दवा कारोबार में मरीजों की जेब पर किस तरह डाका डाला जा रहा है और कैसे दवाओं पर मनमानी एमआरपी छापकर भारी मुनाफा कमाने का खेल चल रहा है, इस गंभीर मुद्दे पर देश भर से तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। आम जनता का साफ कहना है कि इस तरह की लूट सीधे तौर पर मरीजों की जान के साथ खिलवाड़ है। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर सस्ती दवाओं को कई गुना महंगे दामों पर बेचने वाले इन लोगों के पीछे कौन लोग हैं और महंगी दवाओं के लिए मरीजों को अपने घर, जमीन या गहने बेचने पर मजबूर करने वालों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई क्यों नहीं होती। दवाओं की इस अंधाधुंध मुनाफाखोरी से भी इन लोगों की लालच खत्म नहीं हो रही है, और स्थिति तब और भी डरावनी हो जाती है जब छोटे बच्चों की नकली दवाओं के नाम पर जानवरों की दवाइयां बेचने का खेल सामने आता है।
जानवरों की दवा को बच्चों की दवा बनाकर बेचने का खेल
गरीब और मजबूर इंसानों से दवा के नाम पर हजारों गुना मुनाफा वसूलने वाले और नकली दवाएं बेचकर उनकी जिंदगी खतरे में डालने वाले तत्वों पर लगाम लगाना बेहद जरूरी हो गया है। बच्चों की जान जोखिम में डालकर चल रहे इस गंदे धंधे का एक सनसनीखेज मामला गुजरात के सूरत में सामने आया है, जहां पुलिस की स्पेशल टीम ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन यानी एफडीए के साथ मिलकर एक मेडिकल स्टोर पर औचक छापेमारी की। इस मेडिकल स्टोर के संचालक पर घोड़े, गाय और भैंस जैसे बड़े जानवरों के लिए इस्तेमाल होने वाले लिवर टॉनिक को छोटे बच्चों की दवा बताकर बेचने का गंभीर आरोप लगा है।
पुलिस जांच में यह बात सामने आई कि आरोपी मेडिकल स्टोर संचालक जानवरों के इलाज में काम आने वाली इस दवा को छोटी-छोटी शीशियों में भरकर बेचता था। इन 60 एमएल और 100 एमएल की शीशियों पर विशेष रूप से बच्चों की दवा वाले स्टीकर चिपका दिए जाते थे ताकि किसी को शक न हो। पुलिस ने इस मामले में आरोपी मेडिकल स्टोर संचालक मोहम्मद साजिद मुल्ला को गिरफ्तार कर लिया है। उससे पूछताछ के दौरान सामने आए तथ्यों ने पुलिसकर्मियों के भी होश उड़ा दिए, जिससे यह साफ होता है कि मामूली मुनाफे के चक्कर में किस हद तक मासूम बच्चों की जिंदगी से खिलवाड़ किया जा रहा था।
कैंसर की दवाओं पर नकेल और सरकार का एक्शन
इस तरह के मामलों में मुनाफा और भी ज्यादा बढ़ जाता है क्योंकि एमआरपी पर मार्जिन का खेल ही ऐसा है कि जानवरों के काम आने वाली दवाएं दुकानदारों को बेहद कम कीमत पर मिल जाती हैं। इसके बावजूद पैसे की भूख कम नहीं होती, चाहे इसके परिणाम कितने भी घातक क्यों न हों। अब बात करें सस्ती दवा को भयंकर महंगे दामों पर बेचने वाले खेल पर शिकंजा कसने की, तो कैंसर की दवाओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट की कड़ी सख्ती के बाद अब केंद्र सरकार भी पूरी तरह एक्शन मोड में आ चुकी है। कैंसर के इलाज में काम आने वाली महंगी दवाओं से आम मरीजों को राहत देने के लिए सरकार ने 8 अक्टूबर को एक बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। इस निर्णय के तहत कैंसर की दवाओं पर मुनाफा अधिकतम 30 प्रतिशत तक सीमित कर दिया जाएगा, और यह मार्जिन दवा निर्माता कंपनी से निकलकर सीधे मरीज तक पहुंचने की लागत के आधार पर तय होगा।
