प्राथमिक विद्यालयों में दाखिला लेने वाले नन्हे बच्चों के लिए सबसे पहली रुकावट किताबों का कठिन पाठ्यक्रम नहीं, बल्कि क्लासरूम की अनजानी भाषा बनती है। पांच से छह वर्ष का जो बच्चा अपने घर और परिवेश में केवल अपनी स्थानीय बोली या मातृभाषा सुनता और बोलता आया हो, उसे स्कूल पहुंचते ही यदि एकदम अजनबी भाषा का सामना करना पड़े तो वह सहम जाता है। इसी भाषाई दूरी को समाप्त करने के लिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति सहित प्रमुख शैक्षणिक मंच शुरुआती स्तर पर बच्चे की घरेलू भाषा में पढ़ाई कराने पर विशेष जोर दे रहे हैं।
क्लासरूम अध्ययन से सामने आई प्राथमिक शिक्षा की जमीनी हकीकत
देश भर के प्राथमिक विद्यालयों में बच्चों की मातृभाषा को कक्षा का माध्यम बनाने को लेकर विभिन्न स्तरों पर गहन कार्य किया जा रहा है। नौ राज्यों के 21 जिलों में मौजूद 1,050 क्लासरूम के सीधे अवलोकन और वहां कार्यरत शिक्षकों से विस्तृत बातचीत के आधार पर प्राथमिक शिक्षा की एक विस्तृत रूपरेखा तैयार की गई है। इस अध्ययन से यह स्पष्ट हुआ है कि यदि बच्चों की अपनी घरेलू भाषा को स्कूल की चारदीवारी के भीतर सम्मान और जगह दी जाए, तो उनके सीखने की बुनियादी नींव अत्यधिक मजबूत हो जाती है। इसी दिशा में कदम बढ़ाते हुए असम के चाय बागानों, ओडिशा के घने जंगलों और छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में क्षेत्रीय बोलियों तथा जनजातीय भाषाओं में पठन सामग्री विकसित की जा रही है।
बस्तर का सफल मॉडल और बच्चों के सीखने के स्तर में वृद्धि
छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल बस्तर जिले में स्थानीय बोलियों को पढ़ाई का हिस्सा बनाकर शिक्षा के स्तर में अभूतपूर्व बदलाव दर्ज किया गया है। यहां नन्हे विद्यार्थियों के लिए उनकी अपनी 13 जनजातीय भाषाओं में विशेष किताबें तैयार की गईं। इसके अतिरिक्त बच्चों की रुचि बढ़ाने के लिए 900 से अधिक रोचक कहानी सत्र आयोजित किए गए और 57 स्कूल म्यूजियम स्थापित किए गए।
स्थानीय भाषा में पढ़ाई का सीधा सकारात्मक प्रभाव बच्चों के मूल्यांकन में साफ दिखाई दिया। बस्तर के बच्चों की बुनियादी साक्षरता में 31 प्रतिशत और गणितीय समझ में 25 प्रतिशत का सुधार दर्ज हुआ। इसके अलावा शब्दों को पढ़ने की क्षमता में 28 प्रतिशत, सुनकर बात समझने की क्षमता में 35 प्रतिशत तथा अपने विचार लिखने की कला में 33 प्रतिशत की उल्लेखनीय प्रगति देखी गई।
क्लासरूम का भाषाई अंतर: 73 प्रतिशत शिक्षक समझते हैं बोली, उपयोग केवल 9 प्रतिशत
इस अध्ययन में एक चिंताजनक पहलू भी उजागर हुआ है, जो नीतियों के क्रियान्वयन में मौजूद बड़े अंतर को दर्शाता है। सर्वे में शामिल 73 प्रतिशत शिक्षक यह भलीभांति जानते थे कि उनकी कक्षा में बैठे बच्चों की घरेलू भाषा क्या है और वे उस बोली को समझ भी लेते थे। इसके विपरीत, जब कक्षा में वास्तविक शिक्षण की बात आई, तो नियमित रूप से उस स्थानीय भाषा का उपयोग करने वाले शिक्षक केवल 9 प्रतिशत ही पाए गए।
इस भारी अंतर का दुष्परिणाम यह होता है कि लगभग हर चौथा बच्चा स्कूल में बोली जाने वाली भाषा को पूरी तरह न समझ पाने के कारण कक्षा में शांत और असहज बैठा रहता है। जब तक शिक्षक स्वयं उस भाषा को माध्यम नहीं बनाएंगे, तब तक बच्चे अपनी बात खुलकर साझा नहीं कर पाते।
ओडिशा और असम में जनजातीय बोलियों का समावेश
मातृभाषा आधारित बहुभाषी शिक्षण को धरातल पर उतारने में ओडिशा सरकार ने भी एक अनुकरणीय पहल की है। राज्य में पारंपरिक बालवाटिका की पूरी अध्ययन सामग्री को 21 अलग-अलग जनजातीय भाषाओं में रूपांतरित किया गया है। इस नई व्यवस्था को ओडिशा के 200 स्कूलों में विधिवत शुरू करने की अनुमति प्रदान कर दी गई है।
इसी प्रकार असम के चाय बागान इलाकों में रहने वाले श्रमिक परिवारों के बच्चों के लिए विशेष द्विभाषी वर्कबुक तैयार की गई हैं। साथ ही क्लासरूम भाषा सर्वे के जरिए यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि इन बागानों के बच्चे विद्यालय में खुद को उपेक्षित या अलग-थलग महसूस न करें और मुख्यधारा की शिक्षा से सहजता से जुड़ सकें।
राजस्थान और त्रिपुरा के विशेष शैक्षणिक प्रयोग
राजस्थान के 33 जिलों में बच्चों की घरेलू बोली और स्कूल के औपचारिक माध्यम के बीच की दूरी को पाटने के उद्देश्य से विस्तृत भाषा मैपिंग का काम पूरा किया गया है। इस मैपिंग के जरिए यह आसानी से पहचाना जा सका है कि किस इलाके के बच्चों को पढ़ाई में किस प्रकार के भाषाई सहयोग की दरकार है।
पूर्वोत्तर के राज्य त्रिपुरा ने शिक्षकों की क्षमता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया है। राज्य ने अध्यापकों के लिए विशेष रूप से बहुभाषी और बहु-कक्षा आधारित प्रमाणित प्रशिक्षण कार्यक्रम तैयार किया है। इसके अंतर्गत लगभग 3,000 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया है, जो अब बच्चों को उनकी ही बोलियों में सहजता और आत्मविश्वास के साथ पढ़ा रहे हैं।
झारखंड का पलाश प्रोजेक्ट बना हजारों बच्चों का सहारा
झारखंड में भाषाई विविधता की चुनौती से निपटने के लिए पलाश एमएलए कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसने प्राथमिक स्तर पर नई दिशा दिखाई है। इस परियोजना के माध्यम से राज्य के करीब 1,000 विद्यालयों के 22,600 से अधिक नन्हे विद्यार्थियों तक सीधी पहुंच स्थापित की गई है।
इस अभियान के तहत 1,000 से ज्यादा शिक्षकों को आदिवासी बोलियों में पढ़ाने का विशेष प्रशिक्षण दिया गया। इसका सीधा परिणाम यह निकला कि जब बच्चों को अपनी ही पहचानी हुई भाषा में वर्णमाला और गिनती सीखने का अवसर मिला, तो स्कूल के प्रति उनके मन में बैठा अनजाना डर और संकोच पूरी तरह समाप्त हो गया।





















