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सरगुजा के मैनपाट में घास-फूस की झोपड़ी में चल रहा प्राथमिक स्कूल, 1997 से पक्के भवन का इंतजारछत्तीसगढ़
6 अक्तू॰ 2026, 9:44 am (59 मिनट पहले)· 0

सरगुजा के मैनपाट में घास-फूस की झोपड़ी में चल रहा प्राथमिक स्कूल, 1997 से पक्के भवन का इंतजार

छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग स्थित मैनपाट के नरकट में 1997 से शुरू हुआ प्राथमिक स्कूल आज भी झोपड़ी में संचालित हो रहा है। पक्का भवन न होने से 17 बच्चे जमीन पर दरी बिछाकर पढ़ने को मजबूर हैं।

छत्तीसगढ़ में सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से करीब 55 किलोमीटर की दूरी पर बसे मैनपाट के नरकट गांव में बुनियादी शिक्षा बदहाली के दौर से गुजर रही है। पहाड़ों के बीच बसे इस ग्रामीण अंचल में छोटे बच्चों को पढ़ाने के लिए घास-फूस, बल्ली और प्लास्टिक से एक कच्ची झोपड़ी तैयार की गई है। वर्ष 1997 में जब नरकट में प्राथमिक शाला की शुरुआत हुई थी, तब से लेकर आज तक इस स्कूल को अपना पक्का भवन नसीब नहीं हो सका है। आधुनिक दौर में भी आसपास के गांवों से आने वाले नौनिहाल इसी झोपड़ीनुमा ढांचे में बैठकर ककहरा सीखने को विवश हैं।

स्कूल परिसर में न तो पक्के कमरे हैं, न मजबूत छत और न ही बच्चों के खेलने के लिए कोई खेल मैदान उपलब्ध है। यहां तक कि कक्षा में बैठने के लिए बेंच या टेबल तक की सुविधा नहीं है। छात्र जमीन पर साधारण दरी बिछाकर बैठते हैं। जब भी तेज आंधी चलती है या भारी बारिश होती है, तो घास-फूस का छप्पर उड़ जाता है और बच्चों की पढ़ाई ठप पड़ जाती है।

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बरसात के दिनों में टपकती है छत, भीग जाती हैं दरियां

मौसम बदलने के साथ ही इस झोपड़ीनुमा स्कूल में मुश्किलें कई गुना बढ़ जाती हैं। हेडमास्टर जोहान तिर्की के अनुसार, मानसून और बरसात के दिनों में सबसे गंभीर संकट खड़ा होता है। मूसलाधार बारिश और तेज हवाओं के दौरान झोपड़ी की कच्ची छत से लगातार पानी रिसने लगता है। चारों तरफ से पानी भीतर घुसने के कारण पूरी जगह कीचड़ और नमी से भर जाती है। फर्श पर बिछाई जाने वाली दरियां पूरी तरह भीग जाती हैं और शिक्षण सामग्री व स्कूल के जरूरी रिकॉर्ड को सुरक्षित रख पाना एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

1997 से आज तक पक्की छत को तरसते छात्र

स्कूल की स्थापना से लेकर अब तक का सफर केवल कामचलाऊ बंदोबस्त के सहारे ही तय हुआ है। हेडमास्टर ने स्पष्ट किया कि वर्ष 1997 से लेकर वर्तमान समय तक बच्चों ने केवल अस्थायी व्यवस्थाओं के बीच ही पढ़ाई की है। शुरुआती दौर में एक कच्चे मकान और कपड़े के पर्दे लगाकर कक्षाएं चलाई गईं। इसके बाद बच्चों को एक अंधेरे कमरे में बैठाकर शिक्षा दी गई। वर्तमान में नरकट, लकड़ी की बल्लियों और प्लास्टिक की तिरपाल से तैयार की गई झोपड़ी के भीतर यह प्राथमिक शाला चल रही है। पच्चीस से अधिक साल बीत जाने के बाद भी एक स्थायी पक्का कमरा तक तैयार नहीं किया जा सका।

हर साल निजी खर्च से होती है छप्पर की मरम्मत

इस अस्थायी ढांचे को टिकाए रखने के लिए हर साल बरसात से ठीक पहले मरम्मत का काम करना पड़ता है। हेडमास्टर जोहान तिर्की ने जानकारी दी कि नई प्लास्टिक शीट खरीदने, लकड़ी की बल्लियां जुटाने और मजदूरी पर श्रमिकों को लगाने का पूरा जिम्मा शिक्षकों को खुद उठाना पड़ता है। नया शैक्षणिक सत्र शुरू होने और स्कूल के कपाट खुलने से पहले झोपड़ी की मरम्मत किसी तरह पूरी की जाती है, ताकि बच्चों को पढ़ाई के लिए सिर छिपाने की जगह मिल सके।

जगह की भारी किल्लत, ब्लैकबोर्ड लगाने तक का संकट

झोपड़ी का आकार इतना छोटा है कि बुनियादी शिक्षण गतिविधियों को संचालित करना बेहद कठिन हो गया है। जगह की गंभीर कमी के चलते स्कूल का सामान सहेजने तक के लिए पर्याप्त स्थान नहीं है। यहां तक कि पढ़ाने के लिए सबसे जरूरी माने जाने वाले ब्लैकबोर्ड को उचित तरीके से लगाने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है। बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए जरूरी पाठ्येतर गतिविधियां और समूह कार्य कराना इस तंग स्थान में संभव नहीं हो पाता। इन तमाम असुविधाओं और सीमाओं के बावजूद शिक्षक अपनी ओर से बच्चों को पढ़ाने का प्रयास जारी रखे हुए हैं।

