भारतीय सेना के गोपनीय अभियानों से लेकर सिनेमाई पर्दे तक का सफर तय करने वाले कर्नल हनी बख्शी की वास्तविक जीवन यात्रा किसी रोमांचक पटकथा की तरह दिखाई देती है। सेना में लंबे समय तक अत्यंत संवेदनशील पदों पर रहने के बाद उन्होंने सिनेमा जगत का रुख किया और फिल्म हनुमान अंश के जरिए अपने अभिनय करियर का आगाज़ किया। इस फिल्म में उन्होंने आध्यात्मिक संत नीम करोली बाबा का रूप धारण किया है। जिस सिनेमाई प्रोजेक्ट को लेकर वे मान रहे थे कि यह थियेटरों में बमुश्किल दो सप्ताह ही टिक पाएगी, उसी रचना ने दर्शकों के बीच अप्रत्याशित लोकप्रियता हासिल कर सबको चौंका दिया है।
चंद मिनटों की स्क्रीन मौजूदगी ने जीता दर्शकों का भरोसा
सिनेमाघरों में प्रदर्शित हुई इस फिल्म के पहले हिस्से में कर्नल हनी बख्शी की उपस्थिति बहुत लंबी नहीं थी, मगर उनके दो मिनट के दृश्य ने दर्शकों के दिलों में गहरा असर छोड़ दिया। फिल्म का मुख्य कथा प्रवाह नीम करोली बाबा के आरंभिक जीवन, उनके बाल्यकाल और युवावस्था के संघर्षों के इर्द-गिर्द बुना गया है। इस पूरे प्रोजेक्ट को तीन कड़ियों में विभाजित कर एक विस्तृत सीरीज के रूप में तैयार किया जा रहा है। निर्माण दल ने उन्हें आश्वस्त किया है कि आने वाले दूसरे खंड में उनके पात्र को काफी ज्यादा समय और विस्तार प्रदान किया जाएगा।
फिल्म में डॉ. भोंसले और संत के बीच हुआ संवाद
कथानक के संदर्भ में कर्नल हनी बख्शी ने स्पष्ट किया कि उनके दृश्य का समय उस कालखंड को दर्शाता है जब नीम करोली बाबा अपनी दिव्य आत्मिक क्षमताओं को प्राप्त कर चुके थे। उसी दौर में कथा के भीतर डॉ. भोंसले नामक चिकित्सक का आगमन होता है, जिन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का उपचार किया था। इस दृश्य में बाबा और चिकित्सक के मध्य एक बेहद मर्मस्पर्शी बातचीत होती है, जिसमें बाबा यह उल्लेख करते हैं कि डॉक्टर तमाम प्रयासों के बावजूद देश के प्रथम प्रधानमंत्री को जीवनदान नहीं दे सके। यह पूरा घटनाक्रम महज दो मिनट का होने के बावजूद दर्शकों पर अमिट प्रभाव छोड़ता है।
प्रारंभिक आशंकाओं के विपरीत अप्रत्याशित रूप से मिली कामयाबी
इस बड़े पर्दे की प्रस्तुति को दर्शकों की ओर से मिले गर्मजोशी भरे रिस्पॉन्स ने खुद हनी बख्शी को भी स्तब्ध कर दिया। रिलीज से पहले उन्हें जरा भी भान नहीं था कि यह फिल्म सामाजिक हलकों में इस कदर चर्चा का केंद्र बन जाएगी। अपनी पुरानी सोच का जिक्र करते हुए वे बताते हैं कि उन्होंने तो यही आकलन किया था कि फिल्म अधिक से अधिक चौदह दिनों तक ही सिनेमा हॉल में टिक सकेगी। यही कारण है कि वे इस अभूतपूर्व जनसमर्थन और सफलता को एक अचंभित करने वाले चमत्कार के तौर पर देखते हैं।
देहरादून की सैन्य अकादमी से टीएसडी की कमान तक का सफर
वर्तमान समय में उत्तराखंड के देहरादून में निवास कर रहे हनी बख्शी का पूर्व सैन्य इतिहास काफी विस्तृत रहा है। वे साल 1988 के दौरान देहरादून स्थित इंडियन मिलिट्री अकादमी में एक सैन्य कैडेट के तौर पर प्रशिक्षण ले रहे थे, जहाँ से उनका चयन मिलिट्री इंटेलिजेंस शाखा के लिए हुआ। वर्ष 2007 से लेकर 2010 की अवधि में उन्होंने पश्चिम बंगाल के कोलकाता में मिलिट्री इंटेलिजेंस की एक महत्वपूर्ण इकाई का नेतृत्व किया। इसके पश्चात तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह ने उन्हें भारतीय सेना की एक गोपनीय एवं अति-विशिष्ट शाखा टेक्निकल सपोर्ट डिवीजन यानी TSD का शीर्ष दायित्व सौंपा था।
कोर्ट मार्शल की जटिलताओं के बाद लेखन और अभिनय का नया रास्ता
सैन्य सेवा के उच्च मुकाम पर पहुंचने के बाद उनके जीवन में एक अप्रत्याशित मोड़ भी आया, जब उन्हें सेना की जनरल कोर्ट मार्शल प्रक्रिया का सामना करना पड़ा। इस कानूनी व अनुशासनात्मक दौर से गुजरने के बाद उन्होंने रचनात्मक कला की राह चुनी। अब वे केवल कैमरे के सामने अभिनय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि विभिन्न डिजिटल प्लेटफॉर्मों के लिए वेब सीरीज की कहानियां गढ़ रहे हैं और पटकथा लेखन में अपनी रचनात्मक ऊर्जा लगा रहे हैं।


















