क्रिकेट को अनुशासन और धैर्य का खेल माना जाता है, जहां एक गलत फैसला या अनियंत्रित गुस्सा पूरे करियर की दिशा बदल सकता है। भारतीय क्रिकेट इतिहास में कई ऐसे खिलाड़ी आए जिन्होंने अपनी अद्वितीय प्रतिभा से सबका ध्यान खींचा, लेकिन कुछ अपने आक्रामक स्वभाव और विवादों की वजह से भी चर्चा में बने रहे। ऐसे ही क्रिकेटरों में अंबाती रायुडू का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। मैदान पर उनका बल्ला जितनी मजबूती से बोलता था, मैदान के बाहर उनके फैसले और तीखे तेवर उतनी ही बड़ी हलचल पैदा करते थे।
सड़क पर हुए झगड़े से लेकर चयनकर्ताओं के फैसलों के खिलाफ खुलकर नाराजगी जाहिर करने तक, रायुडू का पूरा सफर उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। अपने 41वें जन्मदिन के मौके पर उनका यह सफर फिर से चर्चा के केंद्र में है। एक प्रतिभाशाली बल्लेबाज होने के बावजूद कई मौकों पर उनके आक्रामक फैसलों ने उनके खेल जीवन को प्रभावित किया, जिसकी वजह से वह अपनी पूरी क्षमता के अनुरूप लंबा अंतरराष्ट्रीय करियर नहीं बना सके।
टीम इंडिया के लिए 61 मुकाबलों में बिखेरी चमक
अंबाती रायुडू के अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों पर नजर डालें तो उन्होंने भारत के लिए कुल 61 मुकाबले खेले। इनमें 55 एकदिवसीय अंतरराष्ट्रीय मैच और 6 टी-20 अंतरराष्ट्रीय मैच शामिल हैं। मध्यक्रम के एक भरोसेमंद बल्लेबाज के रूप में उन्होंने कई महत्वपूर्ण पारियां खेलीं और टीम के लिए संकटमोचक की भूमिका निभाई। उनके पास तकनीकी रूप से मजबूत शॉट खेलने और पारी को संभालने का शानदार हुनर था।
क्रिकेट विशेषज्ञों का मानना रहा है कि उनका करियर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कहीं अधिक लंबा और सफल हो सकता था। हालांकि, समय-समय पर सामने आने वाले विवादों और भावुक फैसलों ने उनके सफर में रुकावटें पैदा कीं। सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब 2019 के एकदिवसीय विश्व कप की टीम का चयन किया जा रहा था और पूरे देश की नजरें उनके नाम पर टिकी हुई थीं।
2019 विश्व कप चयन विवाद और संन्यास का फैसला
साल 2019 में इंग्लैंड में खेले गए एकदिवसीय विश्व कप से ठीक पहले अंबाती रायुडू भारतीय मध्यक्रम के चौथे नंबर के सबसे मजबूत दावेदार माने जा रहे थे। उन्होंने इस स्थान पर लंबे समय तक लगातार रन बनाए थे। लेकिन जब चयन समिति ने अंतिम दल की घोषणा की, तो सूची से रायुडू का नाम पूरी तरह गायब था। चयनकर्ताओं ने उनकी जगह ऑलराउंडर विजय शंकर को विश्व कप टीम में शामिल करने का फैसला किया।
इस अप्रत्याशित फैसले से आहत होकर रायुडू ने अपना संयम खो दिया और क्रिकेट प्रशासन के प्रति अपनी तीव्र असहमति व्यक्त की। गहरे असंतोष और गुस्से के बीच उन्होंने अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के सभी प्रारूपों से तत्काल संन्यास लेने की घोषणा कर दी। उनका यह कदम खेल जगत में एक बड़े विवाद का सबब बन गया। बाद में पूर्व वरिष्ठ क्रिकेटरों के समझाने-बुझाने पर उन्होंने अपना संन्यास वापस लिया और घरेलू क्रिकेट में लौटकर दोबारा राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने की कोशिश की, लेकिन 2019 के घटनाक्रम के बाद उनके लिए भारतीय टीम के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो चुके थे।
आईसीएल में बगावत और बीसीसीआई का कड़ा प्रतिबंध
बहुत कम लोग इस बात से वाकिफ हैं कि 2019 से काफी पहले भी रायुडू को क्रिकेट प्रशासन के कड़े रुख का सामना करना पड़ा था। यह मामला साल 2007 का है, जब उन्होंने बागी टी-20 टूर्नामेंट इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) में शामिल होने का फैसला किया था। इस लीग को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) से आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं थी।
आईसीएल के अस्तित्व में आने के बाद ही बीसीसीआई ने अपनी आधिकारिक फ्रेंचाइजी प्रतियोगिता इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) की योजना बनाई, जो 2008 में शुरू होकर आज दुनिया की सबसे बड़ी क्रिकेट लीग बन चुकी है। उस दौरान बीसीसीआई ने आईसीएल से जुड़ने वाले सभी खिलाड़ियों को ब्लैकलिस्ट कर दिया था और उन पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया था। रायुडू भी इस प्रतिबंध की जद में आ गए थे। हालांकि, बाद के वर्षों में जब बीसीसीआई ने बागी लीग के खिलाड़ियों के लिए एक माफी योजना पेश की, तब रायुडू ने मुख्यधारा के घरेलू क्रिकेट में वापसी की और अंततः राष्ट्रीय टीम तक पहुंचे।



















