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बिलासपुर में रेलवे के कबाड़ को मिली नई जिंदगी, कर्मचारियों ने पुराने लोहे से तराशीं शानदार कलाकृतियांछत्तीसगढ़
7 अक्तू॰ 2026, 7:07 am (30 मिनट पहले)· 0

बिलासपुर में रेलवे के कबाड़ को मिली नई जिंदगी, कर्मचारियों ने पुराने लोहे से तराशीं शानदार कलाकृतियां

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रेलवे कर्मचारियों ने बेकार पड़े लोहे और पुराने पार्ट्स का रचनात्मक उपयोग करते हुए उन्हें मनमोहक सजावटी आकृतियों में तब्दील कर दिया है.

रेलवे यार्ड और कार्यशालाओं में जमा जंग लगा लोहा, मालगाड़ियों के घिसे-पिटे कलपुर्जे और पुराने स्लीपर आमतौर पर अनुपयोगी मानकर कबाड़ घोषित कर दिए जाते हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में रेलवे कर्मचारियों ने इस कबाड़ को देखने का नजरिया पूरी तरह बदल दिया है. कबाड़ से जुगाड़ की अभिनव पहल पर काम करते हुए कर्मचारियों ने अपनी तकनीकी दक्षता और रचनात्मक सूझबूझ का परिचय दिया है. वे इन बेकार धातुओं को काटकर, वेल्डिंग के जरिए जोड़कर और तराशकर बेहद सुंदर कलाकृतियों का रूप दे रहे हैं. जिस सामान को परिचालन की दृष्टि से सेवामुक्त कर दिया गया था, वह अब कला और सजावट का बेहतरीन नमूना बनकर सामने आ रहा है. इस पूरी प्रक्रिया की सबसे अहम बात यह है कि इन सजावटी रचनाओं को तैयार करने के लिए कोई नया कच्चा माल या अतिरिक्त संसाधन बाजार से नहीं खरीदे जा रहे, बल्कि रेलवे से निकलने वाले पुराने स्क्रैप का ही शत-प्रतिशत उपयोग किया जा रहा है.

तकनीकी हुनर और कबाड़ के सही तालमेल की अनूठी मिसाल

रेलवे के दैनिक परिचालन और मरम्मत कार्यों के दौरान रोजाना भारी मात्रा में ऐसा साजो-सामान अलग होता है, जिसका तकनीकी जीवन समाप्त हो चुका होता है. मालगाड़ियों के भारी यांत्रिक अंग, टूटी पटरियां, लोहे के विभिन्न औजार और कंक्रीट या धातु के स्लीपर जब अपनी मियाद पूरी कर लेते हैं, तो उन्हें यार्ड में एकत्रित कर दिया जाता है. पारंपरिक रूप से ऐसे साजो-सामान का एकमात्र अंतिम गंतव्य नीलामी ही माना जाता रहा है. हालांकि, बिलासपुर में कर्मचारियों ने इस ढर्रे से हटकर पहल की. तकनीकी विशेषज्ञता रखने वाले कर्मियों ने उपलब्ध स्क्रैप सामग्री का बारीकी से मुआयना किया और उसकी बनावट के आधार पर उसे आकर्षक रूपों में ढालना शुरू कर दिया. लोहे के बेजान टुकड़े जब कटर, हथौड़े और वेल्डिंग मशीन की मदद से आपस में जुड़ते हैं, तो उनसे बेहद जीवंत आकृतियां आकार लेने लगती हैं.

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निर्माण प्रक्रिया और कलात्मक सोच का संगम

कबाड़ से इन कलाकृतियों को गढ़ने की प्रक्रिया काफी धैर्य और योजना की मांग करती है. सबसे पहले यार्ड में पड़े लोहे और कलपुर्जों की छंटाई की जाती है. इसके बाद आवश्यकतानुसार लोहे के अलग-अलग हिस्सों की कटाई की जाती है. फिर कुशल कामगार योजनाबद्ध तरीके से उन हिस्सों को परस्पर वेल्ड कर मनचाहा स्वरूप प्रदान करते हैं. इस तरह लोहे के पाइप, नट-बोल्ट, स्प्रिंग और पहियों के छोटे-बड़े हिस्से एक सुंदर सजावटी वस्तु के अंग बन जाते हैं. अधिकांश उपयोग की जाने वाली सामग्री वही होती है जिसे पहले पूरी तरह कबाड़ मान लिया गया था, जिससे कचरे का प्रबंधन भी रचनात्मक तरीके से संभव हो रहा है.

