अंतरराष्ट्रीय एकदिवसीय क्रिकेट की तेजतर्रार दुनिया में शारीरिक ऊर्जा, फुर्तीली फील्डिंग और लंबी पारियों की मांग के चलते सामान्यतः युवा चेहरों को प्राथमिकता दी जाती है। अमूमन देखा जाता है कि प्रतिभागी अपने जीवन के शुरुआती बीसवें पड़ाव में राष्ट्रीय दल का हिस्सा बनते हैं और पैंतीस या चालीस वर्ष की सीमा तक पहुंचते ही अपने जूते टांगने का मन बना लेते हैं। इसके विपरीत, क्रिकेट की ऐतिहासिक गाथाओं में कई ऐसे प्रेरणादायी उदाहरण भी सुरक्षित हैं जहां खिलाड़ियों ने पारंपरिक मान्यताओं को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। जब अधिकांश खिलाड़ी कमेंट्री बॉक्स या कोचिंग की भूमिका में चले जाते हैं, तब इन दिग्गजों ने विश्व पटल पर अपना पहला कदम रखा और यह दर्शाया कि खेल के प्रति अटूट लगन किसी भी कैलेंडर वर्ष की सीमाओं से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है।
वडोदरा में 47 साल के नोलान क्लार्क ने रचा था कभी न टूटने वाला इतिहास
इस विशिष्ट सूची के शीर्ष पर नीदरलैंड्स के अनुभवी योद्धा नोलान क्लार्क विराजमान हैं। उन्होंने पचास ओवरों के अंतरराष्ट्रीय प्रारूप में सबसे अधिक आयु में पदार्पण करने का ऐसा विश्व कीर्तिमान स्थापित किया जो आज तीन दशकों के बाद भी पूरी शान के साथ अडिग खड़ा है। भारतीय धरती पर 17 फरवरी 1996 को वडोदरा के मैदान में जब नीदरलैंड्स की टीम विश्व कप मैच में न्यूजीलैंड के विरुद्ध उतरी, तब क्लार्क की आधिकारिक उम्र 47 वर्ष 240 दिन दर्ज की गई थी। इस परिपक्व पड़ाव पर दुनिया के शीर्ष गेंदबाजों की तेज गेंदों का सामना करना अपने आप में अद्वितीय साहस का परिचायक था। क्लार्क ने उस दिन क्रीज पर उतरकर खेल जगत को दिखाया कि यदि संकल्प मजबूत हो तो ढलती उम्र केवल एक संख्या मात्र बनकर रह जाती है।
45वें जन्मदिन से महज छह दिन पूर्व जब नॉर्मन गिफर्ड को मिली इंग्लैंड की कैप
टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले स्थापित राष्ट्रों की बात करें तो इंग्लैंड के चतुर बाएं हाथ के स्पिनर नॉर्मन गिफर्ड का नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है। गिफर्ड ने अपने जीवन का बहुत बड़ा हिस्सा लाल गेंद के प्रारूप में अपनी राष्ट्रीय टीम की सेवा करते हुए व्यतीत किया था, किंतु सीमित ओवरों के खेल में अवसर पाने के लिए उन्हें चार दशकों से अधिक का धैर्य रखना पड़ा। आखिरकार 24 मार्च 1985 को शारजाह के तपते मैदान पर जब इंग्लैंड का आमना-सामना अपने धुर विरोधी ऑस्ट्रेलिया से हुआ, तब गिफर्ड को एकदिवसीय टीम में शामिल किया गया। उस ऐतिहासिक क्षण पर उनकी उम्र 44 वर्ष 359 दिन पहुंच चुकी थी। अपने पैंतालीसवें जन्मदिन से मात्र छह दिन पहले मैदान में उतरकर उन्होंने अपनी सधी हुई फिरकी से ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाजी क्रम को कड़ी परीक्षा में डाला था। पूर्ण सदस्य देशों में इतनी उम्र पर एकदिवसीय करियर आरंभ करने का उनका यह कीर्तिमान आज तक कोई अन्य गेंदबाज या बल्लेबाज नहीं तोड़ पाया है।
कोलंबो में हांगकांग की जर्सी पहनकर उतरे 43 वर्षीय राहुल शर्मा
इस अद्भुत तालिका के तीसरे पायदान पर हांगकांग का मान बढ़ाने वाले खिलाड़ी राहुल शर्मा का नाम आता है। 16 जुलाई 2004 को श्रीलंका के कोलंबो में एशिया कप का मंच सजा था, जहां हांगकांग की भिड़ंत बांग्लादेश से तय हुई थी। इसी प्रतिष्ठित मुकाबले के दौरान राहुल शर्मा ने अपने एकदिवसीय सफर की शुरुआत की। उस महत्वपूर्ण दिन आधिकारिक अभिलेखों के अनुसार उनकी आयु 43 वर्ष 306 दिन थी। अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं के तीव्र दबाव और युवा प्रतिद्वंद्वियों की तेजी के बीच स्वयं को ढालना कतई आसान चुनौती नहीं थी, मगर उन्होंने अपने अटूट समर्पण और अनुशासन से यह प्रमाणित कर दिखाया कि उच्च स्तर पर राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने की अभिलाषा किसी भी उम्र में साकार की जा सकती है।
नामीबियाई सपने को साकार करने वाले जेएल लाउ का हरारे में ऐतिहासिक कदम
चौथे स्थान पर अफ्रीकी देश नामीबिया के संघर्षशील खिलाड़ी जेएल लाउ का नाम आता है। उभरते हुए क्रिकेट बोर्डों के लिए विश्व कप का हिस्सा बनना जीवन का सबसे बड़ा सपना माना जाता है, और नामीबिया के लिए 2003 का महाकुंभ अत्यंत ऐतिहासिक साबित हुआ था। 10 फरवरी 2003 को हरारे के स्पोर्ट्स क्लब मैदान में जिम्बाब्वे के खिलाफ जब नामीबिया की टीम मैदान पर उतरी, तो उसमें लाउ भी शामिल थे। उस दिन डेब्यू करते समय लाउ की उम्र 43 वर्ष 236 दिन थी। उन्होंने न केवल वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई बल्कि अपनी राष्ट्रीय टीम के नवोदित खिलाड़ियों के लिए एक प्रेरक आदर्श बनकर भी उभरे।
एक ही मुकाबले की अनोखी दास्तान जब फ्लेवियन एपोंसो भी बने गवाह
सूची में पांचवां स्थान पुनः नीदरलैंड्स के एक और जांबाज फ्लेवियन एपोंसो को प्राप्त है। इस घटना का सबसे रोमांचक पहलू यह है कि एपोंसो ने भी उसी दिन और उसी मैच में अपना एकदिवसीय सफर आरंभ किया था जिसमें उनके हमवतन नोलान क्लार्क ने विश्व कीर्तिमान रचा था। 17 फरवरी 1996 को वडोदरा के मैदान पर न्यूजीलैंड के खिलाफ मुकाबले में जब एपोंसो उतरे, तब वे 43 वर्ष 112 दिन के हो चुके थे। पचास ओवरों के क्रिकेट के संपूर्ण इतिहास में यह एक दुर्लभ संयोग माना जाता है जब एक ही एकादश के भीतर दो खिलाड़ियों ने एक साथ 43 वर्ष से अधिक की आयु में अपना अंतरराष्ट्रीय पदार्पण दर्ज कराया हो।



















