मधुबनी: बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र, खासकर मधुबनी के ग्रामीण इलाकों में मटन खरीदने का एक अनोखा तरीका प्रचलन में है, जो अन्य जगहों से बिल्कुल अलग है। यहां के लोग आमतौर पर बाजार से एक या दो किलो मटन खरीदने के बजाय, कई परिवार मिलकर एक पूरा बकरा (छागर) खरीदते हैं। इस बकरे को पकाने के बाद, बिना वजन किए सभी के हिस्से का मांस आपस में बराबर बांट लिया जाता है। स्थानीय भाषा में इस प्रथा को 'बाटी लगाना' या 'कुरी लगाना' कहा जाता है।
साथ मिलकर मटन का आनंद
मिथिला के इन ग्रामीण क्षेत्रों में जब किसी परिवार को मटन खाने का मन होता है, तो वे अक्सर अपने आसपास के चार-पांच परिवारों से संपर्क करते हैं। सभी मिलकर पैसे जुटाते हैं और एक पूरा बकरा खरीद लेते हैं। बकरे की कटाई के समय, प्रत्येक परिवार के लिए निर्धारित मटन का हिस्सा बराबर-बराबर बांट दिया जाता है। इसी कारण, जिस दिन एक घर में मटन बनता है, उसी दिन आसपास के कई घरों में भी उसकी खुशबू फैल जाती है, जिससे सामूहिक भोज का माहौल बनता है।
शुद्धता और ताजगी का भरोसा
स्थानीय निवासियों का मानना है कि बाजार से किलो के भाव खरीदे गए मटन में मिलावट या पुराने मांस होने की आशंका बनी रहती है। इसके विपरीत, जब पूरा बकरा सामने तैयार किया जाता है, तो लोगों को मांस की गुणवत्ता और ताजगी पर पूर्ण विश्वास होता है। यही वजह है कि आज भी इन ग्रामीण इलाकों में 'बाटी' लगाकर मटन खरीदने की यह परंपरा जीवित है, जो गुणवत्ता के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
ताजगी, सरलता और आर्थिक बचत
अक्सर यह शिकायतें सुनने को मिलती हैं कि बाजार से खरीदा गया मटन पकने में काफी समय लेता है और उसे नरम बनाने के लिए अतिरिक्त घरेलू नुस्खे अपनाने पड़ते हैं। लेकिन, 'बाटी' प्रथा से प्राप्त ताजा मटन आसानी से कड़ाही में ही पक जाता है, जिसके लिए प्रेशर कुकर या किसी विशेष विधि की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह इसकी एक प्रमुख विशेषता है। इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण आर्थिक पहलू भी है। बकरे को सामूहिक रूप से खरीदने से प्रति परिवार खर्च काफी कम हो जाता है, और सभी को ताजा व शुद्ध मटन का स्वाद चखने को मिलता है। यही कारण है कि आधुनिक युग में भी मिथिला के कई गांवों में यह अनूठी परंपरा आज भी जीवित है।













