रोजमर्रा की सामान्य दूध वाली चाय से अलग पारंपरिक हर्बल पेय का अपना एक अलग आनंद होता है। रामअवतार यादव अपने पूर्वजों के समय से चली आ रही एक खास लेमनग्रास चाय तैयार करते हैं, जिसे बनाने का तरीका पूरी तरह देसी और पुराना है। इसमें किसी आधुनिक तरीके या जटिल रेसिपी के बजाय घर-आंगन में मिलने वाली साधारण चीजों का उपयोग किया जाता है।
ताजी पत्तियों को तैयार करने का तरीका
इस चाय को तैयार करने के लिए सबसे पहले लेमनग्रास की बिल्कुल ताजी पत्तियां तोड़ी जाती हैं। इसके बाद आवश्यकतानुसार पानी लिया जाता है। पत्तियों को सीधे पानी में डालने के बजाय हाथों से हल्का सा रगड़ा जाता है, जिससे उनकी प्राकृतिक खुशबू और रस पानी में आसानी से घुल सके। इसके बाद इसे लगभग 10 मिनट तक अच्छी तरह से खौलाया जाता है।
स्वाद बढ़ाने के विकल्प और प्राकृतिक खुशबू
स्वाद को अधिक बेहतर बनाने के लिए इसमें थोड़ी सी सामान्य चायपत्ती और अदरक का टुकड़ा भी मिलाया जा सकता है। हालांकि, अगर किसी समय अदरक मौजूद न हो, तब भी चाय के स्वाद पर कोई नकारात्मक असर नहीं पड़ता। लेमनग्रास की अपनी स्वाभाविक सुगंध और ताजगी भरा स्वाद ही इस पेय को अनोखा और खास बनाने के लिए पर्याप्त होता है।
मिट्टी और लकड़ी के चूल्हे की विशेषता
रामअवतार यादव का अनुभव है कि सामान्य गैस चूल्हे की तुलना में लकड़ी वाले पारंपरिक चूल्हे पर पकाई गई चाय का स्वाद बिल्कुल भिन्न होता है। चूल्हे की आंच पर पकने के दौरान इसमें एक खास तरह का देसीपन, सौंधापन और प्राकृतिक खुशबू समा जाती है, जो आधुनिक बर्नर पर नहीं मिल पाती।
पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंची पारिवारिक परंपरा
यह विधि किसी पाक कला की किताब या नए माध्यमों से नहीं सीखी गई है, बल्कि यह परिवार में पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ी है। घर के बुजुर्ग पहले इसी तरह पानी में लेमनग्रास उबालकर पीते थे और परिवार के बाकी सदस्यों को भी देते थे। यह पेय दूध वाली भारी चाय के बिल्कुल विपरीत होता है। इसे बिना दूध के एक हल्की लाल चाय की तरह बनाया जाता है, जो पीने में बेहद हल्की और महक से भरी होती है।



















