भारतीय घरेलू क्रिकेट और अंतरराष्ट्रीय फलक पर मौजूदा दौर में बिहार की धरती से कई होनहार चेहरे अपनी चमक बिखेर रहे हैं। वैभव सूर्यवंशी का उभरता कद हो या फिर राष्ट्रीय टीम में अपनी गेंदबाजी की छाप छोड़ते मुकेश कुमार और आकाशदीप, इस राज्य की प्रतिभा लगातार सुर्खियां बटोर रही है। लेकिन क्रिकेट के पन्नों को यदि 23 साल पीछे पलटें, तो एक ऐसा हैरतअंगेज मुकाबला सामने आता है जहां एक बिहारी मूल के धुरंधर ने उस समय की अजेय मानी जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई टीम को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। फर्क सिर्फ इतना था कि वह खिलाड़ी नीली जर्सी के बजाय मरून रंग की कैरेबियाई पोशाक में मैदान पर उतरा था।
साल 2003 का वह अविश्वसनीय मुकाबला
यह ऐतिहासिक भिड़ंत 9 मार्च 2003 को जोहान्सबर्ग के मैदान पर देखने को मिली थी। उस दौर की ऑस्ट्रेलियाई टीम अपने खेल के चरम पर थी और किसी भी विपक्षी खेमे के लिए उन्हें हराना लगभग नामुमकिन माना जाता था। मैच की दूसरी पारी में बल्लेबाजी करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने 104 ओवर के खेल में 417 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया था। इस पारी में एडम गिलक्रिस्ट ने मैदान के चारों तरफ शॉट लगाते हुए तूफानी शतक जड़ा, तो दूसरी ओर कप्तान रिकी पोंटिंग ने भी बल्ले से शानदार जौहर दिखाया। जब स्कोरबोर्ड पर 417 रन टंग गए, तब वेस्टइंडीज के सामने जीत के लिए 418 रनों की अभूतपूर्व चुनौती थी, जिसे उस दौर में कोई भी टीम हासिल करने का सपना तक नहीं देख सकती थी।
वेस्टइंडीज का निडर पलटवार और सरवन की पारी
चार सौ से अधिक के लक्ष्य का पीछा करने उतरी कैरेबियाई टीम ने शुरुआत से ही आक्रामक रुख अपनाया। शीर्ष क्रम में क्रिस गेल और रामनरेश सरवन ने सूझबूझ भरी और तेजतर्रार बल्लेबाजी का बेहतरीन नमूना पेश किया। सरवन ने मैदान पर आते ही गेंदबाजों पर दबाव बनाना शुरू किया और सिर्फ 47 गेंदों का सामना करते हुए 69 रन ठोक डाले। इस जोरदार पारी ने टीम के हौसलों को पंख लगाए और एक ठोस आधार तैयार किया। मध्यक्रम में कार्ल हूपर और शिवनारायण चंद्रपॉल ने रनों की गति को कतई धीमा नहीं पड़ने दिया, जबकि अंत में विकेटकीपर रिडली जैकब्स ने 49 गेंदों पर नाबाद 49 रन जुटाकर टीम को मंजिल के बेहद करीब ला खड़ा किया।
मैकग्रा की स्लेजिंग और सरवन का करारा जवाब
उस दौर में ग्लेन मैकग्रा दुनिया के सबसे घातक तेज गेंदबाजों में गिने जाते थे, जो अपनी धारदार गेंदों के साथ-साथ तीखी स्लेजिंग के लिए भी कुख्यात थे। जब रामनरेश सरवन क्रीज पर टिके हुए थे, तब मैकग्रा ने आपा खोते हुए उनके परिवार और पूर्वजों को लेकर बेहद अनुचित व अभद्र टिप्पणी कर दी। इस अपमान ने सरवन के भीतर एक अलग ही चिंगारी सुलगा दी। इसके बाद सरवन ने अपने बल्ले से ऐसा तांडव मचाया कि ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाजी बिखर कर रह गई। उन्होंने 139 गेंदों की पारी में 17 चौके जड़ते हुए 105 रन बनाए और चंद्रपॉल के साथ एक यादगार मैच जिताऊ साझेदारी को अंजाम दिया।
क्रिकेट जगत का सबसे बड़ा चमत्कार
वेस्टइंडीज ने इस असंभव से दिखने वाले मुकाबले को 49.4 ओवर में 7 विकेट पर 418 रन बनाकर 3 विकेट से अपनी झोली में डाल लिया। यह उस समय तक का सबसे बड़ा सफल रन चेज था, जिसने क्रिकेट पंडितों को दांतों तले उंगलियां दबाने पर मजबूर कर दिया। गुयाना में जन्मे रामनरेश सरवन का पारिवारिक इतिहास सीधे तौर पर भारत से जुड़ा रहा है और उनके पुरखे बिहार की धरती से ही विदेश गए थे। यही वजह है कि क्रिकेट इतिहास की इस अविस्मरणीय जीत में उनके पराक्रम को आज भी बड़े गर्व के साथ याद किया जाता है।


