17 विद्यार्थियों में मझवार, कोरवा और उरांव समाज के बच्चे शामिल

नरकट के इस प्राथमिक स्कूल में वर्तमान में कुल 17 विद्यार्थी नामांकित हैं। शिक्षा ग्रहण करने वाले इन बच्चों में बहुसंख्यक छात्र मझवार समाज से ताल्लुक रखते हैं। इसके साथ ही विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूहों में शामिल कोरवा और उरांव समाज के बच्चे भी यहां पढ़ने आते हैं। सुदूर पहाड़ी क्षेत्र में रहने वाले इन आदिवासी बच्चों के लिए शिक्षा की रोशनी पाने का यह झोपड़ीनुमा स्कूल ही इकलौता जरिया बना हुआ है।

रसोईघर का अभाव, दूसरे घर से बनकर आता है मध्यान्ह भोजन

सरकारी नियमों के तहत संचालित होने वाले मध्यान्ह भोजन के लिए भी स्कूल के पास अपना कोई रसोई कक्ष नहीं है। परिसर में जगह न होने के कारण दोपहर का भोजन पड़ोस के एक निजी घर में पकाया जाता है। खाना तैयार होने के बाद उसे स्कूल लाकर बच्चों को परोसा जाता है। भीषण गर्मी के मौसम में भी इस झोपड़ी के अंदर बच्चों का बैठना दूभर हो जाता है। तंग जगह और बिजली-संरचना के अभाव में वहां पंखा तक लगाने की कोई गुंजाइश नहीं है।

प्रशासनिक स्वीकृति की उम्मीद पर टिका निर्माण कार्य

हेडमास्टर जोहान तिर्की का कहना है कि उन्होंने स्कूल भवन के अभाव की समस्या को लेकर वरिष्ठ शिक्षा अधिकारियों को समय-समय पर अवगत कराया है। जब भी शिक्षा विभाग द्वारा भवनविहीन स्कूलों की सूची या ब्योरा मांगा जाता है, नरकट स्कूल की पूरी स्थिति से अधिकारियों को सूचित किया जाता रहा है। अधिकारियों की तरफ से यह आश्वासन दिया गया है कि स्कूल भवन के निर्माण की मंजूरी मिल चुकी है और बरसात का मौसम समाप्त होने के उपरांत निर्माण कार्य धरातल पर शुरू कराया जा सकता है।

हेडमास्टर का कहना है कि स्कूल के संचालन के लिए किसी बड़ी या दिखावटी सुविधा की मांग नहीं है। सबसे पहली और अनिवार्य जरूरत बच्चों के लिए एक मजबूत, सुरक्षित और पक्का भवन है। शिक्षक अपने स्तर पर निष्ठा से अध्यापन कर रहे हैं, लेकिन सिर पर पक्की छत न होने के कारण रोजमर्रा की व्यवस्थाएं संभालना और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करना एक निरंतर संघर्ष बना हुआ है।

सवाल-जवाब

नरकट प्राथमिक स्कूल छत्तीसगढ़ के किस जिले में स्थित है?
यह स्कूल छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से लगभग 55 किलोमीटर दूर मैनपाट के नरकट गांव में स्थित है।
यह स्कूल कब से बिना पक्के भवन के संचालित हो रहा है?
इस प्राथमिक स्कूल की शुरुआत वर्ष 1997 में हुई थी और तब से लेकर अब तक इसे पक्का भवन नहीं मिला है।
स्कूल में फिलहाल कितने बच्चे पढ़ते हैं और वे किस समुदाय से हैं?
स्कूल में कुल 17 बच्चे नामांकित हैं, जिनमें अधिकांश मझवार समाज के हैं और कुछ बच्चे कोरवा तथा उरांव समुदाय से आते हैं।
बरसात के मौसम में स्कूल में क्या समस्याएं आती हैं?
बारिश और आंधी में झोपड़ी की छत से पानी टपकता है, फर्श और बैठने की दरियां भीग जाती हैं तथा स्कूल का सामान सुरक्षित रखना मुश्किल हो जाता है।
स्कूल में मध्यान्ह भोजन की व्यवस्था किस प्रकार की जाती है?
परिसर में जगह न होने के कारण मध्यान्ह भोजन पास के एक घर में पकाया जाता है और फिर बच्चों को स्कूल लाकर खिलाया जाता है।
स्कूल भवन निर्माण को लेकर अधिकारियों का क्या कहना है?
अधिकारियों के अनुसार स्कूल भवन स्वीकृत हो चुका है और बरसात खत्म होने के बाद इसका निर्माण कार्य शुरू कराया जा सकता है।
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टिप्पणियाँ 2

Karan Malhotra@karan-malhotra·20 मिनट पहले

मुझे वो दिन याद आ गया जब रिपोर्टिंग के सिलसिले में मैं एक ऐसे ही स्कूल में गया था जहाँ बारिश में मास्टर साहब बच्चों की किताबें अपनी गोद में छिपाकर बैठते थे। 1997 से आज तक बच्चे जमीन पर बैठ रहे हैं और कोई सुनने वाला नहीं है।

Rohan Verma@rohan-verma·20 मिनट पहले

करण भाई, जोहान तिर्की जैसे मास्टरों की जेब से हर साल मरम्मत के पैसे लगना इस सिस्टम के मुंह पर तमाचा है।

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