एमआरपी और खरीद मूल्य का भारी अंतर
किसी भी फार्मा कंपनी में दवा तैयार होने के बाद वह डिस्ट्रीब्यूटर तक पहुंचती है, जिसके बाद डिस्ट्रीब्यूटर उसे रिटेलर या केमिस्ट को पीटीआर यानी प्राइस टू रिटेलर के आधार पर देते हैं। इसके बाद रिटेलर इसे एमआरपी यानी अधिकतम खुदरा मूल्य पर मरीजों को बेचते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पीटीआर और एमआरपी के बीच के इस भारी अंतर पर सबसे गहरी चिंता व्यक्त की है। सरकार के इस नए फैसले से कैंसर की उन दवाओं की कीमतों पर बहुत बड़ा असर पड़ेगा जिन्हें पहले बहुत ज्यादा दामों पर बेचा जाता था, जिसका जिक्र सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में सुनवाई के दौरान भी किया था।
सरकार ने इस बात की उम्मीद जताई है कि कैंसर से जुड़ी दवाओं पर मुनाफे की सीमा तय होने से देश भर के मरीजों को हर साल करीब 25 सौ करोड़ रुपये की बड़ी बचत होगी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट का यह भी कहना है कि सरकार के इस फैसले से अभी पूरी तरह संतुष्ट होने की जरूरत नहीं है। अदालत ने सरकार से यह तीखा सवाल भी पूछा है कि जब कैंसर जैसी गंभीर बीमारी की दवाओं का मार्जिन तय किया जा सकता है, तो अन्य तमाम सामान्य और जरूरी दवाइयों की कीमतों पर नियंत्रण क्यों नहीं रखा जा सकता। इस संबंध में सरकार को अपना विस्तृत एक्शन प्लान पेश करने के लिए 27 अक्टूबर तक का समय दिया गया है। वहीं दवा कारोबार से जुड़े जानकारों का भी मानना है कि इस तरह की कैपिंग से एमआरपी का खेल थमेगा और मरीजों को काफी राहत मिलेगी।
विभिन्न राज्यों में मेडिकल स्टोरों और फार्मेसी पर छापे
केवल केंद्र सरकार ही नहीं बल्कि देश के विभिन्न राज्यों की सरकारें भी मरीजों को लूटने वाले इस एमआरपी के खेल पर लगाम कसने के लिए सक्रिय हो गई हैं। पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन विभाग ने राज्य के 214 मेडिकल कॉलेजों और निजी अस्पतालों की फार्मेसियों में उपलब्ध दवाओं की गुणवत्ता और कीमतों की बड़े पैमाने पर जांच की। कुल 130 विभिन्न दवाओं के विश्लेषण से यह बात खुलकर सामने आई कि इनकी खरीद मूल्य और छपी हुई एमआरपी में बहुत बड़ा अंतर चल रहा है।
जांच के दौरान ऐसी 36 दवाएं पाई गईं जिनकी एमआरपी उनकी खरीद लागत से 10 गुना से भी ज्यादा थी। वहीं कुछ विशेष दवाइयों की खरीद कीमत और उनकी एमआरपी में 67 गुना तक का हैरान करने वाला अंतर देखा गया। उदाहरण के तौर पर बैक्टीरियल इंफेक्शन के इलाज में इस्तेमाल होने वाला पॉलीमाइक्सिन-बी इंजेक्शन लगभग 74 रुपये में खरीदा गया था, जबकि उस पर करीब 4981 रुपये की एमआरपी छपी हुई मिली। इसी तरह बेवाकि-जुमैब दवा का मामला भी सामने आया जिसकी खरीद का वास्तविक मूल्य 7 हजार 541 रुपये था, लेकिन उसे बाजार में काफी अधिक कीमत पर बेचा जा रहा था।



















