्टी, ऊंचाई, नमी और अनुकूल मौसम कॉफ़ी की फसल के लिए बेहद आदर्श साबित हुए। वे 7 बीज देखते ही देखते अंकुरित होकर हरे-भरे पौधों में बदल गए। समय के साथ इन पौधों से नए बीज तैयार हुए और कॉफ़ी की खेती धीरे-धीरे आसपास की पहाड़ियों और घाटियों में फैलने लगी।
भारतीय कृषि के क्षेत्र में संत हजरत बाबा बुदन के इस ऐतिहासिक और अविस्मरणीय योगदान का सम्मान करने के लिए चंद्रद्रोण पर्वत श्रृंखला का नाम बदलकर बाबा बुदन गिरी रख दिया गया। कर्नाटक में स्थित बाबा बुदन गिरी की ये पहाड़ियां आज भी भारतीय कॉफ़ी के ऐतिहासिक जन्मस्थान के रूप में पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं।
व्यवसायिक विस्तार और पर्यावरण-अनुकूल शेड खेती का ढांचा
शुरुआती दशकों तक स्थानीय स्तर पर उगाए जाने के बाद, 18वीं शताब्दी में कॉफ़ी के नियमित व्यवसायिक बागानों की स्थापना शुरू हुई। इसके पश्चात 19वीं शताब्दी आते-आते दक्षिण भारत में बड़े पैमाने पर कॉफ़ी की खेती का विस्तार हुआ, जिसने भारतीय कॉफ़ी को वैश्विक कृषि मानचित्र पर एक विशिष्ट पहचान दिलाई। भारतीय कॉफ़ी की सबसे बड़ी विशेषता इसका अनूठा और पर्यावरण-अनुकूल शेड सिस्टम यानी छायादार वृक्षों के नीचे खेती करने का तरीका है।
दुनिया के अन्य देशों के विपरीत जहां कॉफ़ी को सीधी धूप वाले खुले खेतों में उगाया जाता है, भारत में कॉफ़ी की खेती सदाबहार और फलीदार वृक्षों की दो-स्तरीय छाया प्रणाली के अंतर्गत की जाती है। इसमें लगभग 50 प्रकार की छायादार वृक्षों की प्रजातियां शामिल होती हैं। यह प्रणाली न केवल कॉफ़ी की झाड़ियों को तेज धूप और भारी बारिश से बचाती है, बल्कि मिट्टी की गुणवत्ता में सुधार करती है और पश्चिमी घाटों, पूर्वी घाटों तथा उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के 4.91 लाख हेक्टेयर क्षेत्रफल में जैव विविधता को बनाए रखने में मदद करती है।
2 मिलियन लोगों की आजीविका और छोटे किसानों का योगदान
वर्तमान में भारत का कॉफ़ी क्षेत्र देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक सुदृढ़ स्तंभ है, जिससे खेती, प्रसंस्करण, क्योरिंग और व्यापार के माध्यम से 2 मिलियन से भी अधिक लोगों की आजीविका जुड़ी हुई है। इस क्षेत्र की एक प्रमुख विशेषता छोटे किसानों का वर्चस्व है। देश में कुल कॉफ़ी जोत का लगभग 99 प्रतिशत हिस्सा छोटे किसानों के पास है, जो कुल राष्ट्रीय उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पैदा करते हैं। इस व्यवस्था के कारण कॉफ़ी व्यापार से होने वाली आय का सीधा लाभ ग्रामीण परिवारों तक पहुंचता है।
दक्षिण भारत के तीन राज्य: 96% कॉफ़ी उत्पादन का केंद्र
भारत में उत्पादित होने वाली कुल कॉफ़ी का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा केवल दक्षिण भारत के 3 राज्यों से आता है
- कर्नाटक: कॉफ़ी उत्पादन के मामले में कर्नाटक देश में पहले स्थान पर है। अकेले कर्नाटक राज्य देश के कुल उत्पादन का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता है। राज्य के मुख्य कॉफ़ी उत्पादक जिलों में चिकमगलूर, कूर्ग (कोडागु) और हसन शामिल हैं।
- केरल: दूसरे स्थान पर केरल राज्य है, जो राष्ट्रीय उत्पादन का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा प्रदान करता है। यहां वायनाड और त्रावणकोर क्षेत्र मुख्य कॉफ़ी उत्पादक केंद्र हैं।
- तमिलनाडु: तीसरे पायदान पर तमिलनाडु आता है, जिसकी हिस्सेदारी कुल राष्ट्रीय उत्पादन में लगभग 5 से 6 प्रतिशत है। नीलगिरी, येरकाड और डिंडीगुल की पहाड़ियां कॉफ़ी उत्पादन के लिए जानी जाती हैं।
भारत में मुख्य रूप से दो किस्में—अराबिका और रोबस्टा उगाई जाती हैं। पेड़ों की घनी छांव में उगाए जाने के कारण भारतीय अराबिका और रोबस्टा कॉफ़ी का स्वाद बेहद संतुलित और अनूठा होता है, जिसकी मांग अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में काफी अधिक है।
प्रशासनिक ढांचा: कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया की भूमिका
कॉफ़ी उद्योग के सुचारू संचालन और संवर्धन के लिए भारत सरकार ने कॉफ़ी एक्ट VII ऑफ़ 1942 लागू किया। इस कानून के तहत कॉमर्स और इंडस्ट्री मिनिस्ट्री के प्रशासनिक नियंत्रण में कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया का गठन किया गया। यह बोर्ड कॉफ़ी की पूरी वैल्यू चेन में अनुसंधान, विकास और गुणवत्ता सुधार का कार्य करता है।
वर्तमान में कॉफ़ी बोर्ड ऑफ़ इंडिया में कुल 33 सदस्य शामिल हैं। इनमें चेयरमैन, सेक्रेटरी और चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर के अलावा कॉफ़ी उत्पादक, व्यापारी, क्योरिंग इकाइयां, श्रमिक संगठन, उपभोक्ता प्रतिनिधि, प्रमुख कॉफ़ी उत्पादक राज्यों की सरकारें और संसद सदस्य शामिल हैं। कॉफ़ी बोर्ड के प्रयासों से ही भारतीय कॉफ़ी वैश्विक बाजार में अपनी गुणवत्ता और पहचान बनाए हुए है।



















