सरगुजा जिले के प्रमुख केंद्र अंबिकापुर में जितिया पर्व के पावन अवसर पर पारंपरिक पकवान अनरसा की खुशबू हर तरफ बिखर रही है। धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-पाठ में विशेष महत्व रखने वाला यह पारंपरिक मिष्ठान स्थानीय श्रद्धालुओं के बीच बेहद लोकप्रिय है। इस इलाके में शुद्धता और पारंपरिक स्वाद को संजोए रखने का काम यश गुप्ता का परिवार बीते दो दशकों से लगातार कर रहा है। मशीनों के इस दौर में भी यहां अनरसा पूरी तरह हाथों की कारीगरी से तैयार किया जाता है, जिसके चलते लोग इसे प्रसाद और उपभोग के लिए बड़े चाव से खरीदते हैं।
बीस साल पुरानी पारिवारिक विरासत और पहचान
अंबिकापुर के स्थानीय निवासी यश गुप्ता अपने पूर्वजों की शुरू की गई परंपरा को पूरी लगन और निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। उनके परिवार में अनरसा बनाने का यह सिलसिला लगभग 20 वर्षों से निरंतर चल रहा है। यश गुप्ता से पहले उनके पिता, दादा और परदादा भी इसी पारंपरिक मिष्ठान निर्माण के काम से जुड़े रहे हैं। पूरे शहर में उनके परिवार की व्यवसायिक पहचान 'ईश्वर तिलकूट दुकान' के नाम से कायम है। इस प्रतिष्ठान के जरिए वे लंबे समय से पारंपरिक मिठाइयों की प्रामाणिक मिठास लोगों तक पहुंचा रहे हैं, जिसमें जितिया के दौरान अनरसा सबसे प्रमुख आकर्षण बन जाता है।
पारंपरिक विधि और हाथों की अनूठी कारीगरी
यश गुप्ता के अनुसार अनरसा तैयार करने की पूरी विधि बेहद व्यवस्थित और सधी हुई प्रक्रिया पर आधारित है। सबसे पहले शुद्ध चीनी की चाशनी पकाई जाती है। चाशनी के सही गाढ़ेपन पर आने के बाद उससे पिट्ठी तैयार की जाती है। इस तैयार पिट्ठी को कुछ समय के लिए सुखाया जाता है ताकि उसकी बनावट एकदम सटीक हो सके। पिट्ठी के सूख जाने के बाद ही अनरसा गढ़ने की मुख्य प्रक्रिया आरंभ होती है। इस पूरे निर्माण कार्य में किसी मशीन का सहारा नहीं लिया जाता, बल्कि पूरी तरह कारीगरों के हाथों का हुनर ही इसे विशिष्ट बनाता है।
तिल का लेप और लंबी शेल्फ लाइफ
स्वाद और बनावट में विशिष्टता लाने के लिए अनरसा के बाहरी हिस्से पर तिल चिपकाए जाते हैं। यश गुप्ता बताते हैं कि तिल के अतिरिक्त इसमें किसी भी तरह की बाहरी या गैर-जरूरी सामग्री का मिश्रण नहीं किया जाता है। जब पिट्ठी पूरी तरह सूख जाती है, तो उसे छानने का कार्य संपन्न किया जाता है। इस चरण के बाद लगभग एक घंटे के भीतर कुरकुरा और स्वादिष्ट अनरसा पूरी तरह बनकर तैयार हो जाता है। सही विधि और सावधानी से तैयार किया गया यह अनरसा कई दिनों तक सुरक्षित रहता है और जल्दी खराब नहीं होता।
धार्मिक आयोजनों में प्रसाद और थोक बाजार तक पहुंच
जितिया पर्व पर अनरसा का उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा में विशेष प्रसाद के रूप में किया जाता है, जिससे त्योहार के दिनों में इसकी मांग में जबरदस्त उछाल आता है। आम खुदरा ग्राहकों की कतारों के साथ-साथ कई थोक व्यापारी भी बड़े पैमाने पर यश गुप्ता की दुकान से अनरसा खरीदते हैं। ये व्यापारी इसे आकर्षक पैकेटों में बंद करके आसपास के बाजारों में आपूर्ति करते हैं। इस प्रकार बाजार में बिकने वाला पैक्ड अनरसा भी इसी पारंपरिक हाथ की कला और विरासत का प्रतिनिधित्व करता है।



















