छत्तीसगढ़ के सरगुजा संभाग में सरगुजा ओलंपिक 2026-27 के आयोजन से खेल के मैदानों पर नई ऊर्जा देखने को मिल रही है। इस प्रतियोगिता में कुल 12 प्रकार के खेलों को शामिल किया गया है, जहां भाग लेने वाले प्रतिभागियों के लिए तमाम जरूरी खेल सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। सबसे खास बात यह है कि जो लड़कियां पहले सामाजिक झिझक या अवसरों के अभाव में घर से बाहर नहीं निकल पाती थीं, उन्हें अब सीधे अपने ही क्षेत्र में अपनी खेल क्षमता साबित करने और नई पहचान बनाने का अवसर मिल गया है। ग्रामीण बेटियों के इरादे बेहद मजबूत हैं, जहां कोई आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए स्वर्ण पदक जीतने की तैयारी में है, तो कोई भविष्य में पेशेवर कोच या शारीरिक शिक्षा शिक्षक बनने की राह तलाश रही है।
सीनियर और जूनियर वर्गों में बंटे मुकाबले
इस पूरे आयोजन को सुव्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए खिलाड़ियों को दो श्रेणियों में बांटा गया है। इसमें बालक और बालिका दोनों वर्गों के लिए सीनियर तथा जूनियर कैटेगरी बनाई गई हैं। इस व्यवस्था की बदौलत समान आयु वर्ग के प्रतिभागियों के बीच निष्पक्ष और कड़ा मुकाबला देखने को मिल रहा है। सुदूर ग्रामीण इलाकों से आने वाली किशोरियों के लिए यह मंच सपनों की उड़ान भरने का जरिया बन चुका है, जिससे उनके आत्मविश्वास में भारी इजाफा देखा जा रहा है।
वॉलीबॉल खिलाड़ी आरती बखला का भारत के लिए गोल्ड का सपना
इस प्रतियोगिता में अपनी चमक बिखेरने वालों में आरती बखला का नाम प्रमुख है, जो पिछले दो से तीन साल से लगातार खेल गतिविधियों में सक्रिय हैं। हालांकि आरती कई अलग-अलग स्पर्धाओं में हाथ आजमाती रही हैं और पूर्व में तवा फेंक जैसी प्रतियोगिता में भी भाग ले चुकी हैं, लेकिन मौजूदा समय में उनकी मुख्य पहचान एक कुशल वॉलीबॉल खिलाड़ी के रूप में स्थापित हो चुकी है। आरती ने बताया कि इससे पहले वह अंबिकापुर और विश्रामपुर जैसे स्थानों पर आयोजित टूर्नामेंटों में भाग लेने जा चुकी हैं। अब सरगुजा ओलंपिक के माध्यम से उन्हें अपने नजदीकी इलाके में ही बेहतर मैदान, खेल उपकरण और अभ्यास की निरंतर सुविधाएं हासिल हो रही हैं।
कक्षा 11वीं में पढ़ाई करने वाली आरती अपने खेल और शिक्षा के बीच बेहतरीन संतुलन बनाकर आगे बढ़ रही हैं। उनका लक्ष्य केवल स्थानीय या क्षेत्रीय स्तर तक सीमित रहना नहीं है, बल्कि वह भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए देश के लिए गोल्ड मेडल जीतना चाहती हैं। इस खेल सफर में उन्हें अपने परिवार का भरपूर समर्थन मिला है। जब वह राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए बाहर गईं, तब भी उनके माता-पिता ने किसी प्रकार की रुकावट पैदा नहीं की और उनका पूरा साथ दिया। इसके अलावा आरती अपने खेल जीवन में जितेंद्र भैया के योगदान को भी रेखांकित करती हैं। जितेंद्र स्वयं एक उम्दा खिलाड़ी रहे हैं और नए खिलाड़ियों को प्रेरित करते थे, जिनसे प्रेरणा लेकर आरती सहित अन्य युवाओं ने खेलों को गंभीरता से अपनाया।
रिले रेस से खेल कोच बनने की तैयारी में रोशनी
रंगवापारा क्षेत्र से आने वाली रोशनी लकड़ा भी इस प्रतियोगिता में अपना दम दिखा रही हैं। रोशनी ने रिले रेस को अपनी मुख्य स्पर्धा चुना है। रिले दौड़ की तकनीकी बारीकियों को समझाते हुए रोशनी ने बताया कि इस दौड़ में चार धावकों की एक टीम होती है, जिसमें सभी खिलाड़ी बारी-बारी से दौड़ते हैं और हाथ में मौजूद बैटन को अगले साथी तक सफलतापूर्वक पहुंचाते हैं। रोशनी ने इस खेल के दांव-पेंच अपने आसपास खेलने वाले अन्य धावकों और अपने शिक्षकों को देखकर सीखे हैं। अपनी स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बाद उनका इरादा खुद एक कुशल खेल कोच बनने का है, ताकि वह आने वाले समय में अन्य ग्रामीण खिलाड़ियों को प्रशिक्षित कर सकें।
प्रेंसी कुजूर की लंबी कूद और पीटीआई बनने की चाह
प्रेंसी कुजूर कई तरह के खेलों में रुचि रखती हैं, लेकिन लंबी कूद उनका सबसे पसंदीदा खेल है। कक्षा 12वीं की छात्रा प्रेंसी इसी खेल में विशेषज्ञता हासिल करना चाहती हैं और अपने माता-पिता के साथ पूरे देश का गौरव बढ़ाने की तमन्ना रखती हैं। प्रेंसी का कहना है कि पूर्व में ग्रामीण पृष्ठभूमि की लड़कियों को अपनी प्रतिभा दिखाने के ऐसे संगठित अवसर नहीं मिलते थे, लेकिन इस आयोजन ने उनके लिए नए रास्ते खोल दिए हैं। वह भविष्य में शारीरिक शिक्षा के क्षेत्र में उच्च अध्ययन कर पीटीआई यानी फिजिकल ट्रेनिंग इंस्ट्रक्टर बनना चाहती हैं, ताकि वे स्कूलों में बालिकाओं को खेलों के प्रति जागरूक कर सकें।
स्थानीय प्रतिभाओं के लिए खुला अभ्यास का नया मैदान
प्रतियोगिता स्थल पर मौजूद खिलाड़ियों का स्पष्ट कहना है कि पहले गांवों और छोटे कस्बों में रहने वाले बच्चों के लिए इस स्तर की खेल प्रतियोगिताएं सुलभ नहीं थीं। अब अपने ही संभाग में मंच मिलने से खिलाड़ियों को नियमित अभ्यास और प्रतिस्पर्धी माहौल मिल रहा है। मैदान पर केवल जीत-हार की होड़ ही नहीं दिख रही, बल्कि खिलाड़ी खेल भावना के साथ एक-दूसरे की हौसलाअफजाई भी कर रहे हैं। दर्शक दीर्घा में बैठे साथी खिलाड़ी तालियां बजाकर मैदान में उतरे प्रतिभागियों का मनोबल बढ़ा रहे हैं, जिससे यह आयोजन ग्रामीण खेल प्रतिभाओं के लिए एक नई उम्मीद का प्रतीक बन गया है।
