रायपुर कार्यशाला की प्रेरणा से आगे बढ़ा अभियान

स्क्रैप को कला में बदलने का यह विचार अचानक शुरू नहीं हुआ. पिछले साल रायपुर स्थित वैगन रिपेयर शॉप में भी कर्मचारियों ने अपनी कल्पनाशीलता का शानदार प्रदर्शन किया था. वहां रेलवे के पुराने और अप्रयुक्त सामान का उपयोग करके भगवान गणेश की एक विशाल प्रतिमा गढ़ी गई थी. इस अनूठी रचना को जब लोगों के सामने रखा गया, तो इसे व्यापक सराहना और प्रशंसा प्राप्त हुई. रायपुर में मिले इस सकारात्मक अनुभव ने रेलवे प्रशासन और कामगारों का उत्साह कई गुना बढ़ा दिया, जिसके बाद अनुपयोगी स्क्रैप से तरह-तरह की नई आकृतियां गढ़ने के इस सिलसिले को बिलासपुर में भी आगे बढ़ाया गया.

सजावटी उपयोग और स्क्रैप प्रबंधन की दोहरी रणनीति

तैयार की जा रही इन आकृतियों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन्हें रेलवे परिसरों, कार्यालयों और उद्यानों में सजावट के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. इससे न केवल परिसर की सुंदरता बढ़ती है, बल्कि आम नागरिकों और यात्रियों को भी कचरा प्रबंधन तथा पर्यावरण संरक्षण का स्पष्ट संदेश मिलता है. रेलवे के सीनियर पीआरओ संतोष कुमार ने इस नीति की जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि रेलवे में सेवामुक्त होने वाले सामान के प्रबंधन के लिए दोहरी कार्ययोजना अपनाई जाती है. जो सामग्री पूरी तरह बेकार हो चुकी होती है और जिसे किसी भी रूप में उपयोग में लाना संभव नहीं होता, उसे निर्धारित नियमों के तहत नीलाम कर दिया जाता है. वहीं दूसरी तरफ, जिस स्क्रैप से कोई उपयोगी उपकरण, ढांचा या आकर्षक कलाकृति तैयार हो सकती है, उसे कार्यशाला में रचनात्मक पुनर्चक्रण के लिए रख लिया जाता है. इस संतुलन से राजस्व और नवाचार दोनों का बेहतर समन्वय बना रहता है.

सवाल-जवाब

बिलासपुर में रेलवे कर्मचारी कबाड़ से क्या तैयार कर रहे हैं?
कर्मचारी अनुपयोगी लोहे, पुराने स्लीपरों और मालगाड़ियों के बेकार पार्ट्स से सुंदर सजावटी कलाकृतियां तैयार कर रहे हैं.
क्या इन कलाकृतियों को बनाने के लिए कोई नया सामान खरीदा गया है?
नहीं, इन कलाकृतियों को तैयार करने के लिए केवल रेलवे के बेकार और अनुपयोगी स्क्रैप का ही इस्तेमाल किया गया है.
रायपुर में स्क्रैप से क्या बनाया गया था?
रायपुर के वैगन रिपेयर शॉप में कर्मचारियों ने पुराने रेलवे कबाड़ से भगवान गणेश की एक विशाल प्रतिमा तैयार की थी.
सीनियर पीआरओ संतोष कुमार के अनुसार रेलवे स्क्रैप का प्रबंधन कैसे होता है?
पूरी तरह अनुपयोगी सामान को नियमों के तहत नीलाम किया जाता है, जबकि उपयोग योग्य स्क्रैप से रचनात्मक वस्तुएं बनाई जाती हैं.
इस पहल का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका उद्देश्य कबाड़ का बेहतर प्रबंधन करना, कचरे को रचनात्मक रूप देना और परिसरों की सुंदरता बढ़ाना है.
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टिप्पणियाँ 2

Rohan Verma@rohan-verma·16 मिनट पहले

बिलासपुर रेलवे के कर्मचारियों ने कबाड़ से शानदार कलाकृतियां बनाकर कमाल कर दिया है। बिना कोई नया सामान खरीदे, बेकार पड़े लोहे और कलपुर्जों का ऐसा उपयोग सचमुच प्रेरणादायक है।

Karan Malhotra@karan-malhotra·15 मिनट पहले

रोहन जी, बात सही है पर लगता है इसमें सिर्फ कर्मचारियों का ही नहीं, बल्कि ऊपर से भी कुछ बजट या स्पेशल अप्रूवल मिला होगा बिना किसी खर्च के काम होना थोड़ा मुश्किल लगता है।

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