हैदराबाद का पुराना व्यापारिक इलाका बेगम बाज़ार केवल अपनी कारोबारी गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अपने लाजवाब खानपान और खानदानी डेयरी परंपराओं के लिए भी खास पहचान रखता है। इसी बाज़ार के भीतर मशहूर छतरी के समीप लगभग 75 वर्ष पुरानी एक दुकान स्थित है, जिसे लोग बालकिशन मिल्क भंडार के नाम से जानते हैं। दिखावे से दूर एक बेहद सादा परिवेश में चलने वाले इस प्रतिष्ठान की सबसे बड़ी ख्याति इसकी खास पेशकश पहलवान लस्सी से जुड़ी है, जिसका स्वाद लेने के लिए शहर भर से लोग खिंचे चले आते हैं।
अखाड़ों की खुराक से यूं जुड़ा लस्सी का नाम
इस अनूठे पेय के नामकरण की पृष्ठभूमि बेहद रोचक है और पुराने दौर की अखाड़ा संस्कृति से जुड़ी हुई है। बालकिशन लस्सी दुकान के संचालक बताते हैं कि दशकों पूर्व पुराने हैदराबाद और बेगम बाज़ार के आसपास कई पारंपरिक कुश्ती अखाड़े सक्रिय रहते थे। इन अखाड़ों में नियमित अभ्यास करने वाले पहलवान घंटों तक कठोर शारीरिक श्रम और कसरत में पसीना बहाते थे। ऐसे में अपनी शारीरिक क्षमता, ताकत और सहनशक्ति को बनाए रखने के उद्देश्य से उन्हें भारी मात्रा में प्रोटीन और पौष्टिक तत्वों की दरकार होती थी।
उस दौर में बालकिशन मिल्क भंडार इन पहलवानों की दैनिक खुराक का प्रमुख केंद्र बन गया। दुकान ने विशेष रूप से इन कसरत करने वालों की शारीरिक ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए एक बेहद गाढ़ी, पोषक तत्वों से भरपूर और वजनदार लस्सी तैयार करनी शुरू की। यह पेय पहलवानों को तुरंत नई ऊर्जा से भर देता था। वक्त बीतने के साथ अखाड़ों की चारदीवारी से निकलकर यह चर्चा आम नागरिकों तक पहुंच गई। साधारण ग्राहक भी दुकान पर पहुंचकर पहलवानों वाली लस्सी की मांग करने लगे, जिसके बाद इस लज़ीज़ पेय का नाम हमेशा के लिए पहलवान लस्सी के रूप में लोकप्रिय हो गया।
पारंपरिक मथनी और गाढ़े दही से तैयार होता है स्वाद
पहलवान लस्सी के इस स्वाद का मूल आधार इसे तैयार करने की विशुद्ध पारंपरिक और देशी कार्यप्रणाली में छिपा है। स्वाद और गुणवत्ता के लिए आज भी कुछ खास नियमों का कड़ाई से पालन किया जाता है।
- फुल-फैट गाढ़ा दही: इस लस्सी के लिए विशेष रूप से भैंस के शुद्ध और मलाईदार दूध से ताजा व गाढ़ा दही जमाया जाता है।
- पारंपरिक मथनी का इस्तेमाल: लस्सी तैयार करने में किसी आधुनिक इलेक्ट्रिक मशीन का सहारा नहीं लिया जाता, बल्कि लकड़ी की पारंपरिक मथनी (मढ़न) से हाथों द्वारा मथा जाता है। हाथ से लगातार मथने की इसी विधि से इसका टेक्सचर रेशमी और गाढ़ा आकार लेता है।
- शाही टॉपिंग: जब लस्सी गिलास में परोसी जाती है, तब उसके ऊपर हाथ से खुरची हुई ताजी मलाई की मोटी परत बिछाई जाती है। इसके साथ ही धीमी आंच पर घंटों पकाई गई गाढ़ी रबड़ी अथवा खोया डालकर इसे परोसा जाता है।
तीन पीढ़ियों का सफर और मौसम के अनुसार खास जायका
इस प्रतिष्ठित दुकान की शुरुआत 75 वर्ष से भी पहले बालकिशन यादव ने की थी। आज परिवार की तीसरी पीढ़ी उसी निष्ठा, मूल स्वाद और शुद्धता के मानकों को कायम रखते हुए इस काम को आगे बढ़ा रही है। दुकान में प्रवेश करते ही दशकों पुराने दौर का सजीव दृश्य सामने आ जाता है, जहां की दीवारों पर पुराने जमाने की ऐतिहासिक तस्वीरें और उस कालखंड के नामचीन पहलवानों की स्मृतियां संजोकर रखी गई हैं।
पहलवान लस्सी के अलावा यहां अन्य डेयरी उत्पाद भी लोगों के बीच समान रूप से लोकप्रिय हैं। गर्मियों के दिनों में यहां मैंगो लस्सी और गाढ़ी रबड़ी की भरपूर मांग रहती है, वहीं सर्दियों के मौसम में बड़े कड़ाहे में धीरे-धीरे पकने वाला गर्मागर्म केसर दूध ग्राहकों को बेहद आकर्षित करता है। इसके अतिरिक्त, घरों में उपयोग के लिए ताज़ा जमा दही और शुद्ध मलाई खरीदने वालों की कतार भी यहां रोज़ाना देखी जा सकती है।



















